निकाले गए इन दो नेताओं ने कांग्रेस को अपने-अपने राज्यों में शून्य पर लुढ़काया

लोकसभा चुनाव 2019 में कांग्रेस का बंटाधार हो गया है लेकिन उसके पराभव की कहानी में दो खास लोगों ने भी अहम भूमिका निभाई है. एक हैं जगन मोहन रेड्डी और दूसरी हैं ममता बनर्जी.

कांग्रेस हिंदुस्तान की सबसे पुरानी पार्टी है और जेपी आंदोलन से पहले राजनीति शुरू करनेवाले अधिकतर नेताओं की प्राथमिक शिक्षा दीक्षा कांग्रेस में ही हुई थी. बाद में मतभेदों और निजी महत्वाकांक्षाओं के पूरा ना होन के चलते बहुत सारे नेता कांग्रेस से अलग हुए, जिनमें कुछ का राजनीतिक करियर सदगति को प्राप्त हुआ और कुछ ने नए मुकाम छुए.

ममता बनर्जी और जगन मोहन रेड्डी दो ऐसे ही नाम हैं जो कांग्रेस में चमके लेकिन उन्होंने अपनी सियासत का चरम पार्टी से अलग होकर ही पाया.

आंध्र में कांग्रेस का सूपड़ा साफ करनेवाले जगन मोहन रेड्डी
लोकसभा चुनाव 2019 के साथ-साथ आंध्रप्रदेश के विधानसभा चुनाव भी हुए. जगनमोहन रेड्डी पूरे दमखम से जुटे थे. चुनाव विश्लेषक अनुमान जता रहे थे है उससे नतीजों का कुछ कुछ अंदाज़ा हो रहा कि जैसी भीड़ जगन के कार्यक्रमों में दिख रही है. आखिरकार 23 मई को केंद्र में मोदी की सत्ता वापसी के दिन जगन मोहन को भी आंध्र प्रदेश का शासन मिल ही गया. लोगों ने जगन के पक्ष में फैसला भी पूरे ज़ोरशोर से सुनाया. प्रदेश की 175 में से 151 सीटें जगन को मिलीं जबकि सत्तासीन चंद्रबाबू नायडू को 23 सीटों के साथ विपक्ष में बैठने का जनादेश मिला. राज्य की 25 लोकसभा सीटों में से भी 22 पर जगन की YSR कांग्रेस के ही सांसद बैठेंगे.

… लेकिन जगन की कामयाबी की पटकथा इतनी आसानी से नहीं लिखी गई. हर पंक्ति में उनका बेतरह संघर्ष साफ झलकता है. 47 साल के जगन साल 1999 में व्यापार करने उतरे. पिता वाईएस राजशेखर रेड्डी राजनीति में सक्रिय थे. पावर कंपनी से बिज़नेस शुरू करनेवाले जगन ने 2004 में पिता के मुख्यमंत्री बनने के बाद दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की की. खनन, इंफ्रा, सीमेंट से लेकर वो मीडिया तक में दखल देने लगे. तेलुगू समाचारपत्र साक्षी और चैनल साक्षी टीवी की स्थापना भी हुई.

एक बार बिज़नेस जमा तो जगन ने पिता की राजनीतिक विरासत संभालने के लिए कदम बढ़ाया. 2004 में वो कड़प्पा के लिए लोकसभा का टिकट मांगने कांग्रेस के दरवाज़े पहुंचे लेकिन उन्हें मायूसी हाथ लगी. कड़प्पा से जगन के पिता सांसद रह चुके थे. पार्टी ने उनके चाचा वाई एस विवेकानंद रेड्डी को टिकट दे दिया. आखिरकार 2009 में जगन यहीं से सांसद बने. साल 2009 ही वो साल था जब आंध्र के सीएम और जगन के पिता वाईएसआर एक हेलिकॉप्टर क्रैश में मारे गए.

