अयोध्या में मंदिर, महाराष्ट्र में सरकार… संजय राउत के इस बयान के क्या है मायने?

क्या शिवसेना सांसद के इस बयान का यह मतलब निकाला जाए कि जल्द ही एनडीए के दोनों सहयोगी मिलकर राज्य में सरकार बनाने का दावा पेश करने वाले हैं? या फिर...
Maharashtra Government formation, अयोध्या में मंदिर, महाराष्ट्र में सरकार… संजय राउत के इस बयान के क्या है मायने?

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले में ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाते हुए विवादिता ज़मीन का पूरा मालिकाना हक़ रामलला विराजमान को सौंप दिया है. वहीं केंद्र और राज्य सरकार से मस्जिद के निर्माण के लिए 5 एकड़ ज़मीन मुस्लिम पक्ष देने को कहा है.

अयोध्या पर ऐतिहासिक फ़ैसला आते ही महाराष्ट्र में भी सरकार बनने का रास्ता साफ़ होता नज़र आ रहा है. शिवसेना सांसद संजय राउत ने अपने ट्विटर हैंडल पर लिखा, ‘पहले मंदिर, फिर सरकार. अयोध्या में मंदिर, महाराष्ट्र में सरकार.. जय श्री राम!’

संजय राउत के इस बयान के बाद ऐसा लग रहा है कि शिवसेना, बीजेपी के साथ मिलकर महाराष्ट्र में सरकार बनाने जा रही है. या फिर कहीं राज्य राष्ट्रपति शासन की तरफ तो नहीं जा रहा है. क्या उनके बयान का यह मतलब निकाला जाए कि जब तक अयोध्या में राम मंदिर नहीं बनेगा तब तक राज्य में सरकार नहीं बनेगी?

शिवसेना ने इससे पहले गुरुवार को अपने सहयोगी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) पर राज्य को राष्ट्रपति शासन की तरफ ले जाने का आरोप लगाया था.

शिवसेना के सांसद संजय राउत ने कहा, “बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी है..अगर उसे भरोसा है तो उसे सरकार बनाने के लिए दावा करना चाहिए और समर्थन देने वाले 145 विधायकों की सूची सौंपनी चाहिए. अगर वे ऐसा नहीं कर सकते तो उन्हें सार्वजनिक तौर पर इसकी घोषणा करनी चाहिए और विपक्ष में बैठने की तैयारी करनी चाहिए.”

राउत ने बीजेपी पर हमला करते हुए कहा, “सरकार बनाने के लिए कोई कदम नहीं उठाकर बीजेपी दूसरे विकल्पों को इजाजत नहीं दे रही और जानबूझकर राज्य को राष्ट्रपति शासन की तरफ धकेल रही है. समय बदल गया है. आप के सत्ता से बाहर होने के बाद साम, दाम, दंड व भेद की राजनीति काम नहीं करेगी.”

दरअसल राज्य में 2014 के चुनाव के बाद महाराष्ट्र विधानसभा का गठन 10 नवंबर 2014 को हुआ था लिहाजा 9 नवंबर 2019 यानी शनिवार को विधानसभा भंग हो जाएगी.

ऐसे में अगर शनिवार को सरकार बनाने का दावा पेश नहीं किया गया तो राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है.

क्या है कोर्ट का फैसला?

सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को अयोध्या में विवादित स्थल राम जन्मभूमि पर मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करते हुये केन्द्र सरकार को निर्देश दिया कि सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद के निर्माण के लिये पांच एकड़ भूमि आबंटित की जाये.

प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने भारतीय इतिहास की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण इस व्यवस्था के साथ ही करीब 130 साल से चले आ रहे इस संवेदनशील विवाद का पटाक्षेप कर दिया. इस विवाद ने देश के सामाजिक ताने बाने को तार तार कर दिया था.

शीर्ष अदालत ने कहा कि मस्जिद का निर्माण ‘प्रमुख स्थल’ पर किया जाना चाहिए और सरकार को उस स्थान पर मंदिर निर्माण के लिये तीन महीने के भीतर एक ट्रस्ट गठित करना चाहिए जिसके प्रति अधिकांश हिन्दुओं का मानना है कि भगवान राम का जन्म वहीं पर हुआ था.

इस स्थान पर 16वीं सदी की बाबरी मस्जिद थी जिसे कार सेवकों ने छह दिसंबर, 1992 को गिरा दिया था.

संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर शामिल थे.

पीठ ने कहा कि 2.77 एकड़ की विवादित भूमि का अधिकार राम लला की मूर्ति को सौंप दिया जाये, हालांकि इसका कब्जा केन्द्र सरकार के रिसीवर के पास ही रहेगा.

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