SC में 57 दिन चलेगी अयोध्या केस की सुनवाई, जरूरत पड़ी तो शनिवार-रविवार को भी बैठेगी बेंच

मुस्लिम पक्षकारों की ओर से वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने कहा है कि मेरे लिए संभव नहीं होगा कि पांचों दिन कोर्ट के समक्ष इस मामले में उपस्थित हो सकूं.
Ayodhya Case, SC में 57 दिन चलेगी अयोध्या केस की सुनवाई, जरूरत पड़ी तो शनिवार-रविवार को भी बैठेगी बेंच

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद की सुनवाई आज यानी शुक्रवार को भी जारी है. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अयोध्या मामले पर कुल 57 दिन सुनवाई होगी. साथ ही इस मामले में सप्ताह में पांच दिन सुनवाई होगी, जरूरत पड़ी तो कोर्ट शनिवार और रविवार को भी सुनवाई कर सकता है.

गौरतलब है कि ऐसा पहली बार हो रहा है, जब संवैधानिक बेंच किसी केस की सप्ताह में 5 दिन सुनवाई करेगी. परंपरा के मुताबिक संवैधानिक बेंच सप्ताह में तीन दिन मंगलवार, बुधवार एवं गुरुवार को सुनवाई रही है.

मुस्लिम पक्षकारों की ओर से वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने मामले की सप्ताह के 5 दिन सुनवाई किए जाने पर आपत्ति जताई है. उन्होंने कहा है कि ‘मेरे लिए संभव नहीं होगा कि पांचों दिन कोर्ट के समक्ष इस मामले में उपस्थित हो सकूं. यह पहली अपील है और सुनवाई इस तरह हड़बड़ी में नहीं की जा सकती. इस तरह मुझे परेशान किया जा रहा है.’

वकील राजीव धवन यहीं पर नहीं रुके. उन्होंने केस छोड़ने की धमकी तक दे डाली है. उनका कहना है कि जल्दबाजी में सुनवाई होगी तो मैं ये केस छोड़ दूंगा. इस पर मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई ने कहा कि हमने आपकी दलीलों और आपत्ति को सुन लिया है. हम इस पर विचार करेंगे. जल्दी ही इस पर आपको जवाब दिया जाएगा.

Ayodhya Case Updates:

  • रामलला की ओर से के परासरन- यहां तक कि पहाड़ों की भी देवरूप में पूजा होती है.उन्होंने तिरुवन्नमलाई और चित्रकूट में होने वाली परिक्रमा का उदाहरण दिया. कहा-अयोध्या में मूर्ति रखे जाने/मंदिर स्थापित होने से बहुत पहले से वहां श्रीराम की पूजा होती रही है.
  • रामलला की ओर से के परासरन की दलील- किसी जगह को मंदिर के तौर पर मानने के लिए वहाँ मूर्ति होना ज़रूरी नहीं है. हिन्दू महज किसी एक रूप में ईश्वर की आराधना नहीं करते. अब केदारनाथ मंदिर को ही ले लो, वहां कोई मूर्ति नहीं है (वहां शिला की पूजा होती है).
  • अयोध्या मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस भूषण ने पूछा कि क्या अयोध्या में जनमस्थान के आसपास एक परिक्रमा होती है? रामलला के वकील ने कहा परासरन ने कहा कि एक परीक्षित मार्ग है, जहां लोग परीक्षित होते थे, उसमें कोई प्रतिमा नहीं थी, इससे यह निष्कर्ष निकल सकता है कि परिक्रमा जन्म स्थान की होती थी. पहाड़ों को देवताओं के रूप में पूजा जाता है. तिरुवनमलाई और चित्रकूट में परिक्रमा की जाती है, गोवर्धन में भी परिक्रमा होती है, यही तीर्थयात्रा है.
  • रामलला के वकील परासरन ने कहा कि देवता को सजीव प्राणी माना जाता है और इसे घर का स्वामी माना जाता है, ठीक उसी तरह जैसे सेवक अपने मालिकों के साथ करते हैं.
  • रामलला के वकील परासरन ने कहा कि ईश्वर कण कण में है, लेकिन विभिन्न रूपों में उसका मानवीकरण कर पूजा होती है, मंत्र पूजा और मूर्ति तो ईश्वर की पूजा का माध्यम है.
  • रामलला के वकील परासरन ने कहा राम का अस्तित्व और उनकी पूजा यहां मूर्ति स्थापित होने और मन्दिर बनाए जाने से भी पहले से है, हिंदू दर्शन में ईश्वर किसी एक रूप में नहीं है, अब केदारनाथ को ही लीजिए तो वहां कोई मूर्ति नहीं है, प्राकृतिक शिला है.

‘क्या जन्मस्थान विधिक व्यक्ति हो सकता है?’
उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के तीसरे दिन गुरुवार को रामलला विराजमान के वकील से पूछा कि क्या न्याय प्रशासन के संबंध में जन्मस्थान को विधिक व्यक्ति माना जा सकता है. मामले की सुनवाई कर रही संविधान पीठ के पांच न्यायाधीशों में शामिल न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ ने कहा कि रामलला विराजमान के वकील की दलील में कहा गया है कि जन्मस्थान विधिक व्यक्ति है क्योंकि यह पूजा की वस्तु है.

न्यायाधीश ने रामलला विराजमान के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता के. पराशरण से पूछा, “लेकिन पूजा का स्रोत क्या है? ” पीठ के अन्य न्यायाधीश ने सवालिया लहजे में कहा, “जन्मस्थान विधिक व्यक्ति कैसे हो सकता है? ”

पीठ ने यह स्पष्ट जानना चाहा कि क्या जन्मस्थान की पूजा इस विश्वास से की जाती है कि भगवान राम का वहां जन्म हुआ था. पीठ ने पूछा, “तो क्या पूजा का स्रोत यह निर्णय करने के लिए बेंचमार्क हो सकता है कि वह विधिक व्यक्ति है.”

जन्मस्थान को कानूनी व्यक्ति के रूप में प्रयोग किए जाने के महत्व को प्रतिपादित करते हुए पराशरण ने कहा कि क्या देवता की उपस्थिति ही मात्र विधिक व्यक्ति होने का परीक्षण नहीं है. उन्होंने कहा, “नदियों की पूजा की जाती है और उन्हें देवी-देवता के रूप में माना जाता है. ऋग्वेद के अनुसार, सूर्य देवता है. सूर्य प्रतिमा नहीं है लेकिन देवता है. इसलिए हम कह सकते हैं कि सूर्य विधिक व्यक्ति है.”

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