Jammu Kashmir में आर्टिकल 370 के वक़्त ऐसा था वोटर टर्नआउट, क्या है बदलाव की उम्मीद?

नेशनल कांफ्रेंस (National Conference) के लीडर और पूर्व चीफ मिनिस्टर उमर अब्दुल्ला ने ये भी कहा था कि जब तक केंद्र सरकार राज्य का स्पेशल स्टेटस दोबारा लागू नहीं करती तब तक वो विधानसभा चुनावों में हिस्सा नहीं लेंगे.
Voter Turnout in the time of Article 370 in Jammu Kashmir, Jammu Kashmir में आर्टिकल 370 के वक़्त ऐसा था वोटर टर्नआउट, क्या है बदलाव की उम्मीद?

5 अगस्त 2019 को केंद्र की मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर (Jammu Kashmir) के अनुच्छेद 370 के स्पेशल स्टेटस को खत्म कर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर (Jammu Kashmir) और लद्दाख (Ladakh) में बांट दिया गया. भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने शुरुआत से कहा है कि ये फैसला जम्मू कश्मीर (Jammu Kashmir) के और देश हित में लिया गया. राज्य के मेनस्ट्रीम राजनीतिक दलों ने इसका जबरदस्त विरोध किया. हाल ही में नेशनल कांफ्रेंस के लीडर और पूर्व चीफ मिनिस्टर उमर अब्दुल्ला ने ये भी कहा था कि जब तक केंद्र सरकार राज्य का स्पेशल स्टेटस दोबारा लागू नहीं करती तब तक वो विधानसभा चुनावों में हिस्सा नहीं लेंगे.

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हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक अब्दुल्ला के इस तरह के धमकी भरे बयान के बाद से राज्य में राजनीतिक सरगर्मियों को नया एजेंडा मिल गया है. ये ऐसे वक्त में शुरू हुआ है जब स्पेशल स्टेटस को खत्म करने के बाद दोबारा राज्य में चुनावों की स्थिति को रीस्टोर किए जाने की कवायद शुरू हुई है. जम्मू कश्मीर की राजनीतिक संवेदनाओं को समझने के लिए ये जानना बेहद ज़रूरी है कि कश्मीर को छोड़कर बाकी के इलाकों में मुस्लिम बहुल जनसंख्या नहीं है.

1995 परिसीमन के बाद बदली स्थिति

जम्मू कश्मीर विधानसभा (Jammu Kashmir Assembly) में पहले कुल 87 सीटें थीं जिसमें 46 सीटें कश्मीर घाटी की, वहीं 37 सीटें जम्मू रीज़न और 4 सीटें लद्दाख की थीं. 1995 के परिसीमन के बाद विधानसभा में सीटों की संख्या 76 रह गई जिसमें से 42 कश्मीर की, 32 जम्मू और 2 लद्दाख की हैं.

1987 में ये था विधानसभा में वोट प्रतिशत

1987 में राज्य में आतंकवादी घटनाओं की शुरुआत से पहले यहां विधानसभा चुनाव (Assembly Elections) हुए. इस चुनाव में क़रीब 73 फीसदी वोटर्स ने हिस्सा लिया. ये किसी विधानसभा और लोकसभा चुनावों में तब तक का सबसे ज़्यादा वोटर टर्नआउट था.

मुस्लिम बहुल कश्मीर की 42 सीटों में वोटर टर्नआउट 77 फीसदी था, वहीं हिंदू बहुल इलाकों के जम्मू रीज़न की 32 सीटों में ये 69 फीसदी के क़रीब था. ये वो आखिरी लोकसभा और विधानसभा चुनावों में सबसे बड़ा वोटिंग प्रतिशत था जिसमें घाटी ने जम्मू से ज़्यादा वोटर टर्नआउट देखा.

1989 में चुनाव पर आतंकी घटनाओं का असर

इसके दो साल बाद 1989 में जम्मू कश्मीर में वोट प्रतिशत पर आतंकवादी गतिविधियों का असर दिखना शुरू हो गया. 1989 के लोकसभा चुनावों में महज़ 25 फीसदी ही वोट प्रतिशत दर्ज किया गया.

1987 के मुकाबले जम्मू रीज़न में इस दौरान वोट प्रतिशत में 48 फीसदी गिरावट दर्ज की गई. वहीं कश्मीर रीज़न में 3.4 फीसदी ही वोट पड़े. यहां क़रीब 73 फीसदी की गिरावट वोट प्रतिशत में दर्ज की गई. लद्दाख रीज़न (Ladakh Reason) में अपवाद के तौर पर 12 फीसदी वोटर टर्नआउट में इज़ाफा हुआ.

7 साल बाद फिर बढ़ा वोट प्रतिशत

करीब 7 साल के गैप के बाद 1996 में विधानसभा और लोकसभा चुनाव हुए, जिसमें वोट प्रतिशत में बढ़ोत्तरी दिखाई दी, खासकर कश्मीर घाटी में. इन दोनों ही चुनावों में 1989 के चुनावों के 3 फीसदी वोट प्रतिशत की तुलना में 43 फीसदी लोगों ने घाटी में वोट किया. एक दशक के बाद 2008 में बहुमत के साथ लोगों ने चुनावों में वोट किया. कश्मीर घाटी में इस दौरान 52 फीसदी जम्मू में 72 फीसदी और 69 फीसदी लद्दाख में वोट प्रतिशत दर्ज किया. 2002 विधानसभा चुनावों को छोड़कर आतंकवाद बढ़ने के बाद भी मतदान प्रतिशत में कमी नहीं आई.

2014 में ये था वोट प्रतिशत का हाल

2014 में कश्मीर घाटी में आतंकवादी घटनाओं के बढ़ने के बाद सबसे ज्यादा वोट प्रतिशत देखने को मिला. जिसके बाद बीजेपी और पीडीपी ने राज्य में सरकार बनाई. भाजपा और पीडीपी, राज्य की आखिरी चुनी हुई सरकार थी, जिसे केंद्र शासित प्रदेश में बदल दिया गया था. भाजपा-पीडीपी सरकार के समय में 2016 में आतंकवादी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद घाटी में उथल-पुथल मच गई थी.

2019 में एकदम से घटा वोट प्रतिशत

वहीं 2019 के लोकसभा चुनावों में कश्मीर घाटी में वोट प्रतिशत घटकर 19 फीसदी पर पहुंच गया, जो कि 2014 के लोकसभा चुनावों के मुकाबले करीब 12 फीसदी कम था. 34 फीसदी सीटों पर सबसे कम वोट प्रतिशत दर्ज किया गया. अप्रैल 2017 में 7 फीसदी वोट प्रतिशत उपचुनाव में देखा गया. ये अब तक का सबसे कम वोट प्रतिशत है.

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