BJP और NCP के बीच हो जाती डील, अगर पीएम मोदी मान लेते शरद पवार की ये दो शर्तें

एनसीपी की मांगों पर बीजेपी की तरफ से सकारात्मक रुख न मिलने पर 20 नवंबर को जब संसद भवन में पीएम मोदी से शरद पवार मिले तो करीब 45-50 मिनट लंबी बातचीत चली.

बीजेपी को समर्थन देने के लिए राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) अध्यक्ष शरद पवार ने दो शर्ते रखी थीं. पहली शर्त थी केंद्र की राजनीति में सक्रिय बेटी सुप्रिया सुले के लिए भारी भरकम कृषि मंत्रालय और दूसरी देवेंद्र फडणवीस की जगह किसी और को सीएम बनाना. जब यह बात पीएम मोदी के सामने आई तो वह सरकार बनाने के लिए इन शर्तों को मानने को तैयार नहीं हुए.

बीजेपी सूत्रों ने न्यूज एजेंसी को बताया कि पार्टी नेतृत्व को लगा कि अगर महाराष्ट्र में समर्थन हासिल करने के लिए एनसीपी को कृषि मंत्रालय दे दिया गया, तो फिर बिहार में पुराना सहयोगी जेडीयू रेल मंत्रालय के लिए दावा ठोक कर धर्मसंकट पैदा कर सकता है. ऐसे में प्रचंड बहुमत के बावजूद दो बड़े मंत्रालय बीजेपी के हाथ से निकल सकते हैं.

पवार की दूसरी शर्त

सूत्रों ने पवार की दूसरी शर्त के बारे में बताया कि जिस तरह से महाराष्ट्र जैसे राज्य में देवेंद्र फडणवीस पांच साल तक बेदाग सत्ता चलाने में सफल रहे और विधानसभा चुनाव में भी पार्टी ने उन्हें सीएम का चेहरा बनाकर चुनाव लड़ा, 24 अक्टूबर को नतीजे आने के दिन पार्टी मुख्यालय पर कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने फडणवीस के ही नेतृत्व में सरकार बनने की घोषणा की थी, इसके बाद फडणवीस की जगह किसी दूसरे को सीएम बनाने की शर्त मानना भी बीजेपी के लिए नामुमकिन था.

नतीजों के बाद भी पवार तीखा नहीं बोले

सूत्रों का कहना है कि इन दोनों मांगों को मानने के लिए शरद पवार ने बीजेपी और मोदी-शाह को संदेश भेजकर विचार के लिए वक्त दिया था. यही वजह है कि नतीजे आने के बाद पवार ने बीजेपी नेतृत्व के खिलाफ ऐसा कुछ तीखा नहीं बोला था, जिस पर बीजेपी से जवाबी प्रतिक्रिया आने की गुंजाइश रहती. बयानबाजी सिर्फ शिवसेना और बीजेपी के बीच होती रही.

मांगों पर राजी नहीं हुए

सूत्रों का कहना है कि मांगों पर बीजेपी की तरफ से सकारात्मक रुख न मिलने पर 20 नवंबर को जब संसद भवन में पीएम मोदी से शरद पवार मिले तो करीब 45-50 मिनट लंबी बातचीत चली. हालांकि इस मुलाकात में भी पीएम मोदी शरद पवार की दोनों मांगों पर राजी नहीं हुए और न ही उन्होंने खुलकर कुछ कहा.

इस बीच 22 नवंबर को रातोंरात शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने बागी होकर बीजेपी के साथ सरकार बनाने की पेशकश कर दी. शुरुआती खबरों में कहा गया कि अजित पवार के साथ 30-35 विधायक टूटकर बीजेपी के साथ सरकार बनाने के लिए तैयार हैं.

यह भी कहा जाने लगा कि इसमें शरद पवार की भी मौन सहमति है. मगर बाद में शरद पवार ने ट्वीट कर बीजेपी के साथ एनसीपी के गठबंधन की बात खारिज करते हुए कहा कि सरकार में शामिल होने का अजित पवार का फैसला निजी है.

सरकार बनाने का अंतिम कदम उठाया

सूत्र बताते हैं कि शरद पवार को आखिर तक उम्मीद थी कि शिवसेना के साथ छोड़ने के कारण असहाय हुई बीजेपी उनकी दोनों बड़ी मांगें मान लेगी, मगर ऐसा नहीं हुआ. आखिरकार शरद पवार ने कांग्रेस और शिवसेना के साथ ही सरकार बनाने का अंतिम कदम उठाया.

शरद पवार को मालूम था कि 54 विधायक होने के कारण उनके दोनों हाथों में लड्डू है. एक तरफ जाने पर उनके सिर पर चाणक्य बनने का सेहरा बंधेगा और बीजेपी की तरफ जाने पर केंद्र सरकार में भागीदारी सहित अधिकतम लाभ मिलने की गुंजाइश है.

कृषि मंत्रालय काफी मुफीद रहता

संघ और बीजेपी मामलों के जानकार नागपुर के दिलीप देवधर ने न्यूज एजेंसी से कहा, “संघ परिवार में शरद पवार की इन दो शर्तों की काफी चर्चा रही, हालांकि उससे भी ज्यादा चर्चा पीएम मोदी के दबावों के आगे न झुकने की रही. महाराष्ट्र में किसानों का प्रमुख मुद्दा होने के कारण वहां की राजनीति के लिए कृषि मंत्रालय काफी मुफीद रहता है.

शरद पवार पूर्व में कृषि मंत्री रह भी चुके हैं. दूसरा सीएम पद के लिए फडणवीस मोदी की ही खोज रहे हैं, ऐसे में उन्हें साइडलाइन करने का प्रश्न ही नहीं उठता था. शरद पवार को जब लगा कि बीजेपी उनकी मांगों को नहीं मानने वाली है, तो उन्होंने आखिरकार कांग्रेस-शिवसेना के साथ पहले से सरकार बनाने को लेकर चल रही बातचीत को ही मुकाम पर पहुंचाने का फैसला किया. (इनपुट-आईएएनएस)

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