‘UPSC में जिहाद’ मामले में कल होगी सुनवाई, पढ़ें सुप्रीम कोर्ट की दिलचस्प टिप्पणियां

एक निजी चैनल के प्रोग्राम ‘UPSC जिहाद’ के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी.

  • TV9.com
  • Publish Date - 8:16 pm, Thu, 17 September 20

सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) में एक निजी चैनल सुदर्शन टीवी के ‘UPSC में जिहाद’ कार्यक्रम की सुनवाई अब शुक्रवार को होगी. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने चैनल के ‘UPSC में जिहाद’ कार्यक्रम पर रोक लगाई. बुधवार को इस मामले पर हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सेल्फ रेगुलेशन के लिए मानक तय करने को कहा है.

निजी चैनल सुदर्शन टीवी के प्रोग्राम ‘UPSC जिहाद’ के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी. इस मामले पर जस्टिस डीवाई चंद्रचूड, जस्टिस इंदू मल्होत्रा और जस्टिस के एम जोसेफ की पीठ ने सुनवाई की. सुप्रीम कोर्ट की इस पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान मीडिया की स्वतंत्रता, पत्रकारिता की नैतिकता और कोर्ट की भूमिका को लेकर गंभीर सवालों के साथ कई टिप्पण्यिां कीं. पेश हैं कुछ दिलचस्प टिप्पण्यिां…

जस्टिस चंद्रचूड: एक ऐंकर आकर कहता है कि एक विशेष समुदाय यूपीएससी में घुसपैठ कर रहा है. क्या इससे ज्यादा घातक कोई बात हो सकती है. ऐसे आरोपों से देश की स्थिरता पर असर पड़ता है और यूपीएससी परिक्षाओं की विश्वसनीयता पर लांछन लगता है.

जस्टिस के एम जोसेफ: इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की शक्ति बहुत बड़ी है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विशेष समुदायों या समूहों को लक्षित करके केंद्र बिंदु बन सकता है.

सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता: पत्रकारों की स्वतंत्रता सर्वोच्च है और प्रेस को नियंत्रित करना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए घातक होगा.

जस्टिस चंद्रचूड़:  माध्यम बदल गए हैं. अब इंटरनेट एक विस्तृत क्षेत्र है क्योंकि कोई भी इसे कहीं से भी संचालित कर सकता है. हम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को देख रहे हैं क्योंकि ये कंपनियां भारत में स्थित हैं हम यह नहीं कह सकते कि हम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को सिर्फ इसलिए नियंत्रित नहीं करेंगे क्योंकि हम इंटरनेट को नियंत्रित नहीं कर सकते.

जस्टिस जोसेफ: देश के सर्वोच्च न्यायालय के रूप में हम आपको यह कहने की अनुमति नहीं दे सकते कि मुस्लिम नागरिक सेवाओं में घुसपैठ कर रहे हैं. आप यह नहीं कह सकते कि पत्रकारों को यह करने की पूर्ण स्वतंत्रता है. .इस दौरान जस्टिस जोसेफ ने कहा, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ समस्या टीआरपी के बारे में है और इस तरह अधिक से अधिक सनसनीखेज हो जाता है तो कई चीजें अधिकार के रूप में सामने आती हैं.

जस्टिस चंद्रचूड़: यह तर्क दिया गया है कि यह कार्यक्रम देश में घृणास्पद भाषण का केंद्र बिंदु बन गया है. उन्‍होंने कहा, ‘लोग शायद आज अखबार नहीं पढ़ते, लेकिन टीवी देखते हैं. फिर स्थानीय भाषाओं में स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं की पहुंच मुख्यधारा के अंग्रेजी अखबारों से ज्यादा है. टीवी देखने का एक मनोरंजन मूल्य है जबकि समाचार पत्र के पास कोई नहीं है. इसलिए हम मानक रखना चाहते हैं.

जस्टिस जोसेफ: प्रोग्राम कोड के नियम 6 में कहा गया है कि केबल टीवी कार्यक्रम कुछ भी ऐसा नहीं दिखा सकते हैं जो किसी विशेष धर्म या समुदाय को लक्षित करता है.

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता: आपने न उन कार्यक्रमों को देखा होगा जहां “हिंदू आतंक” पर प्रकाश डाला गया था. सवाल यह है कि अदालतें किस हद तक सामग्री के प्रकाशन को नियंत्रित कर सकती हैं.

जस्टिस चंद्रचूड़: माध्यम बदल गए हैं. अब इंटरनेट एक विस्तृत क्षेत्र है क्योंकि कोई भी इसे कहीं से भी संचालित कर सकता है. हम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को देख रहे हैं क्योंकि ये कंपनियां भारत में स्थित हैं हम यह नहीं कह सकते कि हम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को सिर्फ इसलिए नियंत्रित नहीं करेंगे क्योंकि हम इंटरनेट को नियंत्रित नहीं कर सकते.

जस्टिस जोसेफ: इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ समस्या टीआरपी के बारे में है और इस तरह वह कई बार जरूरत से ज्‍‍‍‍‍‍यादा सनसनीखेज हो जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने कुछ टेलीविजन चैनलों होने दिखाई जाने वाली बहस पर चिंता जताई.

कुछ टीवी डिबेट उकसाती हैं, एंकर खुद बोलता रहता है

सुनवाई के दौरान जस्टिस जोसेफ ने कहा, ‘डिबेट में एंकर के रोल को देखने की जरूरत है। ज्यादातर समय एंकर बोलते रहते हैं और स्पीकर को म्यूट करके सवाल पूछते रहते हैं।’ तभी जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि कई बार बिना किसी आधार के आरोप लगा दिए जाते हैं। इसे कैसे इजाजत दी जा सकती है? क्या स्वतंत्र समाज में इसको इजाजत दी जा सकती है?

जस्टिस जोसेफ : पत्रकार की आजादी संपूर्ण नहीं है. जिस तरह से भारत के सभी नागरिक को विचार रखने की आजादी है, वही प्रेस को भी है। पत्रकार को अलग से आजादी नहीं मिली है.

जस्टिस चंद्रचूड़: पत्रकार को निष्पक्ष टिप्पणी करनी चाहिए। क्रिमिनल जांच में मीडिया ज्यादातर एक ही हिस्से की छानबीन पर फोकस करता है। एंकर एक समुदाय विशेष को निशाना बनाते हैं। हम एक स्टैंडर्ड चाहते हैं.

जस्टिस चंद्रचूड़: हमें विजुअल मीडिया के स्वामित्व को देखने की जरूरत है। कंपनी का संपूर्ण शेयरहोल्डिंग पैटर्न जनता के लिए साइट पर होना चाहिए. उस कंपनी के राजस्व मॉडल को यह जांचने के लिए भी रखा जाना चाहिए कि क्या सरकार एक में अधिक विज्ञापन डाल रही है और दूसरे में कम.

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर अगली सुनवाई अब शुक्रवार को होगी.