वरदाराजन मुदालियर…: मुंबई का पहला और सबसे खतरनाक डॉन, जिसे तमिल मानते थे मसीहा

जिसे मुंबई में तमिलों का मसीहा कहा जाता था, जिसे खुद अंडरवर्ल्ड डॉन हाजी मस्तान ने मायानगरी का माफिया बनाया. 1970 के दशक में जो मुंबई का बाहुबली और ताकतवर गैंगस्टर बनकर उभरा था.

  • फरीद अली
  • Publish Date - 8:56 pm, Thu, 15 October 20

जिसे मुंबई में तमिलों का मसीहा कहा जाता था, जिसे खुद अंडरवर्ल्ड डॉन हाजी मस्तान ने मायानगरी का माफिया बनाया. 1970 के दशक में जो मुंबई का बाहुबली और ताकतवर गैंगस्टर बनकर उभरा था. उसका नाम था वरदाराजन मुदालियर .

कुली के काम से जुर्म की दुनिया में, दो दशक तक आधी मुंबई पर किया राज

शुरुआत में वरदाराजन ((Varadarajan Mudaliar)) ने मुंबई में कुली का काम किया, फिर बाद में वह जुर्म के रास्ते पर चला गया. हाजी मस्तान के सपोर्ट से उसने करीब दो दशक तक आधी मुंबई पर राज किया था. वरदराजन मुदालियर का जन्म साल 1926 में मद्रास के थूटुकुडी में एक गरीब परिवार में हुआ था. वो ठीक से पढ़ भी नहीं पाया. जवान हुआ तो वरदराजन तरक्की के रास्ते खोजने लगा. वरदराजन छोटे मोटे काम करके तंग आ चुका था. वो अमीर बनने के लिए बेचैन था.

अपराध की दुनिया में कैसे हुई वरदाराजन की एंट्री

1960 के दशक की शुरुआत में वरदराजन अपना घर छोड़कर मुंबई पहुंचा. मुंबई में कोई अच्छा काम नहीं मिला तो वीटी स्टेशन पर कुली का काम करने लगा. वरदराजन वहीं स्टेशन के पास बाबा बिस्मिल्लाह शाह की दरगाह पर गरीबों को खाना खिलाता था. वहीं से उसकी किस्मत का सितारा चमका. एक दिन स्टेशन पर उसकी मुलाकात अवैध शराब का कारोबार करने वाले कुछ लोगों से हुई. पैसे की खातिर उसने इस धंधे में कदम रख दिया. यहीं से अपराध की दुनिया में उसकी एंट्री हुई. और फिर मुंबई के लोग उसे वरदाभाई के नाम से जानने लगे.

अंडर वर्ल्ड डॉन हाजी मस्तान से कैसे मिला वरदाराजन

उन दिनों मुंबई में हाजी मस्तान और करीम लाला का सिक्का चलता था. वरदराजन पहले खुद एक गुर्गे के तौर पर शराब की तस्करी करता था. लेकिन कुछ समय बाद उसने अपना धंधा करना शुरू कर दिया. उसके साथ मुंबई में रहने वाले तमिल समुदाय के लोग जुड़ने लगे. वरदराजन अपना कारोबार बढा रहा था.

लेकिन हाजी मस्तान की मर्जी के बिना वो ये काम नहीं कर सकता था. फिर एक दिन उसकी मुलाकात मुंबई के सबसे बड़े तस्कर और अंडर वर्ल्ड डॉन हाजी मस्तान हुई. हाजी मस्तान ने वरदराजन को अपने साथ मिला लिया.

कुछ इस तरह बढ़ता गया वरदाराजन के जुर्म का कारोबार

बांबे पोर्ट पर हाजी मस्तान का राज चलता था. उसने वरदराजन को पोर्ट पर काम करने की इजाजत दी. मुंबई पोर्ट पर आने वाले माल की चोरी का उसका काम धीरे धीरे बढ़ता चला गया.

