UPSC जिहाद सीरीज: जकात फाउंडेशन के जरिए देश की सबसे कठिन परीक्षा पर सवाल उठाना कितना सही?

केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया कि उसने सुदर्शन टीवी को एक कारण बताओ नोटिस भेजा है कि चैनल बताए कि उसके खिलाफ प्रोग्राम कोड के कथित उल्लंघन के लिए कार्रवाई क्यों न की जाए? जो चैनल ने 'UPSC जिहाद' कार्यक्रम के प्रसारण द्वारा किया है.

हिंदी न्यूज चैनल सुदर्शन टीवी (Sudarshan TV) की चार पार्ट की एक सीरीज, बिंदास बोल – UPSC जिहाद (UPSC Jihad) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हेट स्‍पीच मामले में सुनवाई चल रही है. 24 सितंबर को केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया कि उसने सुदर्शन टीवी को एक कारण बताओ नोटिस भेजा है कि चैनल बताए कि उसके खिलाफ प्रोग्राम कोड के कथित उल्लंघन के लिए कार्रवाई क्यों न की जाए? जो चैनल ने ‘UPSC जिहाद’ कार्यक्रम के प्रसारण द्वारा किया है.

सुदर्शन टीवी को इस नोटिस का जवाब 28 सितंबर तक देना है और सुप्रीम कोर्ट मामले में अगली सुनवाई 5 अक्टूबर को करेगा. वहीं सुदर्शन टीवी की सीरीज के प्रसारण पर सुप्रीम कोर्ट (SC) की तरफ से लगाई गई रोक फिलहाल जारी रहेगी.

आज हम चर्चा करेंगे कि क्या सुदर्शन टीवी ने इस सीरीज के द्वारा मुस्लिम समुदाय के प्रार्थियों द्वारा भारतीय प्रशासनिक सेवाओं, विशेष कर IAS और IPS की परीक्षाओं की तैयारी के लिए ,कोचिंग कराने वाले एक संगठन, जकात फाउंडेशन पर जो आरोप लगाए हैं, क्या उनमें सच्चाई है? क्या वाकई यह कोशिश की जा रही है कि भारतीय प्रशासनिक सेवाओं पर मुस्लिम समुदाय का कब्जा हो जाए?

“UPSC जिहाद” नाम रखने के पीछे का कारण

सुदर्शन टीवी के मुख्य संपादक ने सुप्रीम कोर्ट के सामने कहा है कि चैनल ने इस सीरीज का नाम “UPSC जिहाद” इस लिए रखा क्योंकि उनके पास जानकारी है कि IAS, IPS और अन्य प्रशासनिक सेवाओं की परीक्षा के लिए कोचिंग देने वाले जकात फाउंडेशन की फंडिंग में ऐसे संगठन शामिल हैं, जिनका संबंध आतंकी गतिविधियों से है.

टीवी चैनल के मुख्य संपादक का कहना है कि ऐसा नहीं है कि जकात फाउंडेशन के सभी दाता आतंकी गतिविधियों से जुड़े हुए हैं, लेकिन कुछ संगठन या तो आतंकी गतिविधियों से जुड़े हुए हैं या खुद चरमपंथी गुटों को फंड करते हैं. जकात फाउंडेशन इस तरह के पैसे से UPSC परीक्षा के प्रार्थियों को कोच करता है.

जकात फाउंडेशन पर सुदर्शन टीवी के गंभीर आरोप

सुदर्शन टीवी का आरोप है कि जकात फाउंडेशन को UK के मदीना ट्रस्ट से पैसा मिलता है. इस ट्रस्ट के एक मेंबर का नाम डा. जाहिद अली परवेज है, जो इस्लामिक फाउंडेशन नाम के एक संगठन के भी ट्रस्टी हैं.

UK के अखबार द टाइम्स के हवाले से सुदर्शन टीवी का कहना है कि इस्लामिक फाउंडेशन के दो ट्रस्टियों को संयुक्त राष्ट्र की उस प्रतिबंध लिस्ट में पाया गया, जो तालिबान और अलकायदा से संबंधित थे. जकात फाउंडेशन को UK के मुस्लिम एड संगठन से भी पैसा मिलता है.

