अजित पवार बागी या इशारों पर हुआ खेल? जानिए महाराष्ट्र की राजनीति का सच शरद पवार की जुबानी

एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने स्पष्ट किया है कि उन्हें इस गठबंधन के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, उन्हें सुबह सात बजे इस बात की जानकारी मिली है.
Sharad Pawar on Maharashtra Politics, अजित पवार बागी या इशारों पर हुआ खेल? जानिए महाराष्ट्र की राजनीति का सच शरद पवार की जुबानी

महाराष्ट्र में देवेंद्र फडनवीस के साथ मिलकर सराकर बनाने के लिए भतीजे अजित पवार को शरद पवार का समर्थन मिला था या नहीं? एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने स्पष्ट किया है कि उन्हें इस गठबंधन के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, उन्हें सुबह सात बजे इस बात की जानकारी मिली है.

ANI के मुताबिक शरद पवार ने कहा है कि बीजेपी को समर्थन करना अजित पवार का निजी फैसला है. एनसीपी इसमें शामिल नहीं है. शरद पवार ने कहा, ‘मैं उनके इस फैसले का किसी तरह से समर्थन नहीं करता हूं’

वहीं एनसीपी नेता नवाब मलिक ने कहा, पार्टी के विधायकों को गलत जानकारी दी गई और उनकी चिट्ठी का गलत इस्तेमाल किया गया. जानकारी मिली है कि विधायकों की उपस्थिति के लिए अटेंडेंस रजिस्टर में जो हस्ताक्षर करवाया गया था वही राज्यपाल के सामने रखा गया और उसी आधार पर सरकार बनाने का दावा पेश किया गया.

हलांकि इस बारे में बात करने के लिए शरद पवार मीडिया के सामने उपस्थित होंगे. उन्होंने कहा कि वो दोपहर 12 बजे के क़रीब उद्धव ठाकरे के साथ मिलकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे.

सूत्रों के मुताबिक कहा जा रहा है कि बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाने के फैसले के बाद एनसीपी में फूट पड़ सकती है. संभवत: पार्टी के 22 विधायक एनसीपी से अलग हो सकते हैं. वहीं दूसरी तरफ यह भी कहा जा रहा है कि अजित पवार ने शरद पवार की सहमति के बाद ही मिलकर सरकार बनाने का फैसला किया है.

देवेंद्र फडणवीस के शपथ लेते ही महाराष्ट्र से राष्ट्रपति शासन हटाने की अधिसूचना भी जारी कर दी गई है.

बता दें कि राष्ट्रपति शासन हटाने की सिफारिश कैबिनेट की बैठक में की जाती है. लेकिन इस प्रक्रिया की भी कोई जानकारी नहीं मिली है.

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव मे बीजेपी को 105, शिवसेना को 56, एनसीपी को 54 और कांग्रेस को 44 सीटें मिली हैं. बीजेपी और शिवसेना ने मिलकर बहुमत का 145 का आंकड़ा पार कर लिया था. लेकिन शिवसेना ने 50-50 फॉर्मूले की मांग रख दी जिसके मुताबिक ढाई-ढाई साल सरकार चलाने का मॉडल था.

शिवसेना का कहना है कि बीजेपी के साथ समझौता इसी फॉर्मूले पर हुआ था लेकिन बीजेपी का दावा है कि ऐसा कोई समझौता नहीं हुआ. इसी लेकर मतभेद इतना बढ़ा कि दोनों पार्टियों की 30 साल पुरानी दोस्ती टूट गई.

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