Muharram in Delhi: 700 सालों में पहली बार नहीं निकलेगा ताजियों का जुलूस

भारत में ताजिये (Tazia) के इतिहास के बारे में बताया गया है कि इसकी शुरुआत तैमूर लंग (Timur Lung) के दौर में हुई. तैमूर को खुश करने के लिए देशभर में ताजिये बनने लगे थे. ताजिये की यह परंपरा भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार में भी चली आ रही है.

  • TV9 Hindi
  • Publish Date - 11:50 pm, Sun, 23 August 20

दिल्ली में ताजिया (Tazia) रखने का सिलसिला मुगलकाल से ही चला आ रहा है, लेकिन 700 सालों में ऐसा पहली बार होगा कि मुहर्रम (Muharram) पर ताजिये तो रखे जाएंगे, लेकिन इनके साथ निकलने वाला जुलूस नहीं निकल सकेगा. यह बात हजरत निजामुद्दीन औलिया दरगाह शरीफ (Nizamuddin Auliya Dargah Sharif) के प्रमुख कासिफ निजामी ने कही.

कोरोना के चलते नहीं मिली जुलूस की अनुमति

निजामी ने कहा, “भारत-पाकिस्तान बंटवारे के समय यानी 1947 में भी दरगाह से ताजियों के साथ निकालने वाले जुलूस पर पाबंदी नहीं लगी थी, लेकिन इस बार कोरोना संक्रमण (Coronavirus) के चलते दिल्ली और केंद्र सरकार से धार्मिक सामूहिक कार्यक्रम की अनुमति नहीं है. इसलिए मोहर्रम पर ताजिये के साथ जुलूस निकालने की अनुमति भी नहीं मिली है.”

कर्बला में रखा जाएगा सिर्फ ताजिये का फूल

उन्होंने बताया, “700 सालों से ज्यादा समय से दरगाह से कुछ ही दूरी पर स्थित इमामबाड़ा (Imambara) में सबसे बड़ा फूलों का ताजिया रखा जाता है. यहां और चार ताजिये रखे जाते हैं. 10वीं मुहर्रम पर दरगाह से ताजियों के साथ छुरी और कमां का मातमी जुलूस निकलता है. नौजवान हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद करके अपने बदन से लहू बहाते हैं, लेकिन इस बार कोरोना संक्रमण के चलते इन सब पर पाबंदी लगी है, इसलिए इस बार कर्बला (Karbala) में सिर्फ ताजिये का फूल भेजा जाएगा.”

सोशल डिस्टेंसिंग के साथ मजलिस की अनुमति

दिल्ली (Delhi) के अलीगंज जोरबाग में शा-ए-मरदान दरगाह और अंजुमन कर्बला कमेटी के सदस्य गौहर असगर कासमी ने बताया, “हर साल मुहर्रम की पहली तारीख से ही मजलिसें शुरू हो जाती हैं. ज्यादा जगहों पर ताजिये भी रख दिए जाते हैं. दस तारीख को यहां लगभग 70 बड़े ताजियों के साथ जुलूस पहुंचता है.”

उन्होंने कहा, “यहां पर ताजियों को दफन किया जाता है. 12 तारीख को तीज पर मातम का जुलूस निकलता है. लेकिन इस बार प्रशासन से अनुमति नहीं मिली है. सिर्फ इमामबाड़ा में मजलिस का आयोजन हो रहा है. कोरोनावायरस के चलते हो रही मजलिस का सोशल डिस्टेंसिंग के साथ आयोजन में भाग लेने की अनुमति दी जा रही है.”

जोरबाग की कर्बला है सबसे पुरानी कर्बला

उन्होंने बताया, “जोरबाग की कर्बला (Karbala Jor Bagh) सबसे पुरानी कर्बला है. यहां तैमूर लंग के शासनकाल से ताजिये रखने का सिलसिला चला आ रहा है. कर्बला में दिल्ली के आखिरी सुल्तान बहादुर शाह जफर की दादी कुदशिया बेगम की भी कब्र है.” मुहर्रम पर हर साल हिंदू-मुस्लिम एकता भी देखने को मिलती है. हजारों की संख्या में लोग मुहर्रम के मातमी जुलूस में शामिल होने के लिए पहुंचते थे.

कोरोना के चलते लोग नहीं खरीद रहे ताजिये

हजरत निजामुद्दीन औलिया दरगाह (Hazrat Nizamuddin Auliya Dargah) से जुड़े मोहम्मद जुहैब निजामी ने बताया, “आसपास के कई हिंदू परिवार भी आस्था की वजह से कई सालों से ताजिये रखते चले आ रहे हैं. वहीं महरौली का एक हिंदू परिवार तो कई दशकों से ऐसा कर रहा है.”

कोरोनावायरस ने ताजिये के कारोबार से जुड़े लोगों की जिंदगी पर भी असर डाला है. पूरी दिल्ली में हजारों की संख्या में ताजिये बनाए जाते हैं, लेकिन इस बार कोरोना के चलते लोग अकीदत के लिए ताजिये खरीद नहीं रहे हैं.

मुहर्रम के दिन मुस्लिम समुदाय के लोग हुसैन की शहादत में उन्हें याद करते हैं. शोक के प्रतीक के रूप में इस दिन ताजिये के साथ जूलूस निकालने की परंपरा है. ताजिये का जुलूस इमाम बारगाह (Imam Bargah) से निकलता है और कर्बला में जाकर खत्म होता है.

तैमूर लंग के दौर में हुई थी ताजिये की शुरुआत

भारत में ताजिये के इतिहास के बारे में बताया गया है कि इसकी शुरुआत तैमूर लंग (Timur Lung) के दौर में हुई. ईरान, अफगानिस्तान, इराक और रूस को हराकर भारत पहुंचे तैमूर लंग ने यहां पर मुहम्मद बिन तुगलक को हराकर खुद को शहंशाह बनाया. साल में एक बार मुहर्रम मनाने वह इराक जरूर जाता था. लेकिन एक साल बीमार रहने पर वह मुहर्रम मनाने इराक नहीं जा पाया, दिल्ली में ही मनाया.

तैमूर को खुश करने के लिए बनने लगे थे ताजिये

तैमूर के इराक नहीं जाने परे उसके दरबारियों ने अपने शहंशाह को खुश करने की योजना बनाई. दरबारियों ने देशभर के बेहतरीन शिल्पकारों को बुलवाया और उन्हें कर्बला में स्थित इमाम हुसैन की कब्र के जैसे ढांचे बनाने का आदेश दिया. बांस और कपड़े की मदद से फूलों से सजाकर कब्र जैसे ढांचे तैयार किए गए और इन्हें ताजिया नाम दिया गया और इन्हें तैमूर के सामने पेश किया गया. उसके बाद तैमूर को खुश करने के लिए देशभर में ताजिये बनने लगे. ताजिये की यह परंपरा भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार में भी चली आ रही है. (IANS)