सुदर्शन टीवी ने मिडिल ईस्ट फोरम के इस्लामिस्ट वॉच के डायरेक्टर, सैम वेस्ट्रोप के हवाले से बताया है कि मुस्लिम एड को बार-बार कई आतंकी संगठनों के साथ सम्मिलित पाया गया है.

जकात फाउंडेशन ने MHA को क्या दिया जवाब?

उधर जकात फाउंडेशन ने केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) को अपने जवाब में बताया है कि वित्तीय वर्ष 2018-19 में उसे मदीना ट्रस्ट से 13 लाख 64 हजार 694 रुपए मिले थे. टीवी चैनल का आरोप है कि मदीना ट्रस्ट भारत विरोधी गतिविधियों में लिप्त है. अपनी सफाई में सुदर्शन टीवी ने सुप्रीम कोर्ट से यह भी कहा है कि उसकी चार पार्ट की सीरीज में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि किसी समुदाय विशेष के लोगों को UPSC की परीक्षा नहीं देनी चाहिए.

चैनल के अनुसार UPSC की परीक्षा एक ओपन कॉम्पिटिटिव परीक्षा है और इसमें सभी समुदायों के लोगों को भाग लेने का हक है. तो फिर यह आरोप कहां से आ गया कि मुस्लिम समुदाय सिविल सर्विस पर कब्जा करना चाहता है?

सिविल सर्विस की परीक्षा में बैठने का सबको बराबर हक

यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन (UPSC) द्वारा आयोजित सिविल सर्विस की परीक्षा कठिन होती है और तीन चरणों में होती है. इसे पास करना बड़ी उपलब्धि मानी जाती है. मुस्लिम समुदाय भी भारत का उतना ही हिस्सा है, जितना कोई और समुदाय और इन पर यह शक निराधार है कि वो IAS और IPS पद पर काबिज होना चाहते हैं.

सिविल सर्विस जनता की सेवा का माध्यम है और इसमें शामिल होने वाले सभी इसी भावना से प्रेरित होने चाहिए. ऐसा माना जाता है. इस संबंध में सबसे बड़ी कसौटी, तो जनसंख्या के आंकड़े हैं.

जनगणना के हिसाब से UPSC में मुस्लिम समुदाय की भागीदारी

साल 2011 की जनगणना में मुस्लिम समुदाय भारतीय जनसंख्या का 14.2 फीसदी थे. 2020 की जनगणना तो एक साल से टल गयी है, लेकिन माना जाता है कि अब यह 17-18 फीसदी के आसपास होनी चाहिए. साल 2006 में मुस्लिम, भारत के नागरिकों का 13.4 फीसदी हिस्सा थे.

जस्टिस राजेंद्र सच्चर के अनुसार सिविल सर्विस में उस समय मुस्लिम समुदाय का प्रतिशत 3.1 था, जो उनकी जनसंख्या के अनुपात में काफी काम था, लेकिन पिछले 4 सालों में इसमें सुधार हुआ है.

  • 2016 में 4.73 फीसदी
  • 2017 में 5.1 फीसदी
  • 2018 में 4 फीसदी
  • 2019 में 5.4 फीसदी

क्या देश में अपराधों के लिए आज कल दिखाया जाने वाला कंटेंट जिम्मेदार..? लगाई जाए OTT प्लेटफॉर्म पर सेंसरशिप!

इस हिसाब से साल 2016 और 2019 के बीच चार सालों में मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा सिविल सर्विस की परीक्षा पास करने का अनुपात बढ़ कर 5 फीसदी पहुंच गया है. यानी अभी भी पास करने वाले 95 प्रतिशत कैंडिडेट्स देश के दूसरे समुदायों से आते हैं.

इससे साफ है कि मुस्लिम समुदाय सिविल सर्विस पर कब्जा करने की कोशिश नहीं कर रहा है. रही बात सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मुकदमे की, तो सुप्रीम कोर्ट बड़ी गंभीरता से मामले को देख रहा है.

गिलगित बाल्टिस्तान पर चीन के भरोसे कुछ बड़ा करने जा रहा पाकिस्तान, दुनिया को समझनी होगी दोनों की चाल

Related Posts