चंद्रशेखर आज़ाद को सावरकर ने दी थी जिन्ना की सुपारी!

चंद्रशेखर आज़ाद को सावरकर ने दी थी जिन्ना की सुपारी!, चंद्रशेखर आज़ाद को सावरकर ने दी थी जिन्ना की सुपारी!

ये बात है उन दिनों की जब चंद्रशेखर आज़ाद उर्फ भैया लाहौर षड्यंत्र केस चलानेवालों को सबक सिखाना चाहते थे. यशपाल और उनके साथियों ने सुझाव दिया कि वायसराय को गोली मारने से संदेश दूर तक जाएगा. आज़ाद इसके लिए तैयार तो हो गए मगर उनका संगठन पैसे की तंगी में से जूझ हो रहा था और कोई भी काम बिना पैसे के पूरा नहीं होनेवाला था.

 

यशपाल ने मांगी सावरकर बंधुओं से मदद

अब क्रांतिकारी रकम जुगाड़ने में जुट गए. यशपाल और उनके साथी भगवती ने इसी दौरान दिल्ली में विनायक दामोदार सावरकर के बड़े भाई बाबा सावरकर से मुलाकात की. ये वो दिन थे जब सावरकर बंधु हिंदू महासभा की राजनीति में घुस गए थे. यशपाल ने बाबा को अपने दल की योजना बताई तो उन्होंने महाराष्ट्र आकर मिलने को कहा. 

कुछ ही दिन बाद यशपाल अकोला के एक मकान में बाबा से फिर मिले. दिसंबर की सरदी में बाबा जुकाम से परेशान थे. सादे से घर में उन्होंने यशपाल का स्वागत किया.

यशपाल ने उनके साथ काफी वक्त बिताया. वहां उन्होंने पाया कि सावरकर से प्रभावित कुछ लड़के घर पर आकर किसी फुटबॉल मैच पर चर्चा कर रहे थे. मराठी में बातें करते हुए वो लोग अंग्रेज़ी के सेंटर, फॉरवर्ड, बैक, गोल शब्दों का इस्तेमाल नहीं कर रहे थे, बल्कि उनकी जगह अजीब से संस्कृत पर्यायवाची शब्द बोल रहे थे. यशपाल को ये कोशिश भली तो लगी मगर विचित्र भी.

खैर, वक्त मिलते ही यशपाल ने उनसे एक बार फिर अपना उद्देश्य बताया और साथ ही संसाधनों की कमी के बारे में भी कहा. बाबा सावरकर ने यशपाल के उद्देश्य से असहमति तो नहीं जताई लेकिन कहा- ‘अंग्रेज़ी शासन के अतिरिक्त देश में दूसरा भी एक हमारा राष्ट्रीय शत्रु है जो हमारी राष्ट्रीय एकता का विरोधी है और अंग्रेज़ों के पक्ष में होकर हमारे स्वतंत्रता के प्रयत्नों को विफल कर देता है.’ 

उनका इशारा मुसलमानों की ओर था. यशपाल और उनके साथियों को अपनी ओर मिला लेने की नीयत से आगे बाबा बोले, ‘विदेशी दासता के विरुद्ध हम अपनी सांस्कृतिक एकता और शक्ति के बल से ही लड़कर स्वतंत्र हो सकते हैं. हमें पहले सांस्कृतिक शक्ति और एकता स्थापित करने के लिए इसके विरोधी शत्रुओं से स्वतंत्र होना है. इसके बिना अंग्रेज़ से लड़ना ऐसे ही ही जैसे दासता के वृक्ष की जड़ को छोड़कर पत्तों को छांटते रहना. हमें तुम्हारे उद्देश्य से पूरी सहानुभूति है परंतु सहयोग तो तभी हो सकता है जब कार्यक्रम में एकता हो.’

 

आज़ाद और साथियों को दिया जिन्ना की हत्या का प्रस्ताव

यशपाल चुप रहे तो बाबा ने अपनी योजना खोल कर रख दी. यशपाल अपनी किताब में बताते हैं कि बाबा सावरकर ने जिन्ना को उस समय देश की सबसे घातक वस्तु कहा. वो बोले- ‘यदि आप लोग इस व्यक्ति को समाप्त कर देने की ज़िम्मेदारी लें तो स्वतंत्रता प्राप्ति के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा दूर हो सकेगी. इसके लिए हम पचास हज़ार रुपये तक का प्रबंध करने की ज़िम्मेदारी ले सकते हैं.’