जगन ने पार्टी से खुद के लिए सीएम पद की मांग की लेकिन इस बार भी पार्टी ने उन्हें निराश किया. उनके पिता की सरकार में वित्तमंत्री रहे के रोसैया की ताजपोशी हो गई. जगन ने कांग्रेसी आलाकमान तक खूब दौड़धूप की लेकिन किसी दरवाज़े पर उनकी सुनवाई नहीं हुई. जगन जानते थे कि भले ही वो खुद बड़े नेता ना हों लेकिन उनके पिता की लोकप्रियता और मौत के बाद पैदा हुई सहानुभूति प्रभाव पैदा कर सकती है. जगन ने 2010 में एक यात्रा निकाली. इस यात्रा के दौरान वो उन परिवारों से मिले जिनके सदस्यों ने वाई एस राजशेखर रेड्डी की मौत के बाद या तो खुदकुशी कर ली थी, या उनकी सेहत बिगड़ गई थी.

कांग्रेस का स्थानीय नेतृत्व जगन की रणनीति समझ रहा था. जगन भीतर ही भीतर कांग्रेसी विधायकों का समर्थन भी तेज़ी से जुटा रहे थे. कमज़ोर रोसैया कुछ भी नहीं संभाल पा रहे थे, नतीजतन उनका इस्तीफा हो गया. उनकी जगह किरण कुमार रेड्डी को लाया गया. कांग्रेस ने जगन की यात्रा का विरोध किया लेकिन लोकप्रियता बटोर रहे जगन ने आदेश को मानने से इनकार कर दिया. आखिरकार 2010 के अंत में वो खुद ही पार्टी से बाहर निकले और 2011 मार्च में YSR कांग्रेस (युवजन श्रमिक रायथु कांग्रेस) के नाम से नए दल का गठन कर लिया.

जनता में उनको लेकर एक आकर्षण था. 2011 में जब कडप्पा लोकसभा सीट के लिए मतदान हुआ तो भारी अंतर के साथ उन्होंने जीत दर्ज कर ली. उनकी मां भी चुनाव जीतकर राज्य की विधानसभा में पहुंचने में कामयाब रहीं. साल 2014 में जब आंध्र की जनता ने विधानसभा चुनाव के लिए वोट डाला तो 175 में से 67 सीटें जगन की झोली में डालकर उन्हें नेता के तौर पर खुले दिल से मंज़ूर कर लिया.

नेता विपक्ष के तौर पर जगन मोहन रेड्डी ने सरकार को मुश्किलों में डाले रखा. साल 2017 के अंत में उन्होंने 3 हज़ार किलोमीटर की प्रजा संकल्प यात्रा निकाली. एक साल से ज़्यादा चली इस यात्रा में जगन ने 125 विधानसभाओं में संपर्क किया और ज़बरदस्त माहौल खड़ा कर दिया.

इस बीच जगन को जेलयात्रा भी करनी पड़ी. दरअसल 2011 में कड़प्पा से लोकसभा चुनाव लड़ते हुए जगन ने अपनी संपत्ति 350 करोड़ रुपए बताई थी. सवाल उठे कि इतना पैसा आया कहां से..

कांग्रेस के एक मंत्री और टीडीपी के दो नेताओं की याचिका पर अदालत ने सीबीआई से छानबीन को कहा. मई 2012 में जगनमोहन गिरफ्तार कर लिए गए. आरोप था कि कंपनियों में निवेश करने के बदले वो अपने पिता की सरकार से लोगों को सहूलियतें दिला रहे थे. सितंबर 2013 में जगन को जमानत मिली.

पिता की मौत के बाद से लगातार जगन लोगों के बीच रहे. विरोधियों से भिड़ते-जूझते रहे. उन्होंने एक पल के लिए भी आंध्र की जनता के ज़हन से वाईएसआर की छवि को फीका नहीं पड़ने दिया और आज आलम ये है कि 2019 की विधानसभा का सत्र जब बैठेगा तो सत्ता पक्ष की बेंच पर जगन 151 विधायकों के साथ होंगे जबकि उस कांग्रेस के खाते में कोई विधायक नहीं होगा जिसने 8 साल पहले उन्हें बाहर निकाल फेंका था.

