महिला अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, घरेलू हिंसा पीड़िता को ससुराल में रहने का अधिकार

सुप्रीम कोर्ट (SC) ने कहा कि अधिनियम, 2005 इस देश में महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक 'मील का पत्थर' (Milestone) है. एक महिला अपने पूरे जीवन में हिंसा और भेदभाव को खत्म करने के लिए लड़ती रहती है.

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सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण पर 2005 के कानून को 'मील का पत्थर' बताया.

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने महिला अधिकारों पर बड़ा फैसला देते हुए कहा कि अब घरेलू हिंसा (Domestic Violence) अधिनियम के तहत पीड़ित महिला को ससुराल में रहने का अधिकार होगा. परिवार (Family) पीड़िता को घर से बाहर नहीं निकाल सकता. सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण पर 2005 के कानून को ‘मील का पत्थर’ (Milestone) करार देते हुए गुरुवार को कहा कि, महिलाओं के खिलाफ इस तरह के अपराध देश में बड़े पैमाने पर हो रहे हैं, महिलाओं को किसी न किसी रूप में हिंसा का सामना करना पड़ता है.

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने कहा कि एक महिला अपने पूरे जीवन में हिंसा और भेदभाव (Violence or Discrimination) को खत्म करने के लिए लड़ती रहती है, और अंत में अपनी ही किस्मत (Faith) से हार जाती है. वह एक बेटी, एक बहन, एक पत्नी, एक मां, एक साथी के रूप में पूरे जीवन हिंसा और भेदभाव से लड़ती रहती है. कोर्ट ने कहा कि अधिनियम, 2005 इस देश में महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक मील का पत्थर है, इसके साथ ही उन्होंने कहा कि इस देश में घरेलू हिंसा काफी उग्र है और कई महिलाएं किसी न किसी रूप में हर दिन हिंसा का सामना करती हैं. हालांकि यह क्रूर व्यवहार का सबसे कम सूचित रूप है.

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ज्यादातर महिलाएं नहीं करतीं घरेलू हिंसा की शिकयत-SC

जस्टिस अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि घरेलू हिंसा के ज्यादातर मामलों की रिपोर्ट कभी नहीं की जाती है, महिलाएं इस तरह का फैसला सामाजिक कलंक और खुद के रवैये की वजह से लेती हैं. महिलाएं अपने पुरुष साथियों और पुरुष रिश्तेदारों के लिए दया की भावना रखती हैं.

कोर्ट ने कहा कि साल 2005 तक, घरेलू हिंसा की पीड़ित महिलाओं के लिए सीमित उपाय ही मौजूद थे, महिलाओं को या तो तलाक के फैसले के लिए दीवानी अदालत में जाना पड़ा या शादी में घरेलू हिंसा के लिए आपराधिक अदालत में मुकदमा चलाने की पहल की गई.

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कोर्ट ने कहा कि किसी भी समाज की प्रगति उसकी महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और बढ़ावा देने की क्षमता पर निर्भर करती है. संविधान ने महिलाओं को समान अधिकारों और विशेषाधिकारों की गारंटी देते हुए इस देश की महिलाओं की स्थिति में बदलाव की दिशा में कदम बढ़ाया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2005 का कानून महिला को उच्चाधिकार देने के लिए पारित किया गया था.

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