इसी दौरान हाजी मस्तान ने उसे करीम लाला से मिलवाया. बाद में उसने नशीले पदार्थों की तस्करी और जमीनों पर कब्जा भी शुरू किया. कुछ ही सालों में वरदाभाई ने अपने आप को मुंबई में स्थापित कर लिया. वो मर्डर की सुपारी से लेकर जमीन खाली कराने और ड्रग्स की तस्करी तक करने लगा.

सत्तर के दशक में अंडरवर्ल्ड के सबसे बड़े डॉन हाजी मस्तान ने मुंबई के इलाकों का बंटवारा कर दिया. उसने ईस्ट और नार्थ मुंबई की जिम्मेदारी वरदराजन मुदालियर को दे दी. साउथ और सेंट्रल मुंबई का सारा काम करीम लाला देखता था. तस्करी और अवैध निर्माण से जुड़े मामलों को हाजी मस्तान खुद देखने लगा. वरदराजन मुंबई का बड़ा नाम बन चुका था. एक बड़े इलाके में उसके नाम की तूती बोलती थी.

मुंबई के तमिल मसीहा मानने लगे

मुंबई के तमिल आबादी वाले इलाकों में वरदराजन का कानून चलता था. वो लोगों के तमाम मामलों का निपटारा करता था. माटुंगा और धारावी इलाकों में बड़ी तादाद में रहने वाले तमिल उसका साथ देते थे. वो गरीबों और ज़रूरतमंदों की मदद भी करता था. मुंबई के तमिल उसे मसीहा मानने लगे थे. कहते हैं पुलिस भी उसके इलाके में जाने से बचती थी. और कभी जाती थी तो वरदाभाई की इजाजत लेकर.

वरदाराजन को क्यों छोड़नी पड़ी मुंबई

धीरे धीरे पूरी मुंबई पर हाजी मस्तान, करीम लाला और वरदराजन का राज चलने लगा था. लेकिन फिर अस्सी के दशक में वरदराजन एक तेजतर्रार पुलिस अफसर वाई.सी.पवार के निशाने पर आ गया. पवार ने धीरे धीरे वरदराजन गैंग के कई लोगों को मौत की नींद सुला दिया. वरदराजन ने पवार को अपने साथ मिलाने की बहुत कोशिश की. उसने एक बड़ी रकम भी पवार को ऑफर की थी. लेकिन बात नहीं बनी. जब हालात ज्यादा बिगड़े तो वरदराजन मुंबई छोड़कर वापस चेन्नई चला गया.

क्या थी डॉन वरदाराजन की अंतिम इच्छा

2 जनवरी 1988 को चेन्नई में वरदराजन मुदालियर की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई. उसकी आखिरी इच्छा के मुताबिक अंडरवर्ल्ड डॉन हाजी मस्तान उसके शव को इंडियन एयरलाइंस के एक चार्टर्ड विमान से अंतिम संस्कार के लिए मुंबई लाए. वरदराजन का शव जब मुंबई पहुंचा तो पूरा धारावी, माटुंगा और सायन कोलीवाडा का इलाका उसके अंतिम दर्शन को उमड़ पड़ा. वरदाभाई के अंतिम संस्कार में हजारों लोग शामिल हुए.

वरदाराजन के जीवन पर बनीं ये फिल्में

वरदराजन के जीवन पर बॉलीवुड की कई फिल्में बनी. साल 1987 में मणिरत्नम ने वरदराजन के जीवन पर नायागन नाम की तमिल फिल्म बनाई थी. फिर 1988 में हिंदी फिल्म दयावान में वरदराजन का किरदार विनोद खन्ना ने निभाया था. 1991 में बनी मलयालम फिल्म अभिमन्यू में भी एक किरदार वरदराजन पर आधारित था. एक बार अमिताभ बच्चन ने खुलासा किया था कि फिल्म अग्निपथ में उन्होंने कुछ डायलॉग वरदराजन की स्टाइल में बोले थे. साल 2013 में तमिल फिल्म ‘थलाईवा’ में सत्यराज नाम का किरदार भी वरदराजन पर आधारित था. 2015 में रिलीज़ हुई तमिल फिल्म ‘यागावाराईनम ना कक्का’ में मिथुन चक्रबर्ती ने भी वरदराजन किरदार निभाया था.