जमीन वही, बीज वही, तरीका अलग और फायदा भी अलग…पढ़ें तीन किसानों की कहानी

कई सालों से किसान और कई बड़ी कंपनियों के बीच करार के तहत खेती हो रही है. FPO यानी फॉर्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन किसानों की किस्मत बदल रहे हैं.

  • TV9 Hindi
  • Publish Date - 12:05 am, Thu, 1 October 20

आज मध्यप्रदेश के सिहोर में 55 साल के एक किसान ने खुदकुशी कर ली. घरवालों का कहना है कि नन्नूलाल वर्मा नाम के इस किसान ने घर बनाने के लिए बैंक से 7 लाख रुपये का लोन लिया था. लेकिन उसकी सोयाबीन की फसल चौपट हो गई और कर्ज में डूबे किसान ने खुदकुशी कर ली.

किसानों के लिए बने तीन नए कानूनों पर अभी बहस जारी है और इसी बीच एक किसान की खुदकुशी विचलित करने वाली है. दरअसल मौजूदा हालात में ये महत्वपूर्ण नहीं है कि केंद्र सरकार के कानून किसानों को कितना फायदा पहुंचाएंगे. महत्वपूर्ण ये है कि देश को रोटी देने वाले किसानों के हालात बदलें और उसे खुदकुशी ना करना पड़े.

इसकी फिक्र होनी चाहिए. पक्ष-विपक्ष को इसके लिए साथ बैठना चाहिए. लेकिन लोकतंत्र का जैसे उसूल बन गया है कि एक कानून के साथ होगा और दूसरा उसके खिलाफ होगा. इसी फिक्र के साथ देश में धरना प्रदर्शन भी हो रहे हैं.

केंद्र के नए किसान कानून के विरोध में देशभर में कई जगहों पर धरना प्रदर्शन जारी है. अंबाला में आज मजदूरों ने नेशनल हाईवे जाम किया. जबकि अमृतसर में किसानों ने रेल रोको प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि नए कानून से किसान बड़ी कंपनियों के गुलाम बन जाएंगे और केंद्र को अपने कानून वापस लेने होंगे.

मंडियों में नहीं मिलता सही दाम

दरअसल देश के किसान और कंज्यूमर की चर्चा हम लगातार कर रहे हैं. हमने आपको बताया था कि देश के किसानों की मजबूरी क्या है और मंडियों में किसानों का किस कदर शोषण हो रहा है. आज हम पड़ताल को आगे बढ़ा रहे हैं और हम कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की तह तक आपको ले चलेंगे क्योंकि ये कानून का अहम हिस्सा है.

इसे किसानों की गुलामी का कानून बताया जा रहा है. लेकिन इससे पहले कि हम इसके आंकड़ों में उलझें. आपको सीधे ग्राउंड पर ले चलते हैं. आपको याद होगा कि पिछले रविवार को प्रधानमंत्री ने मन की बात में तीन किसानों की चर्चा की थी. हमने उन्हीं किसानों की कहानी समझने की कोशिश की.

आखिर क्या वजह है कि प्याज की बंपर पैदावार होती है तो कीमत कौड़ियों में चली जाती है. नाराज किसान अपना प्याज सड़क पर फेंककर चला जाता है.

14 करोड़ छोटे किसान

भारत में 14 करोड़ 64 लाख किसान परिवार हैं. जिनमें से 12 करोड़ परिवारों के पास 2 हेक्टेयर या उससे भी कम जमीन है. यानी इतनी कम जमीन कि खेती करना और परिवार चलाना मुश्किल हो जाता है. ऊपर से कभी सूखा, कभी बेमौसम बारिश तो कभी टिड्डियों का हमला.

ऐसा लगता है जैसे देश के किसान फूटी किस्मत लेकर ही पैदा हुए हैं. माना जा रहा है कि ये ही हालात बदलने के लिए कृषक सशक्‍तिकरण व संरक्षण कीमत आश्‍वासन और कृषि सेवा पर करार कानून बना है, जिसमें किसान कॉन्ट्रैक्ट खेती कर सकता है और फायदा कमा सकता है.

