सबरीमाला केस की सुनवाई अब 7 जज करेंगे, SC ने कहा- सबको पूजा का अधिकार

2018 के फैसले पर पुनर्विचार की मांग वाली याचिकाओं पर संविधान बेंच ने सुनवाई की. बेंच में CJI रंजन गोगोई के अलावा जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्‍होत्रा शामिल हैं.

Sabarimala Case Judgement : सबरीमाला मामले को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने बड़ी बेंच के पास भेज दिया है. पांच जजों की बेंच ने 3-2 से यह फैसला दिया. अब इस मामले पर सात जजों की बेंच आगे की सुनवाई करेगी.

अदालत ने कहा कि “धार्मिक मान्‍यताओं को मानने का हक सभी को है. अनुच्छेद-25 के तहत महिलाओं को धार्मिक मान्यताएं निभाने का अधिकार है. सात जजों कि पीठ ने फैसला दिया था जो महत्वपूर्ण है और इसी के मद्देनजर इस मामले को बड़ी पीठ को भेजते हैं.”

हालांकि 28 सितंबर 2018 को दिए गए निर्णय पर कोई रोक नहीं लगी है, जिसमें 10 से 50 साल आयुवर्ग के बीच की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश पर लगा प्रतिबंध हटा दिया गया था. इस आदेश के अनुसार, इस मुद्दे पर बड़ी पीठ का आदेश आने तक किसी भी आयुवर्ग की महिला मंदिर में प्रवेश कर सकती है.

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) रंजन गोगोई की अध्यक्षता में पांच जजों की संविधान पीठ ने फरवरी में बहस पूरी कर ली थी. कॉन्‍स्‍टीट्यूशन बेंच में CJI के अलावा जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्‍होत्रा शामिल हैं.

जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ मंदिर में महिलाओं की एंट्री के पक्ष में थे. CJI व दो अन्‍य जजों- जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस इंदु मल्‍होत्रा ने मामले को बड़ी बेंच के सामने भेजने का फैसला दिया.

बेंच ने याचिकाओं के समूह पर अपना फैसला सुरक्षित कर लिया था. इन याचिकाओं में शीर्ष कोर्ट के 2018 के फैसले पर पुनर्विचार की मांग की गई थी. 2018 का फैसला सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश की इजाजत देता है.

CJI के इस महीने रिटायर होने से पहले सुनाए जाने वाले महत्वपूर्ण फैसलों में से यह एक है. पीठ ने केरल सरकार, त्रावणकोर देवासम बोर्ड (TDB), नायर सर्विस सोसाइटी व अन्य सहित सभी पक्षों को सुना है.

फैसले के मद्देनजर मंदिर के आसपास सुरक्षा कड़ी कर दी गई है. 10 हजार से ज्‍यादा पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं. पिछले साल सुप्रीम कोर्ट का आदेश लागू कराने के LDF सरकार के फैसले का श्रद्धालुओं और दक्षिणपंथी संगठनों ने खूब विरोध किया था.

क्‍या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला?

28 सितंबर, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सबरीमाला मंदिर में सभी महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी. कोर्ट ने साफ किया कि हर उम्र की महिलाएं अब मंदिर में प्रवेश कर सकेंगी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हमारी संस्कृति में महिला का स्थान आदरणीय है. यहां महिलाओं को देवी की तरह पूजा जाता है और मंदिर में प्रवेश से रोका जा रहा है. यह स्वीकार्य नहीं है.

ऐसे शुरू हुआ सबरीमाला विवाद

यह मंदिर लगभग 800 साल पुराना है. इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी हैं. इसी वजह से युवा महिलाओं का प्रवेश वर्जित है. 2006 में मंदिर के मुख्य ज्योतिषि परप्पनगडी उन्नीकृष्णन ने कहा था कि मंदिर में स्थापित अयप्पा अपनी ताकत खो रहे हैं. वह नाराज हैं क्योंकि मंदिर में किसी युवा महिला ने प्रवेश किया है.

कन्नड़ ऐक्टर प्रभाकर की पत्नी जयमाला ने दावा किया कि उन्होंने अयप्पा की मूर्ति को छुआ और उनकी वजह से अयप्पा नाराज हुए. अभिनेत्री ने दावा किया कि 1987 में वह अपने पति के साथ मंदिर दर्शन करने गई थीं तो भीड़ की वजह से धक्का लगने के चलते वह गर्भगृह पहुंच गईं और भगवान अयप्पा के चरणों में गिर गईं.

जयमाला का कहना था कि वहां पुजारी ने उन्हें फूल भी दिए थे. जिसके बाद उन्होंने प्रायश्चित करने की इच्छा ज़ाहिर की. जयमाला के दावे पर केरल में हंगामा होने के बाद इस मुद्दे पर लोगों का भी ध्यान गया. साल 2006 में केरल के लॉयर्स असोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में इसके खिलाफ याचिका दायर की.

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