यशपाल सावरकर बंधुओं का आदर करते थे, लेकिन इस प्रस्ताव को मुस्कुराकर टालने में ही उन्होंने भलाई समझी. यशपाल मानते हैं कि चंद्रशेखर आज़ाद के संगठन को उस समय पचास हज़ार रुपये मिलना बड़ी बात होती. यूं भी अपने राजनैतिक उद्देश्य के लिए क्रांतिकारी डकैती करने या जाली सिक्के बनाने में गुरेज़ नहीं करते थे. डकैती में एकाध हत्या हो जाने की संभावना भी हमेशा बनी रहती थी. ऊपर से जिन्ना की राजनीति को लेकर क्रांतिकारियों में कोई हमदर्दी भी नहीं थी लेकिन सांप्रदायिक मतभेद में हत्या करने का विचार उन्हें जमा नहीं. 

 

तोहफे में बाबा सावरकर ने पेश की आदिम जमाने की पिस्तौल

उसी शाम यशपाल ने दिल्ली लौटना तय किया. उन्हें चंद्रशेखर आज़ाद को रिपोर्ट करना था, लेकिन अभी उन्हें हैरान होना बाकी था.

बाबा सावरकर ने यशपाल के रवाना होने से पहले उन्हें तोहफे में कुछ देना चाहा. एक कपड़े में बंधे बंडल से निकालकर उन्होंने यशपाल को हाथ भर लंबी पिस्तौल दिखाई. यशपाल लिखते हैं- हथियार की गढ़न और रूप देखकर मैं समझ गया कि देहाती लौहार की बनाई चीज़ है. उसमें कारतूस के बजाय नली के छेद से बारूद और गोली भरनी पड़ती थी. यशपाल ने आदिम ज़माने के इस हथियार को देखकर तौबा कर ली. बदले में बाबा को धन्यवाद दिया और वो बोझ उठाने से इनकार कर दिया. उन्होंने बाबा को अपनी कमर से निकालकर कोल्ट पिस्तौल भी दिखाई और कहा- हमें ऐसी चीज़ों की आवश्यकता है जिन्हें सुविधा से शरीर पर छिपाया जा सके.

बाबा निराश हो गए. बोले- ‘जैसी तुम्हारी इच्छा, पर ऐसी विदेशी चीज़ें कितनी मात्रा में जुटाई जा सकेंगी.’

देसी पिस्तौल के प्रति बाबा सावरकर की ये अजीब सी सनक यशपाल को भली तो लगी थी लेकिन व्यवहारिकता से कोसों दूर होने की वजह से अजीब थी. बाद में यशपाल ने जब गज भर लंबी पिस्तौल का किस्सा दोस्तों को सुनाया तो उन्होंने खूब मज़ाक उड़ाया.

 

जिन्ना की सुपारी का प्रस्ताव सुनकर भड़के आज़ाद

दिल्ली लौटकर यशपाल ने भगवती और चंद्रशेखर आज़ाद को बाबा सावरकर से हुई मुलाकात का पूरा किस्सा सुनाया. जिन्ना को मारने के प्रस्ताव के बारे में सुनकर चंद्रशेखर आज़ाद तो झुंझला ही गए. गुस्से में कहने लगे- ‘ये लोग क्या हमें पेशेवर हत्यारा समझते हैं?’ 

ज़ाहिर है, सावरकर बंधुओं की नज़र में देश का अंग्रेज़ों से ज़्यादा ज़रूरी मुसलमानों से छुटकारा पाना था. उनके पास धन तो था लेकिन उसे वो वायसराय की जगह जिन्ना की हत्या पर खर्चना चाहते थे.

तथ्य ये है कि बाद में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी ने दिल्ली के पास वायसराय की ट्रेन के नीचे अपने दम पर एक बम धमाका किया, जिसमें एक आदमी मारा गया लेकिन वायसराय बच गए. डरे सहमे वायसराय ने ट्रेन से उतरते ही गिरिजाघर जाकर अपनी सलामती के लिए ईश्वर को शुक्रिया कहा.

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