क्योंकि इससे बाढ़, सूखा या और फसल खराब होने का रिस्क किसानों के सिर से हट जाएगा. जिन कंपनियों से कॉन्ट्रैक्ट होगा, वो सारे रिस्क उठाएंगी. बावजूद इसके नए किसान कानून पर हायतौबा क्यों मची है? ये समझने के लिए हमने उन किसानों के घर का रुख किया जिनकी कामयाबी की कहानी मन की बात कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुनाई. हमारा पहला ठिकाना बना गुजरात जहां के बनासकांठा के किसान इस्माइल भाई की चर्चा पीएम मोदी ने की.

इस्माइल भाई के पिता खेती करते थे, लेकिन उनको अक्सर नुकसान ही होता था. तो पिता जी ने मना भी किया, लेकिन परिवारवालों के मना करने के बावजूद इस्माइल भाई ने सोच लिया था कि खेती घाटे का सौदा है वो इस सोच और स्थिति दोनों को बदलकर दिखाएंगे.

इस्माइल भाई आज एक खुशहाल किसान हैं. लेकिन हैरत की बात ये है कि वो कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग ही कर रहे हैं. जिस पर तथाकथित किसानों ने सिर पर आसमान उठा रखा है.

इस्माइल का कहना है कि पपीते की खेती की थी, तो उसमें 20 एकड़ में से 80 लाख का पपीता बेचा है. आलू की खेती करते हैं, तो कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग हैं. जिसमें एक एकड़ से 1 लाख रुपया प्रॉफिट कमाते हैं. मिर्च की खेती से सालाना 1 लाख से डेढ़ लाख रुपए का प्रॉफिट होता है. करेले की खेती में भी एक एकड़ में डेढ़ लाख का प्रॉफिट होता है.

प्रॉफिट का ये फॉर्मूला ना तो कोई रहस्य था. ना ही इसे समझने के लिए बड़े दिमाग या बड़े आंकड़ों की जरूरत थी. इस्माइल भाई ने जिस दिन आलू फेंक रहे किसानों को देखा. उसी दिन ये समझ लिया कि अगर दाम पहले से तय हो. लागत और मुनाफे का हिस्सा बंटा हो तभी फायदा है. नहीं तो बंपर फसल पैदा करके बिचौलिये के आगे गिड़गिड़ाना होता है और औने-पौने दाम में फसल बेचकर आना होता है या फिर गुस्से में महीनों की मेहनत सड़क पर बिखेर देनी होती है.

इस्माइल कहते हैं कि आलू का 5 साल का सर्वे करें, तो 5 में से 3 साल तो घाटे में जाता है. रेट सही नहीं लगता. 2 साल अच्छा जाता है. इससे अच्छा है कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग करें, तो हर साल प्रॉफिट होता है. कॉमर्शियल आलू लगाने से प्रॉफिट ज्यादा होने के कारण कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग में ही जाना चाहिए.

इस्माइल कहते हैं कि जमीन वही, बीज वही, बस तरीका अलग है, कायदा अलग और फायदा भी अलग. इस फॉर्मूले के साथ इस्माइल भाई ने आसपास के दर्जनों छोटे किसानों को भी एकजुट किया है. इस्माइल ने कहा कि आज हमने वसीला गांव में एक नया कॉन्सेप्ट बनाया है, 120 छोटे किसानों को इकट्ठा करके सामूहिक खेती की तरफ आगे बढ़ाया है, पूरा गांव एक साथ खेती करता है. छोटे किसान आज खेती में सक्षम हुए हैं, जो खेती छोड़कर जाते थे, आज वो बड़े किसान हो चुके हैं.

