जिसने बसाया शाहीन बाग उस शख्‍स ने कहा – अपने नाम को जी रही है ये कॉलोनी

शारिक़ अंसारुल्‍लाह ने 1984 में यहां की 80 बीघा जमीन खरीदी. शारिक ने यहां जो कॉलोनी बसाई, उसका नाम 'शाहीन बाग' रखा.

दिल्‍ली के जसोला गांव की शाहीन बाग कॉलोनी पिछले कुछ समय से सुर्खियों में है. यहां के लोग सिटिजनशिप अमेंडमेंट एक्‍ट (CAA) और नेशनल रजिस्‍टर ऑफ सिटिजंस (NRC) की खिलाफ़त में धरने पर बैठे हैं. इससे नोएडा से दिल्‍ली को जोड़ने वाला एक अहम रास्‍ता पूरी तरह बंद है. शुक्रवार (24 जनवरी) को इस प्रदर्शन का 40वां दिन रहा. यहां की रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) मानती है कि शाहीन बाग के नाम के पीछे युवाओं को एक बाज़ की तरह उड़ते हुए अपने मुकाम को पाने के लिए प्रेरित करती एक कविता है.

यह कविता है अल्‍लामा इक़बाल की. 61 साल के शारिक़ अंसारुल्‍लाह ने 1984 में जसोला गांव में 80 बीघा जमीन खरीदी. शारिक ने यहां जो कॉलोनी बसाई, उसका नाम इकबाल की कविताओं से प्रेरित होकर रखा. वो कहते हैं कि उन्‍होंने कभी नहीं सोचा था कि जिस छोटी सी कॉलोनी को उन्‍होंने नाम दिया, वो 36 साल बाद इतनी मशहूर हो जाएगी. उन्‍होंने कहा, “मैं खुश हूं कि यह अपने नाम को चरितार्थ कर रही है. शाहीन बाग के लोगों की हिम्‍मत बाज़ की टक्‍कर की है.”

बहुत सोचने के बाद रखा गया ‘शाहीन बाग’ का नाम

शारिक़ 1979 में उत्‍तर प्रदेश के रामपुर से दिल्‍ली के जामिया मिलिया इस्‍लामिया में पढ़ने आए थे. उन्‍होंने हिंदुस्‍तान टाइम्‍स से कहा, “ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद, मैंने जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) से एमए (अरबी) ज्‍वॉइन किया. पढ़ाई पूरी करने के बाद 1984 में मैंने रियल एस्‍टेट बिजनेस शुरू किया. परिवार की मदद से मैंने जसोला में बड़ा प्‍लॉट खरीदा और ये कॉलोनी बसाई. बड़े सोच-विचार के बाद मैंने इस कॉलोनी का नाम शाहीन बाग रखा.”

उनके मुताबिक, इक़बाल की शायरी “तू शाहीन है, परवाज़ है काम तेरा, तेरे सामने आसमान और भी हैं…” ने उन्‍हें बेहद प्रेरित किया. इक़बाल ने अपनी नज्‍़म ‘सितारों से आगे जहां और भी है’ में यह लाइन लिखी है. अपनी कविताओं में इकबाल ने कई बार ‘शाहीन’ शब्‍द का इस्‍तेमाल किया है.

शारिक़ अब शाहीन पब्लिक स्‍कूल नाम के दो स्‍कूल चलाते हैं. एक लड़कों के लिए और दूसरा लड़कियों की खातिर. 1992 में शाहीन बाग RWA के ट्रेजरर रहे मोहम्‍मद मोनिस कहते हैं कि शुरु में कॉलोनी दो लोगों ने शुरू की. एक और परिवार था जिसने अपनी कॉलोनी का नाम निशात बाग रखा, अंसारुल्‍लाह ने शाहीन बाग. दोनों ही कॉलोनीज एग्रीकल्‍चरल लैंड पर बनी हैं.

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