नागा साधु बनाने के लिए मां-बाप ने दान में दिया बेटा

Share this on WhatsAppप्रयागराज बारह-तेरह साल की उम्र खेलने-कूदने की होती है लेकिन कुंभ की महिमा इतनी अलौकिक है कि मेले में बाल नागा साधुओं को अस्त्र-शस्त्र सीखते देख आप दांतों तले उंगली दबा लेंगे. कोई अपनी मर्जी से नागा बना है तो किसी को मां-बाप ने दान में दे दिया. बड़ी विचित्र है इन […]

प्रयागराज

बारह-तेरह साल की उम्र खेलने-कूदने की होती है लेकिन कुंभ की महिमा इतनी अलौकिक है कि मेले में बाल नागा साधुओं को अस्त्र-शस्त्र सीखते देख आप दांतों तले उंगली दबा लेंगे. कोई अपनी मर्जी से नागा बना है तो किसी को मां-बाप ने दान में दे दिया. बड़ी विचित्र है इन बाल नागाओं की कहानी-

12 साल के कन्हैया गिरी महाराज

जूना अखाड़े के द्वार पर बैठे कन्हैया 12 साल की उम्र में नागा साधु बन गए. यज्ञ के धुएं से कन्हैया को बार-बार खांसते देख हम हैरान थे कि कैसे खेलने-कूदने की उम्र में एक बालक साधु-संतों की तरह बातें कर रहा है. कन्हैया बताते हैं कि 5 साल की उम्र में वे अखाड़े से जुड़े और संन्यासी का रूप धारण कर लिया. 6 साल उन्होंने गुरुओं की सेवा की और महापुरुष के पद तक पहुंचे. इस बार प्रयागराज कुंभ में उनका संस्कार किया गया है, वे अब पूरी तरह से नागा साधु बन चुके हैं.

अब नहीं आती घरवालों की याद

कम उम्र में घरवालों की याद आना सामान्य बात है लेकिन कन्हैया ने नागा संन्यासी बनने के बाद घर-परिवार की तरफ मुड़कर नहीं देखा. घर की याद वाले प्रश्न पर कन्हैया ने पूरी परिपक्वता से जवाब दिया- “घरवालों की शुरुआत में याद आई लेकिन अब सब सामान्य हो चुका है. एक साधु के लिए पूरी दुनिया ही परिवार है.”

मां-बाप ने दान में दिया बेटा

13 साल के नागा साधु मनीष गिरी साल 2016 में उज्जैन कुंभ के दौरान नागा साधु बने थे. उत्तरप्रदेश के मथुरा ज़िले के रहने वाले मनीष लगभग डेढ़ साल के थे तब उनके माता पिता ने उन्हें दान में दे दिया था. इस बारे में पूछने पर मनीष गिरी के गुरु नागा बाबा पुरुषोत्तम गिरी महाराज बताते हैं कि कई वर्षों तक मनीष गिरी के माता-पिता को कोई संतान पैदा नहीं हुई तो वे उनके पास आए और मन्नत मांगी. पुरुषोत्तम गिरी ने उन्हें यकीन दिलाया कि उन्हें संतान अवश्य होगी लेकिन शर्त ये रखी की पहली संतान वे धर्म की रक्षा के लिए दान में देंगे. इसीलिए जब मनीष गिरी का जन्म हुआ तो महज डेढ़ साल की उम्र में उनके माता पिता ने उन्हें नागा साधु बनने के लिए दान में दे दिया. पिछले 12 सालों से मनीष गिरी अवधूत के तौर पर अपने गुरु महाराज पुरुषोत्तम गिरी के साथ रह रहे हैं और शस्त्रों के साथ अस्त्रों की शिक्षा ले रहे हैं.

नागा बनने को उत्सुक दिखे बाल रवि

जूना अखाड़े में संस्कार के दिन रवि गिरी से मुलाकात हुई. बचपन में ही अखाड़े से जुड़े रवि गिरी के लिए यह बड़ा दिन था. पूछने पर बताया कि वे खुश हैं, सुबह से शरीर पर भभूत लगाकर बैठे हैं और अब पिंडदान करने के बाद साधुत्व को प्राप्त होंगे. दीक्षा संस्कार के बाद बाल नागाओं को भी बाकी नागाओं की तरह जीवन जीना होता है. वे दिन में एक बार भोजन करते हैं, शिव जी की पूजा करते हैं और ज़मीन पर ही सोते हैं. इसके अलावा दीक्षा के समय बाल नागाओं को भी नपुंसक बनाया जाता और वे हमेशा के लिए गृहस्थ जीवन से दूर हो जाते हैं.