दोस्‍त का कत्‍ल करने के जुर्म में पूरी जिंदगी जेल में गुजरी, 36 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने किया बरी

न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और दीपक गुप्ता की पीठ ने फैसला सुनाया कि आरोपी एम यूनुस अली तरफदार के अपराध को साबित करने के लिए साक्ष्य पर्याप्त नहीं है. उसने हत्या की थी, यह बात उस साक्ष्य से साफ नहीं हो रहा है.

सुप्रीम कोर्ट ने 20 फरवरी को 36 साल पहले अपने दोस्त की हत्या के आरोप में फंसे एक शख्स को बरी कर दिया है. इस मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा को कलकत्ता हाईकोर्ट ने भी बरकरा रखा था. न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और दीपक गुप्ता की पीठ ने फैसला सुनाया कि आरोपी एम यूनुस अली तरफदार के अपराध को साबित करने के लिए साक्ष्य पर्याप्त नहीं है. उसने हत्या की थी, यह बात उस साक्ष्य से साफ नहीं हो रहा है.

एम यूनुस अली तरफदार पर मार्च 1984 में अपने दोस्त बेचाराम धारा की हत्या का आरोप था. मृतक का शव एक कुएं से बरामद किया गया था. शव की पहचान धारा के रिश्तेदारों ने की थी. एम यूनुस अली तरफदार के साथ ही तीन अन्य लोगों पर हत्या का आरोप था.

ट्रायल कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत हत्या के एम यूनुस अली तारफदार को दोषी ठहराया. अन्य आरोपियों को बरी कर दिया. ट्रायल कोर्ट ने एम यूनुस अली तराफदार को आजीवन कारावास की सजा दी. साल 2008 के जुलाई में कलकत्ता हाई कोर्ट ने सजा की पुष्टि की.

मृतक बेचाराम धारा की बहन के कोर्ट को बताया था कि जिस दिन बेचाराम धारा की हत्या हुई थी. उस दिन वह घर वालों को यही बोलकर निकला था कि वह एम यूनुस अली तरफदार के घर जा रहा है. वहीं, मृतक बेचाराम धारा के भाई का कहना था कि बेचाराम धारा की घड़ी को एम यूनुस अली तरफदार ने हत्या के बाद दुकान में बनने के लिया था.

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने एम यूनुस अली तरफदार को साक्ष्य के नहीं होने के कारण बरी कर दिया है.

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