पश्चिम बंगाल में Pandemic पॉलिटिक्स, न Covid-19 टेस्ट न इलाज… ममता दीदी जो कहें वही पास!

लोकसभा (Loksabha) में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन (AR Chowdhary) ने ममता सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं. अधीर रंजन ने कहा है कि राज्य के सरकारी अस्पतालों को निर्देश दिया गया है कि कोरोना (Coronavirus) से होने वाली मौतों के मामलों में इसका जिक्र न करें.
mamta banerjee pandemic politics, पश्चिम बंगाल में Pandemic पॉलिटिक्स, न Covid-19 टेस्ट न इलाज… ममता दीदी जो कहें वही पास!

कोरोनावायर महामारी (Coronavirus Pandemic) पर पश्चिम बंगाल में एक अलग ही लड़ाई लड़ी जा रही है. ये लड़ाई ऐसी है, जिसकी जरूरत नहीं थी. लेकिन ममता बनर्जी को कोई परवाह नहीं. आरोप है कि ममता राज में कोरोना से जुड़ी मौतों और संक्रमित लोगों से जुड़ी जानकारियों में जानलेवा गड़बड़ी की जा रही है. साढ़े 12 करोड़ की आबादी वाले महाराष्ट्र में 1 लाख से ज्यादा कोरोना टेस्ट हो गए. इससे कुछ ही कम करीब 10 करोड़ की आबादी वाले पश्चिम बंगाल में बीते रविवार तक 11 हजार से भी कम टेस्ट किए गए. साढ़े 5 करोड़ की आबादी वाले आंध्र प्रदेश ने 68 हजार और साढ़े 6 करोड़ की जनसंख्या वाले कर्नाटक ने भी 43 हजार कोरोना टेस्ट कर लिए.

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पांच दिन पहले ही आईसीएमआर ने कहा कि केंद्र की ओर से 26500 कोरोना टेस्ट किट की खेप पश्चिम बंगाल को भेजी जा चुकी है, लेकिन इनका इस्तेमाल नहीं हो रहा. आरोपों के पीछे राजनीति हो सकती है, लेकिन टेस्ट से जुड़े इन आंकड़ों को देखने के बाद शक की पूरी वजह नजर आती है. सवाल जेहन में आता है कि क्या ममता सरकार का फंडा ये है कि न टेस्ट, न इलाज, जो दीदी कहें वही पास?

पूरी दुनिया कोविड-19 से लड़ने में एकजुट है, लेकिन अपने देश में एक प्रदेश है जिसे एकजुट होकर महामारी से लड़ने में भरोसा नहीं है. ये प्रदेश है पश्चिम बंगाल. पूरी दुनिया कोविड-19 पर जानकारी साझा कर रही है, जिससे कि हर किसी को बीमारी से निपटने में मदद मिले, लेकिन पश्चिम बंगाल की सरकार जानकारी छुपाने में यकीन रखती है. देश में बीजेपी शासित राज्य हों या दूसरे दलों की सरकार वाले राज्य, कोरोना संकट में सब एक-दूसरे के साथ खड़े हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल अपवाद है. पूरी दुनिया में डॉक्टर पूजे जा रहे हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल में डॉक्टरों से उनके अधिकार भी छीन लिए गए हैं.

तथ्यों को झुठला रही हैं ममता

ममता बनर्जी ने बयान दिया है कि- ‘केंद्र एक तरफ लॉकडाउन सख्ती से लागू करने के लिए कहता है, दूसरी तरफ सभी दुकानों को खोलने का आदेश आ रहा है. हमें क्या करना चाहिए? केंद्र सरकार जो कहती है और जो निर्देश जारी होते हैं उनमें स्पष्टता की कमी है.’ सवाल है कि ममता ये बयान किस आधार पर दे रही हैं? केंद्र ने सारी-की-सारी दुकानें खोलने की बात कब कही?

छीन लिए गए डॉक्टरों के अधिकार !

लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन ने ममता सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं. अधीर रंजन ने कहा है कि राज्य के सरकारी अस्पतालों को निर्देश दिया गया है कि कोरोना से होने वाली मौतों के मामलों में इसका जिक्र न करें. हिदायत दी गई है कि डेथ सर्टिफिकेट जारी करते वक्त इस बात का ध्यान रहे. ये आरोप पश्चिम बंगाल सरकार पर पहले भी लग चुके हैं. एक अस्पताल से किसी परिजन का वीडियो भी सामने आया था, जिसमें वह ऐसे ही आरोप अस्पताल प्रबंधन पर लगा रहा था.