बिचौलियों को किसानों से बचा रहे FPO

किसानों से जुड़े तीन कृषि कानूनों का विरोध हो रहा है. कृषि कानून के जरिए किसान कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कर सकता है. लेकिन ऐसा नहीं है कि देश में किसान पहली बार कोई कॉन्ट्रैक्ट खेती करेंगे. लेकिन जब मोदी सरकार उसी का कानून बनाकर किसानों का हित बताकर लाई, तो विरोध शुरू हो गया. कई सालों से किसान और कई बड़ी कंपनियों के बीच करार के तहत खेती हो रही है. FPO यानी फॉर्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन किसानों की किस्मत बदल रहे हैं.

किसान बिलों को लेकर इस वक्त सबसे ज्यादा हंगामा पंजाब में बरपा है. इसलिए हम आपको पंजाब के ही उदाहरण से समझाते हैं कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग किसानों की माली हालत सुधारने में कितनी कारगर हो सकती है.

मोगा में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से जुड़े किसानों की प्रति महीना आय 6156 रुपये है. जबकि नॉन कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के किसानों की करीब साढ़े पांच हजार रुपये है. अमृतसर और तरणतारन में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग करने वाले किसानों की आय नॉन कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग वाले किसानों से तो करीब ढाई गुना ज्यादा है. मोगा में तो कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की वजह से किसानों की आय साढ़े इक्वायन फीसदी बढ़ी है, जबकि अमृतसर और तरणतारन में 118 फीसदी बढ़ी है.

जिस सूबे में किसान बिल को लेकर सबसे ज्यादा हो-हल्ला मचा हुआ है, वहां की असलियत कुछ अलग है. कैसे वहां कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग लोगों के लिए फायदेमंद साबित हुई है. लेकिन किसान का ये फायदा उन बिचौलियों को बर्दाश्त नहीं है, जिन्होंने किसान को हमेशा लूटा है और उन्हें मजबूर बनाया है.

सरकार का दावा है कि नए कानून से किसानों की आय बढ़ेगी और बिचौलियों की लूट से किसान बचेगा. लेकिन ये कितना कारगर साबित होगा? फॉर्मर प्रोड्यूसर किसान समूह की कहानी समझने के लिए TV9 की टीम लखनऊ पहुंची, जिसकी तारीफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात में की थी.

लखनऊ का किसानों का एक समूह है, उन्होंने इसका नाम रखा है इरादा फार्मर प्रोड्यूसर. इन्होंने लॉकडाउन के दौरान किसानों के खेतों से सीधे फल और सब्जियां लीं और सीधे जाकर लखनऊ के बाजारों में बेचा. बिचौलियों से मुक्ति हो गई और मनचाहे दाम किसानों को मिले. इरादा फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी के CEO दयाशंकर सिंह किसानों की जिंदगी बदलने में जुटे हैं.

दरअसल, बिचौलियों के चंगुल में फंसने का खामियाज़ा न सिर्फ किसान का परिवार भुगतता है बल्कि हमारे और आपके जैसा एक आम उपभोक्ता भी भुगतते हैं. क्योंकि इससे एक ओर जहां किसान को उसकी उपज का कम दाम मिलता है तो दूसरी ओर उसी उपज के लिए आम उपभोक्ता को ज्यादा खर्च करना पड़ता है. ऐसे में किसानों को फायदा भी हो और उपभोक्ता को सही और पौष्टिक उत्पाद मिले ये किसी सपने से कम नहीं.

दयाशंकर सिंह बताते हैं कि फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी के माध्यम से किसानों को इनपुट उपलब्ध करा दे रहे हैं. इनकी बाजार व्यवस्था सुनिश्चित करा दे रहे हैं. हम पूरी पारदर्शिता के साथ किसानों को बताते हैं कि हम इस रेट पर माल ले जा रहे हैं, इस रेट पर मंडी में बिक रहा है. हम आपको प्रॉफिट का 40% दे रहे हैं, आप हमारी कंपनी के हिस्सेदार हैं.

