उमर अब्दुल्ला जिस ‘सदर-ए-रियासत’ और ‘वज़ीर-ए-आज़म’ की बात कर रहे हैं उसकी बात शुरू कहां से हुई?

देश लोकसभा चुनाव की दहलीज़ पर है तो जम्मू-कश्मीर का मसला गर्म होना ही था. उमर अब्दुल्ला ने पीएम मोदी को ऐसा मौका दे भी दिया. एक बार फिर मुख्यमंत्री की जगह वज़ीर-ए-आज़म और गवर्नर की जगह सदर-ए-रियासत का पद स्थापित करने की मांग पर बवाल खड़ा हो गया है. आइए आपको बताते हैं कि ये मामला है क्या.

लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे से पहले एक बार फिर सबकी नज़रें कश्मीर की तरफ लगी हैं. उमर अब्दुल्ला के एक बयान ने पीएम मोदी को मौका दे दिया और उन्होंने महागठबंधन को घेर लिया. पहले जान लीजिए कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के उमर अब्दुल्ला ने क्या कहा-

उमर ने अपने बयान की आखिरी लाइन में कहा है कि, ‘हमने उस वक्त अपने सदर-ए-रियासत और वज़ीर-ए-आज़म भी रखे थे, इंशाल्लाह उसको भी हम वापस ले आएंगे.’

पीएम ने इसी एक पंक्ति को हथियार बना लिया और नेशनल कॉन्फ्रेंस के चुनावी साथियों से पूछ लिया कि क्या वो भी उमर अब्दुल्ला से सहमत हैं. आइए आपको बताते हैं कि उमर ने जो कुछ कहा उसे इतिहास की नज़र से कैसे देखा जाए.

उमर अब्दुल्ला आखिर कह क्या रहे हैं
भारत की आज़ादी के वक्त जब सरदार पटेल स्वतंत्र रियासतों को देश में मिला रहे थे तब जम्मू-कश्मीर की आनाकानी ने उसे कुछ स्वायत्ता दिला दी थी.
महाराजा हरि सिंह भारत-पाकिस्तान से अलग एक अलग देश की हसरत रखते थे. स्टैंडस्टिल समझौते के बावजूद पाकिस्तान ने उन पर हमला बोल दिया. हरि सिंह के पास भारत से मदद मांगने के सिवाय कोई विकल्प नहीं था और उस वक्त जम्मू कश्मीर रियासत-भारत सरकार के बीच जो समझौता हुआ उसे इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन कहा गया.

जम्मू-कश्मीर के अंतिम शासक महाराजा हरि सिंह

इस इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन को महाराजा हरि सिंह  ने साइन किया जबकि इसे तैयार करने में उमर अब्दुल्ला के दादा शेख अब्दुल्ला का बड़ा हाथ था.

ऐतिहासिक ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एस्केशन’ को महाराजा हरि सिंह और लॉर्ड माउंटबेटन ने साइन किया

इसी इंस्ट्रूमेंट एक्सेशन ने भारत सरकार की शक्ति जम्मू-कश्मीर में सीमित कर दी . पाकिस्तान से जंग के हालात और मामले के संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पहुंचने से सब जटिल होता गया और आखिरकार भारत ने संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को स्पेशल स्टेटस दिया. इसी स्पेशल स्टेटस ने वो सब कुछ दिया जिसका ज़िक्र उमर अब्दुल्ला ने किया.

पीएम नेहरू और नेशनल कॉन्फ्रेंस के शेख अब्दुल्ला

जम्मू-कश्मीर का अलग संविधान
जम्मू-कश्मीर अकेला ऐसा भारतीय राज्य है जिसका अपना संविधान है. इसे 1956 में स्वीकृति मिली और 26 जनवरी 1957 से ये लागू हो गया. इसी के तहत जम्मू-कश्मीर के पास साल 1965 तक अपना एक सदर-ए-रियासत रहा जो आज के राज्यपाल के बराबर था, वहीं एक वज़ीर-ए-आज़म यानि प्रधानमंत्री था जो आज के मुख्यमंत्री के समान था. इस संविधान की पहली पंक्ति है- ‘हम, जम्मू-कश्मीर के लोग’.