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ऐसे हालात में पश्चिम बंगाल के डॉक्टर डेथ सर्टिफिकेट को लेकर बड़ी चुनौती झेल रहे हैं. डेथ सर्टिफिकेट पर ICMR की तय गाइडलाइन है, लेकिन यहां स्थानीय प्रशासन तय कर रहा है कि मौत कोविड-19 से है या नहीं? अगर थोड़ा भी संदेह हो कि मौत कोविड-19 से हुआ है, तो डेथ सर्टिफिकेट में इसका जिक्र होना ही चाहिए. लेकिन पश्चिम बंगाल में ये नहीं हो रहा है. कोविड-19 से जुड़े आंकड़ों में पारदर्शिता होनी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है. आरोप है कि किसी मौत की वजह क्या रही, ये डॉक्टर की जगह अधिकारी तय कर रहे हैं. इस गंभीर मुद्दे पर खुद राज्य के कुछ सीनियर डॉक्टरों ने जुबान खोली है.

ममता की नीयत पर सवाल की 3 बड़ी वजह

कोरोना जैसी महामारी पर ममता के हठ को देखते हुए सवालों की तीन बेहद स्पष्ट वजह नजर आती है.
1. ममता बनर्जी ने केंद्र की टीम का सहयोग नहीं किया.
2. ममता बनर्जी ने डॉक्टरों के डेथ सर्टिफिकेट जारी करने के अधिकार छीन लिए.
3. ममता ने डॉक्टरों और मेडिकल कर्मियों के मोबाइल को बैन कर दिया.

कोरोना के मामलों को छुपाने से किसे फायदा?

अगले साल पश्चिम बंगाल में विधानसभा के चुनाव होने हैं. ममता को लग सकता है कि कोरोना से तबाही बढ़ती नजर आती है, तो उन्हें नुकसान हो सकता है. लेकिन सोचना उन्हें ही होगा कि तबाही मरीजों को पहचानने और इलाज से कम होगी या बीमारी छिपाने से? और अगर ममता किसी भी मुद्दे पर केंद्र से सहमत न होने की नीति से बाहर नहीं निकलना चाहती हैं, तो कम-से-कम महामारी का ये मुद्दा दीदी की जिद के लिए बिल्कुल ठीक नहीं. 2019 के आम चुनाव में 18 लोकसभा सीटें जीत लेने वाली बीजेपी कोरोना पर ममता के जानलेवा हठ और चिढ़ से विधानसभा पहुंचने से नहीं रुक सकती. हां, इस संकट काल में राज्य के लोगों के हित के फैसलों से उखड़ रहे जनाधार को ममता बचा जरूर सकती हैं.

अधीर रंजन के बयान में देश का मिजाज

2019 के आमचुनाव के बाद जिन कुछ बड़े राजनीतिक चेहरों ने पीएम मोदी को सबसे ज्यादा भला-बुरा कहा होगा, उनमें यकीनन लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन भी शामिल हैं. शायद ममता बनर्जी ने भी सुना होगा कि इन्हीं के प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले वही अधीर रंजन अब क्या कह रहे हैं? अधीर रंजन कहते हैं कि- “कोरोना से निपटने के लिए केंद्र और राज्यों ने काफी अच्छा काम किया है. अगर हम ऐसे ही ठोस कदम उठाते रहे, तो भारत बहुत आगे निकल जाएगा. आने वाले दिनों में भारत रैंकिंग में कहां-से-कहां पहुंच जाएगा, भारत ग्लोबल लीडर बन जाएगा. आज हम अमेरिका और यूरोप को देखते हैं तो पता चलता है कि हम उनसे कितना आगे निकल चुके हैं. भारत एक मॉडल के रूप में दुनिया के सामने होगा.”

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ऐसे मुश्किल वक्त में ये ‘दृष्टि दोष’ क्यों?

किसी राज्य ने नहीं कहा कि उन्हें जान-बूझकर खराब कोरोना टेस्ट किट दिया गया, पश्चिम बंगाल सरकार ने कहा. किसी राज्य सरकार ने नहीं कहा कि कोविड-19 पर केंद्र की नीतियों में स्पष्टता नहीं है, पश्चिम बंगाल सरकार ने ऐसा कहा. किसी और राज्य की सरकार ने आईसीएमआर के गाइडलाइंस की अनदेखी नहीं की, लेकिन ममता सरकार ने ऐसा किया. सोचना खुद ममता बनर्जी को ही होगा. ऐसे मुश्किल वक्त में तमाम राज्यों की विपक्षी सरकारों के बीच आपत्तियों की फेहरिस्त सिर्फ उन्हीं के पास क्यों है?

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