आज लखनऊ के मॉल इलाके के करीब पांच सौ किसान इरादा फार्मर प्रोड्यूसर के साथ जुड़े हैं. जो फसलों के अलावा फल और सब्जियां उगाते हैं. एक साथ खेती करते हैं. जिसका फायदा भी उन्हें मिल रहा है. आमदनी कई गुना बढ़ गई है क्योंकि उन्हें मंडी या बिचौलियों के फेर में नहीं पड़ना पड़ रहा है.

लखनऊ के किसान निशांत बताते हैं कि पहले खेतीबाड़ी कम होती थी, फल कम होते थे, साथ जुड़े, तो पैदावर बढ़ी है. पहले अगर 1 हजार मिलता था, तो अभी 5 हजार मिलते हैं, इतना फर्क है. परिवार अब अच्छा चल रहा है, पहले ज्यादा मेहनत करनी पड़ती थी, अब ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती है.

हरियाणा के कंवल सिंह बदल रहे  5 हजार किसानों की किस्मत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात में बनासकांठा के इस्माइल भाई और लखनऊ के किसान समूह इरादा के अलावा हरियाणा के सोनीपत के एक किसान का भी जिक्र किया. जिनका नाम है कंवल सिंह चौहान. TV9 की टीम उनके गांव भी पहुंची और उनकी कामयाबी की कहानी के बारे में जाना, जिसका जिक्र प्रधानमंत्री ने किया है.

चार साल पहले उन्होंने अपने गांव के साथी किसानों के साथ मिलकर एक किसान उत्पादक समूह की स्थापना की. आज गांव के किसान स्वीटकॉर्न और बेबीकॉर्न की खेती करते हैं. उनके उत्पाद आज दिल्ली की आजादपुर मंडी, बड़ी रिटेल चेन और फाइव स्टार होटलों में सीधे सप्लाई हो रहे हैं.

सोनीपत के अटेरना गांव के कंवल सिंह चौहान यूं तो 1978 से खेती से जुड़े हुए हैं. पारंपरिक खेती को छोड़कर 1998 में उन्होंने बेबीकॉर्न की खेती शुरू की और धीरे-धीरे कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से जुड़ गए. जिससे ना सिर्फ उनकी बल्कि पूरे गांव के किसानों की माली हालत बदल गई.

कंवल सिंह ने कहा कि एफपीओ बनाकर किसानों को अपने साथ जोड़कर काम कर रहे हैं. हमारे यहां बेबी कॉर्न की खेती होती है, 1998 में बेबीकॉर्न की खेती मैंने शुरू की थी, फिर आसपास के किसानों ने शुरू की फिर पूरे गांव क्षेत्र के किसानों ने शुरू कर दी. 5 हजार किसान हमारे साथ जुड़ गए.
300-400 लोग हमारी फैक्ट्री में काम करने लगे.

मिल चुका है पद्मश्री

कंवल सिंह चौहान को 2019 में पद्मश्री अवॉर्ड से भी नवाजा जा चुका है. क्योंकि उन्होंने कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के कॉन्सेप्ट को ना सिर्फ अपनाया. बल्कि उससे खेती की नई तस्वीर उकेरकर अपने इलाके के किसानों की तकदीर बदल दी. अब यहां के किसान खुद ढाई से तीन लाख रुपए प्रति एकड़ कमाई कर रहे हैं और लोगों को रोजगार भी दे रहे हैं.

हिंदुस्तान के ये तीन किसान एक उदाहरण की तरह देखे जा सकते हैं. लेकिन इसके साथ ढेरों सवाल भी हैं. सवाल ये है कि ये किसान तभी कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कर सकते हैं जब इन्हें कॉन्ट्रैक्टर मिलेगा. लेकिन देश के ढेरों किसानों के पास ये विकल्प ही नहीं है और एक सच ये भी है कि कंपनियों की गुलामी की जो आशंका जताई जा रही है वो सच भी हो सकती है. सवाल है कि तब सरकारें क्या इनकी मदद करेगी. जिसकी उम्मीद एक किसान को कम ही होती है. लेकिन सवाल फिर वहीं आता है कि सूरत बदलने की कोशिश तो होनी ही चाहिए.