जिस बस्ती को खाली कराने में छूटने थे पसीने, उसे बिना खटपट खाली कराया…पढ़ें वो आंखों देखा किस्सा

शीला दीक्षित ने बिना किसी आडंबर के विकास को अंजाम दिया. प्रचार कम और काम ज्यादा करने में यकीन रखती थीं. शीला दीक्षित का एक वाकया याद आता है.
sheila dikshit, जिस बस्ती को खाली कराने में छूटने थे पसीने, उसे बिना खटपट खाली कराया…पढ़ें वो आंखों देखा किस्सा

नई दिल्ली: बीसवीं सदी के अंतिम दशक में दिल्ली पधारने वालों में शीला की एक अलग पहचान हमेशा कायम रहेगी. उन्हीं में से मैं भी हूं. यू-स्पेशल और डीटीसी बसें हमारे लिए मुफ्त दिल्ली दर्शन का जरिया होती थी. मदनलाल खुराना और साहिब सिंह वर्मा के काल में डीटीसी का मुफ्त पास भी मिल गया था.

लेकिन दिल्ली को नापने का काम उन्हीं मुफतिया पास के जरिए शीला के कार्यकाल में ही हमने भी संपन्न किया. ये बस यात्राएं कालांतर में बदलती दिल्ली को भांपने का जरिया भी साबित हुई. गोल मार्केट में रहते हुए दिल्ली को बदलते देखा.

शीला दीक्षित ने बिना किसी आडंबर के विकास को अंजाम दिया. प्रचार कम और काम ज्यादा करने में यकीन रखती थीं शीला दीक्षित. एक वाकया याद आता है.

संयोग से 1998 में वो गोल मार्केट विधानसभा से ही चुनी गईं. मैं बंगला साहब मार्ग पर रहता था. वहां शिवाजी स्टेडियम के पास एक झुग्गी बस्ती थी. एकदम दिल्ली के दिल क्नॉट प्लेस के पास. ये अवैध बस्ती थी. जब इसे हटाने की कोशिश 2000 में शुरू हुई तो जबर्दस्त विरोध हुआ.

शीला दीक्षित खुद आईं. बिना किसी लाउडस्पीकर के लोगों के बीच घुस कर कुछ बात हुई. बाद में पता चला उन्हें कहीं बाहर बसाने का फैसला हुआ है. बिना किसी खटपट के अगले कुछ महीनों में वो इलाका खाली हो गया.

तब पता नहीं क्यों हमारे जैसे प्रवासी लक्ष्मी नगर को दिल्ली पार कहते थे. आईटीओ के आगे पुराने पुल के बाईं ओर यमुना किनारे भी एक ऐसी ही बड़ी बस्ती थी. अगर याद हो तो शादियों के लिए घोड़े और हाथी यहीं बुक होते थे.

1996 वर्ल्ड कप में ये बस्ती सुर्खियों में आई थी जब झुग्गी के बीच कंक्रीट के ऐशगाह पाए गए और सट्टेबाजी के बड़े रैकेट का भंडाफोड़ हुआ. ये पूरी बस्ती भी बिना किसी शोर शराबे के खाली हुई. दरअसल शीला गरीबों के बीच काफी लोकप्रिय रहीं.

हालांकि गरीबों के लिए फ्लैट बनाने में अरबों रूपए के घोटाले का भी उन पर आरोप लगा. बाद में लोकायुक्त ने इस आरोप को बेबुनियाद बताया. मुफ्त डीटीसी पास के सहारे रिंग रोड का चक्कर लगाना भी तब एक शगल था. आजादपुर, मोतीबाग, धौला कुंआ के लंबे रेड लाइट और जाम आज भी याद हैं जो शीला की सरकार ने गायब कर दिए.

रेड लाइट फ्री बनाने की मुहिम और छोटे – बड़े ओवरब्रिज इतने बने कि जन-दबाव बढ़ने के बावजूद दिल्ली दौड़ती रही. कॉमनवेल्थ गेम्स और 2012 का निर्भया कांड शीला के राजनीतिक पतन का कारण बना लेकिन दिल्ली के विकास में उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता.

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