जिस PoK को भारत में मिलाने की बात कह रही है मोदी सरकार वो है क्या, जानिए

जिस पीओके को लेकर भारत-पाकिस्तान भिड़े हैं, आइए उसके बारे में आपका ज्ञान बढ़ाएं.

भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को खत्म किया तो भारत-पाकिस्तान के बीच एक बार फिर कश्मीर चर्चा का मुख्य केंद्र बन गया. भारत ने पाकिस्तान की बौखलाहट तब कुछ और बढ़ा दी जब कहा कि अब बातचीत जब भी होगी तब पीओके पर होगी. इसका मतलब है कि जो कश्मीर भारत का हिस्सा है उस पर तो किसी तरह की चर्चा का कोई मतलब ही नहीं है, अब दोनों पक्ष अगर बात करेंगे तो वो पीओके यानि पाक अधिकृत कश्मीर पर होगी. गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बाद अब केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने भी कहा है कि वक्त आ गया है कि पीओके को आज़ाद कराके भारत में शामिल किया जाए.

कैसे पाकिस्तान के हत्थे चढ़ा पीओके?
साल 1947 में माउंटबेटन मिशन के तहत भारत को दो भागों में बांटा गया था जिसमें एक का नाम भारत रहा, जबकि दूसरा बना पाकिस्तान. अंग्रेज़ों ने 550 से ज्यादा भारतीय रियासतों को तब अपनी इच्छा के मुताबिक दोनों में से किसी एक देश के साथ रहने की अनुमति दे दी थी. अधिकांश रियासतें भारत में मिल गईं लेकिन कुछ राजा ना नुकुर करने के बाद ही भारत में मिले और कश्मीर के महाराजा ने तो तब जाकर विलयपत्र पर दस्तखत किए जब उनके राज्य में अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान की ओर से कबायली घुस आए. हमलावर राजधानी श्रीनगर से महज़ 32 किलोमीटर दूर थे जब भारतीय सेना ने जवाबी हमला शुरू किया. 26 अक्टूबर 1947 वो ऐतिहासिक तारीख थी जिस दिन महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ समझौता किया था.

इसके बाद भारतीय सेनाओं ने आनन फानन में ठंडी हवा से कांप रहे कश्मीर में जाकर हमलावरों से राज्य को खाली कराना शुरू किया. इसके बाद पाकिस्तानी सेना भी विवाद में कूद पड़ी और लड़ाई खुलकर भारत-पाकिस्तान सेना के बीच छिड़ गई. इसी दौरान भारत संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान की शिकायत लेकर पहुंच गया. दोनों सेनाओं ने जहां तक कब्ज़ा किया हुआ था उसे ही लाइन ऑफ कंट्रोल घोषित कर दिया गया और इस तरह जनवरी 1949 में सीज़फायर हो गया.

महाराजा हरि सिंह

जो समझौता भारत और कश्मीर रियासत में तय हुआ उसके मुताबिक राज्य के रक्षा, विदेश और संचार मामले भारत के अधीन होगा जबकि बाकी विषयों पर जम्मू-कश्मीर राज्य अपना अधिकार रखेगा.

पाकिस्तान ने पीओके को बांटा
पाकिस्तान ने सीज़फायर के बाद अपने कब्ज़े वाले क्षेत्र को दो प्रशासनिक भागों में बांट दिया, जो आज़ाद कश्मीर (13,297 स्कवॉयर किलोमीटर) और गिलगित-बाल्टिस्तान (28,174 स्कवॉयर किलोमीटर)कहलाए. देखा जाए तो ये इलाका भारतीय कश्मीर से तीन गुना बड़ा है. आबादी भी कुल करीब 58 लाख है.

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पाकिस्तान ने कश्मीर में कबायली भेजे लेकिन कब्ज़े में नाकाम रहा

वैसे जब भी बात पीओके की होती है तो वो ज़्यादातर मीरपुर-मुज़फ्फराबाद के आसपास घूमती है, जबकि गिलगित-बाल्टिस्तान को भी भारत इसी का हिस्सा मानता है. इसके पीछे भारत का तर्क है कि ये इलाका भी उसी जम्मू-कश्मीर का भाग है जिसे महाराजा हरि सिंह ने भारत में मिलाने पर सहमति दी थी. उधर पाकिस्तान ने गिलगित-बाल्टिस्तान को पीओके से अलग करके स्वायत्तता का ढोंग रचा है. पाकिस्तान दुनिया को दिखाता है कि वो अपने कब्ज़ेवाले कश्मीर और भारत के हिस्से वाले कश्मीर को पूरी तरह आज़ाद कराने के पक्ष में है. दूसरी तरफ सच्चाई ये है कि पाकिस्तान ने चीन से साठ के दशक में इसी इलाके में काराकोरम हाईवे बनवाया था. इस हाई वे ने पाकिस्तानी राजधानी इस्लामाबाद को गिलगित से जोड़ा और यही रास्ता आगे चीन के जियांगजिंग प्रांत के काशगर तक गया है. चीनी सरकार जियांगजिंग को एक हाईवे से बलूचिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से जोड़ने की योजना पर काम कर रहा है जिससे पाकिस्तान को अपनी हालत सुधरने का भरोसा है. गिलगित-बाल्टिस्तान का 73,500 स्क्वॉयर किलोमीटर इलाका पहाड़ी है.

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पीओके में पाकिस्तान के ढोंग
साल 1962 में चीन ने जम्मू-कश्मीर के एक हिस्से (अक्साई चिन) पर कब्ज़ा कर लिया था. मार्च 1963 में पाकिस्तान ने भी कश्मीर का 1900 वर्ग मील का इलाका चीन को सौंप दिया था. गिलगित-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान ने 2009 में सरकार चुनने का हक दिया. इस नाते ये सूबा भी माना गया लेकिन राज्य नहीं बनाया गया. अब इस इलाके के लोग पाकिस्तान में मिलना चाहते हैं मगर 2018 में आदेश आया जिसमें गिलगित बाल्टिस्तान की असेंबली है जिसे कानून बनाने का हक है मगर अधिकार बेहद सीमित हैं.

पीओके को लेकर पाकिस्तान दोहरा खेल खेलता रहा है. इसे वो आज़ाद कश्मीर भले ही कहता हो लेकिन यहां उसकी कठपुतली सरकारें बनती-गिरती हैं. जिसे पाकिस्तान आज़ाद कश्मीर का प्रधानमंत्री कहता है उसे दुनिया में कोई मकबूलियत हासिल नहीं है. खुद पाकिस्तान में उसकी हैसियत देश के पीएम के सामने कुछ नहीं. 49 सीटों वाली पीओके विधानसभा के लिए 1974 से ही पीओके में चुनाव कराए जा रहे हैं. इसी तरह गिलगित- बाल्टिस्तान को पहले पाकिस्तान में नॉर्दर्न एरिया कहा जाता था और इसका प्रशासन संघीय सरकार के तहत एक मंत्रालय चलाता थाृ लेकिन 2009 में पाकिस्तान की संघीय सरकार ने यहां एक स्वायत्त प्रांतीय व्यवस्था कायम कर दी जिसके तहत मुख्यमंत्री सरकार चलाता है. अब इलाके की अपनी असेंबली है जिसमें कुल निर्वाचित 24 सदस्य होते हैं. इस असेंबली के पास बहुत ही सीमित अधिकार हैं या कहें कि न के बराबर हैं. यहां पर शियाओं को किसी भी तरह का अधिकार नहं जबकि इस इलाके में उनकी संख्या बहुत बड़ी है.