महाबलीपुरम से चीन का 1,300 साल पुराना है रिश्ता, जिनपिंग को इतिहास दिखाएंगे पीएम मोदी

कांचीपुरम में 7वीं सदी में पल्लव शासन के दौरान चीनी यात्री ह्वेन सांग आए थे.
Mahabalipurams China connection, महाबलीपुरम से चीन का 1,300 साल पुराना है रिश्ता, जिनपिंग को इतिहास दिखाएंगे पीएम मोदी

महाबलीपुरम या ममल्‍लापुरम, तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई से दक्षिण में 56 किमी. दूर पीएम मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाक़ात होने वाली है. 11-12 अक्टूबर को होने वाली यह मुलाक़ात अनौपचारिक है जैसे कि वुहान की मुलाक़ात थी. चीन और इस शहर का रिश्ता बौद्ध धर्म और पल्लव वंश की वजह से पुराना है.

किसी भी देश के राष्ट्राध्यक्ष की अगवानी आमतौर पर पीएम नरेंद्र मोदी दिल्ली में ही करते रहे हैं, लेकिन चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का एक बार फिर से वह लीक से हटकर स्वागत करेंगे. मंदिरों के इस शहर में शी जिनपिंग से पीएम मोदी की मुलाकात का खास कूटनीतिक और ऐतिहासिक महत्व हैं.

चीन के साथ मामल्लपुरम (महाबलीपुरम) के प्राचीन संबंध से इस सम्मेलन को ऐतिहासिक बल मिलने की संभावना है. शक्तिशाली पल्लव शासकों का मामल्लपुरम लंबे समय तक फलता-फूलता बंदरगाह रहा था. पल्लव वंश का चीन के साथ भी संबंध रहा था. उन्होंने अपने शासनकाल में वहां दूत भेजे थे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बैठक की तैयारियां जोरशोर से चल रही हैं. ऐसे में जब हम पुरातात्विक साक्ष्यों पर नजर डालते हैं तो पता चलता है कि बैठक स्थल मामल्लपुरम (महाबलीपुरम) का करीब 2000 साल पहले चीन के साथ खास संबंध था.

मशहूर पुरातत्वविद एस राजावेलू ने कहा कि तमिलनाडु के पूर्वी तट पर बरामद हुए पहली और दूसरी सदी के सेलाडॉन (मिट्टी के बर्तन) हमें चीनी समुद्री गतिविधियों के बारे में बताते हैं.

उन्होंने कहा कि ऐसे साक्ष्य और अन्य पुरातात्विक सबूतों से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वर्तमान मामल्लपुरम और कांचीपुरम जिले के तटीय क्षेत्रों समेत इन क्षेत्रों का चीन के साथ संबंध था.

उन्होंने कहा कि उस काल के चीनी सिक्के भी तमिलनाडु में मिले हैं. उनसे पता चलता है कि इन क्षेत्रों का चीन के साथ प्राचीन व्यापारिक संबंध था.

कांचीपुरम में 7वीं सदी में पल्लव शासन के दौरान चीनी यात्री ह्वेन सांग आए थे और राजा महेंद्र पल्लव ने उनकी अगवानी की थी.

अब करीब 1300 वर्ष बाद पीएम नरेंद्र मोदी चीनी प्रेजिडेंट शी जिनपिंग का इस ऐतिहासिक नगरी में स्वागत करेंगे. यहां से एक तरह से संदेश देने की कोशिश की जाएगी कि चीन और भारत के व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध आज के नहीं बल्कि सदियों पुराने हैं.

सूत्र बताते हैं कि मोदी और शी भारत में दूसरे अनौपचारिक सम्मेलन में मुलाकात के दौरान वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर माहौल में स्थिरता कायम रखने और दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों में संतुलन बनाने पर जोर देंगे. इस समिट से सीमा विवाद समाधान के अगले चरण और व्यापार घाटा कम करने के लिए चीन को भारतीय निर्यात बढ़ाने के उपाय तलाशने में मदद मिलेगी.

दोनों नेता वुहान समिट में तय अजेंडे पर अब तक हुई प्रगति की समीक्षा भी करेंगे. मामले से वाकिफ लोगों ने बताया कि वुहान समिट के बाद भारत-चीन के बीच कई क्षेत्रों में साझेदारी को स्थिरता मिली है. मोदी और शी 2020 में दोनों देशों के बीच राजनयिक रिश्तों के 70 वर्ष पूरे होने पर होने वाले कार्यक्रम की रूपरेखा पर भी बातचीत करेंगे.

गौरतलब है कि चीनी राष्ट्रपति का भारत दौरा उस वक्त हो रहा है, जब वहां की पेइचिंग ने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने के भारत के फैसले के खिलाफ कई बार कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त कर चुका है.

पीएम नरेंद्र मोदी ने 2014 में भी शी जिनपिंग से दिल्ली की बजाय अहमदाबाद में मुलाकात की थी. उस दौरान वह उन्हें साबरमती आश्रम और रिवर फ्रंट भी ले गए थे. यही नहीं पीएम नरेंद्र मोदी ने जिनपिंग के साथ ही अपना जन्मदिन भी मनाया था. सत्ता में आने के कुछ महीनों बाद ही जिनपिंग से इस मुलाकात से पहले पीएम मोदी ने डोकलाम में गतिरोध से निपटने में भी सफलता हासिल की थी.

एक बार फिर से 5 साल बाद पीएम मोदी और शी जिनपिंग की अनौपचारिक समिट होने वाली है.

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