जम्मू कश्मीर में सदर-ए-रियासत
सदर-ए-रियासत की बात करें तो महाराजा हरि सिंह के बेटे और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कर्ण सिंह राज्य के पहले और आखिरी सदर-ए-रियासत थे. वो महज़ 18 साल की उम्र में साल 1949 में इस पद पर बैठे. 1965 में जब ये पद गवर्नर में तब्दील हो गया तो उन्होंने दो साल तक इसकी ज़िम्मेदारी भी निभाई. कर्ण सिंह ने ही जम्मू-कश्मीर के मौजूदा संविधान को हस्ताक्षर करके मंज़ूरी दी थी.

वज़ीर-ए-आज़म यानि प्रधानमंत्री पद का खात्मा
साल 1965 में जम्मू-कश्मीर के पहले मुख्यमंत्री कांग्रेस की ओर से गुलाम मोहम्मद सादिक बने. इससे पहले राज्य ने मेहरचंद महाजन, शेख अब्दुल्ला, बख्शी गुलाम मोहम्मद, ख्वाज़ा शम्सुद्दीन और खुद गुलाम मोहम्मद सादिक के तौर पर पांच प्रधानमंत्री देखे थे.

अब तक आपने साल 1965 का ज़िक्र कई बार पढ़ा है तो ये जान लें कि जम्मू-कश्मीर के जिस संविधान को 1957 में लागू किया गया था उसमें इसी साल कई अहम संशोधन हुए.  इन संशोधनों में गुलाम मोहम्मद सादिक की बड़ी भूमिका थी. उन्होंने ही जम्मू-कश्मीर के संविधान में छठा संशोधन करके वज़ीर-ए-आज़म का पद खत्म करवाया. उन्होंने नेशनल कॉन्फ्रेंस का विलय कांग्रेस में कर दिया. सादिक को दिल्ली में घाटी का सबसे वफादार कांग्रेसी माना जाता था. साल 1964 में सत्ता मिलते ही गुलाम मोहम्मद सादिक ने जम्मू-कश्मीर की स्वायत्ता को कई मायनों में कमज़ोर करना शुरू किया. यही सादिक कभी नेशनल कॉन्फ्रेंस के शेख अब्दुल्ला के खास लोगों में गिने जाते थे लेकिन 1953 के बाद दोनों की राहें जुदा हो गईं.

जम्मू-कश्मीर का अलग झंडा
तमाम शर्तों में एक ये भी थी कि जम्मू-कश्मीर राज्य के पास अपना एक अलग झंडा होगा. इसके पीछे राज्य की अपनी पहचान को सुरक्षित रखने की नीयत थी. भारत सरकार ने इस शर्त को भी माना. जम्मू-कश्मीर के परचम को अलग से नहीं फहराया जा सकता लेकिन भारत के राष्ट्रीय ध्वज के साथ इसे अनिवार्य रूप से फहाये जाने का प्रावधान जम्मू-कश्मीर के संविधान में रखा गया है.

पीएम मोदी और तत्कालीन जम्मू-कश्मीर सीएम मुफ्ती भारत और जम्मू-कश्मीर राज्य के झंडों के पीछे गले मिलते हुए

उमर ने कुछ भी नया नहीं कहा
उमर अब्दुल्ला ने जो कुछ कहा वो नया नहीं है. जम्मू-कश्मीर में मुख्यधारा की सभी पार्टियां ऐसी बात करती रही हैं. 2016 में जम्मू-कश्मीर संविधान में बदलाव करके एक बार फिर सदर-ए-रियासत पद की स्थापना के लिए सीपीएम विधायक मोहम्मद यूसुफ तरिगामी बिल लाए थे. ये बिल विधानसभा में पेश करने की अनुमति तक उन्हें नहीं मिल पाई थी. बीजेपी-पीडीपी उस वक्त साथ थे और दोनों ने मिलकर तरिगामी के बिल को आने ही नहीं दिया जबकि तरिगामी का कहना था कि बिल में वही सब है जो पीडीपी के अपने सेल्फ रूल डॉक्यूमेंट का हिस्सा है.

बिल में कहा गया था कि राज्यपाल की जगह जम्मू-कश्मीर में सदर-ए-रियासत का पद हो जिसका राज्य का निवासी होना जरूरी हो. बिल में मांग की गई कि सदर-ए-रियासत को राज्य की विधानसभा पांच साल के लिए चुने.

इस बिल को नेशनल कॉन्फ्रेंस, कांग्रेस और निर्दलीय विधायक शेख अब्दुल रशीद का समर्थन मिला था.

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