कांग्रेस से निकली और कांग्रेस के ही साथ से साफ कर दिए कम्युनिस्ट
जगन से ही मिलती-जुलती ममता बनर्जी की भी कहानी है लेकिन इसकी शुरूआत काफी अलग है. ममता बनर्जी ने 1970 में तब कांग्रेस कार्यकर्ता के तौर पर राजनीति शुरू की थी जब बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टी का डंका बज रहा था. विपरीत परिस्थितियों में ममता बनर्जी ने कॉलेज से सियासत सीखनी शुरू की. उसमें भी उनकी आर्थिक हालत अच्छी नहीं थी क्योंकि स्वतंत्रता सेनानी पिता बचपन में ही गुज़र गए थे.

ममता ने शादी नहीं की. परिवार की ज़िम्मेदारी खुद पर ले ली. तीखे तेवरों से उन्होंने अपनी पहचान जल्द ही स्थापित कर ली. 1976-1980 तक वो महिला कांग्रेस के महासचिव पद पर रहीं. 1984 में वो वक्त भी आया जब उन्होंने सीपीएम के कद्दावर नेता सोमनाथ चटर्जी को जादवपुर लोकसभा सीट से हराकर देश को चौंका दिया. ये इंदिरा की मौत के बाद सहानुभीति की लहर का दौर था. उस वक्त ममता देश की सबसे युवा सांसद थीं. हालांकि 1989 में उन्होंने हार का मुंह भी देखा जब राजीव गांधी के खिलाफ माहौल बना. फिर 1991 आया जब ममता दीदी कोलकाता से जीत कर संसद पहुंचीं. उन्हें पीवी नरसिंहराव सरकार में  मानव संसाधन विकास, युवा मामलों और महिला एवं बाल विकास विभाग में राज्यमंत्री बनाया गया. वो खेल मंत्री भी थीं लेकिन मतभेदों के चलते उससे अलग हो गईं.

ममता बनर्जी ने दो साल तक केंद्र में बतौर मंत्री काम किया लेकिन मतभेद इतने गहराए कि वो कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में एक रैली आयोजित करके सब ज़ाहिर कर गईं. 1993 में वो मंत्री पद से मुक्त हो गईं और अप्रैल 1996 में उन्होंने अपनी ही पार्टी पर बंगाल में सीपीएम की कठपुतली होने का आरोप लगा दिया.

अगले ही साल 1997 में ममता बनर्जी ने ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की स्थापना कर दी. जल्द ही वो सीपीएम के सामने मुख्य विपक्षी पार्टी बनकर उभरीं. वो साल 2011 था जब ममता बनर्जी ने 34 साल से सूबे में राज कर रही सीपीएम को जड़ से उखाड़ फेंका. 294 विधानसभा सीटों में से ममता 227 जीत लीं और सीपीएम को 62 पर ला खड़ा किया. सिंगूर और नंदीग्राम में किसानों के हक में खड़े होकर उन्होंने वामपंथ की ज़मीन ही खींच ली. 2016 में भी बंगाल की जनता ने 2011 का ही नतीजा दोहराया.

कमाल की बात है कि जिस कांग्रेस को ममता ने ये कह कर छोड़ा था कि वो सीपीएम की कठपुतली बन गई है उसी का साथ लेकर उन्होंने वामपंथ का किला ढहाया. वैसे ममता बनर्जी ने अपने सहयोगी कई बार बदले. साल 1998 से 2001 के बीच वो एनडीए के साथ थीं और रेलमंत्री बनी लेकिन तहलका कांड के बाद वो अलग हो गईं, हालांकि 2004 में कुछ वक्त के लिए वो फिर लौटीं.

2006 में ममता ने यूपीए सरकार में भी मंत्रीपद का लाभ लिया. साल 2012 में ममता को टाइम्स पत्रिका ने विश्व की 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल किया था.

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