आखिर क्या है लद्दाख में गतिरोध का कारण… चीन की असली टीस आई सामने

तुम करो तो सही और हम करें तो गलत… असल में चीन की तानाशाही सरकार देश की करोड़ों जनता पर हुक्म चलाने, जुल्म और बर्बरता ढहाने की इतनी आदी हो गई है कि बाहर वो अपनी सीमा भूल जाती है. LAC पर भी विस्तारवादी चीन का रवैया बिलकुल ऐसा ही रहा है.

  • TV9 Hindi
  • Publish Date - 10:58 pm, Wed, 14 October 20
xi jinping
शी जिनपिंग

पिछले पांच महीनों से चीन पूर्वी लद्दाख में तनावपूर्ण माहौल क्यों बनाए हुए हैं, आखिर उशकी ऐसी कौन सी टीस है जो उसे ऐसा करने पर मजबूर कर रही है जो वो पूर्वी लद्दाख में गतिरोध की वजह बना है. वो टीस अब जाकर बाहर आ गई है. शी जिनपिंग सरकार ने साफ किया है कि वो सीमा पर भारत के इन्फ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने से परेशान है. लद्दाख में भारत की मोर्चेबंदी से हिल चुका है. चीनी विदेश मंत्रालय के मुताबिक LAC पर भारत के साथ तनाव की असली वजह भारत का बुनियादी ढांचा है.

चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान का वो बयान देखकर आप पांच महीने से लद्दाख में कराहते ड्रैगन का डर समझ सकते हैं. उनका कहना है, ‘कुछ समय से भारतीय पक्ष चीन के साथ सीमा पर बुनियादी ढांचे के निर्माण और सैन्य तैनाती को आगे बढ़ा रहा है. यही तनावों का मूल कारण है. हम भारत से आग्रह करते हैं कि दोनों पक्षों की आम सहमति को लागू किया जाए, हालात को जटिल करने वाली कार्रवाई से बचा जाए, और सीमा पर शांति बहाल करने के लिए ठोस उपाय किए जाएं.’

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तुम करो तो सही और हम करें तो गलत… असल में चीन की तानाशाही सरकार देश की करोड़ों जनता पर हुक्म चलाने, जुल्म और बर्बरता ढहाने की इतनी आदी हो गई है कि बाहर वो अपनी सीमा भूल जाती है. LAC पर भी विस्तारवादी चीन का रवैया बिलकुल ऐसा ही रहा है. करीब साढ़े तीन हजार किमी लंबी सीमा पर ड्रैगन को मनमानी की आदत लग चुकी है. अक्साई चिन उसकी मिसाल है. आजादी के कुछ सालों के अंदर ही चीन ने धीरे-धीरे पूरे इलाके को हड़प लिया. फिर 1961 की जंग के बाद अपना नियंत्रण और मजबूत कर लिया.

लद्दाख से लेकर अरुणचाल प्रदेश तक सीमा विवाद का फायदा उठाकर चीन की सेना बार-बार घुसपैठ को अंजाम देती रही है. सीमा पर अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए चीनी सरकारें 1950 के दशक से लगातार बुनियादे ढांचे मजबूत करती रही हैं. LAC के करीब रेल रोड और एयरपोर्ट के इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करती रही है.

चीन ने बिछाया रोड और रेल का जाल… भारत भी नहीं है पीछे

शिंजियांग प्रांत से तिब्बत को जोड़ने वाला चीन का जी219 नेशनल हाई वे LAC के लगभग समानांतर लद्दाख से लेकर हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा को कवर करता है. जंग के हालात में सेना की तैनाती में इस हाई वे की भूमिका कितनी अहम होगी ये आप समझ सकते हैं. ऐसे ही सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के इलाकों के करीब चीन ने रोड के साथ रेल नेटवर्क भी तैयार कर रखा है. तिब्बत में शिगात्से-येडॉन्ग रेलवे, ल्हासा-न्यिंगची रेलवे और मेडॉग-जायू रोड का जाल बिछा है.

सबसे बड़ी बात ये है कि चीन के इन रोड और रेल नेटवर्क में ड्रैगन आर्मी के एयरफील्ड भी जुड़े हैं. तिब्बत में होटान, नगारी गुंसा, शिगात्से, ल्हासा गोंग्गर और न्यिंगची मेनलिंग जैसे पांच ऐसे एयरपोर्ट हैं, जिनका सैनिक और नागरिक दोनों ही उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.

अटल टनल, रोहतांग

सरहद पर चीन की इसी तैयारी को टक्कर देने के लिए भारत ने भी पिछले कुछ सालों में लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना शुरू किया. 2006 में भारत सरकार ने बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन को 2012 तक सीमा से सटे इलाकों में 3324 किमी लंबी 61 सड़कें तैयार करने को कहा. हालांकि 2015 के मार्च महीने तक सिर्फ 625 किमी सड़क तैयार हो सकीं. मार्च 2018 तक ये आंकडा 981 किमी तक पहुंचा, लेकिन पिछले दो सालों में काम में बेमिसाल तेजी आई और भारत ने मार्च 2020 तक 2486 किमी रोड तैयार कर ली.

सरहद से जुड़े इलाकों में सेना को जल्द मोर्चे पर तैनात किया जा सके इसके लिए 44 पुल भी तैयार कर लिए गए हैं. चीन की हर चाल को टक्कर देने के लिए भारत के पास बुनियादी ढांचा तैयार है. तोपों और मिसाइलों के साथ करीब 50 हजार भारतीय सैनिक ड्रैगन आर्मी से सामना के लिए लद्दाख में तैनात हो चुके हैं. यही वजह है कि चीन को मिर्ची लग गई है. चीनी सरकार बौखला उठी है, लेकिन एक कहावत है रस्सी जल गई लेकिन ऐंठन नहीं गई. भारत की लक्ष्मण रेखा लांघकर चीन जल गया है, लेकिन उसकी धमकी अभी नहीं गई है.

ड्रैगन ने सीधे-सीधे अमेरिका को ललकारा

समंदर से लेकर हिमालय की पहाड़ियों तक एक दर्जन से ज्यादा पड़ोसी देशों पर ताकत की धौंस जमाने में नाकाम ड्रैगन अपने तेवर नरम करने का नाम नहीं ले रहा. हर मोर्चे पर मुंह की खाने के बाद भी चीन खुलेआम जंग की धमकी दे रहा है. इस बार चुनौती खुद शी जिनपिंग ने दी है. चीन के गुआंगडोंग प्रांत में सैन्य अड्डे का दौरा करने पहुंचे जिनपिंग ने मरीन सैनिकों को युद्ध के लिए तैयार रहने को कहा है. माना जा रहा है शी ने जैसे सीधे-सीधे अमेरिका को धमकी दी है.

ये बात अब किसी से छिपी नहीं है कि ड्रैगन अपनी ताकत दिखाने के लिए जो वीडियो बनाता है. उसमें हॉलीवुड फिल्मों के धमाकेदार सीन डालकर मसाला भरा जाता है. ताकि बम और बारूद फटे तो तो दुश्मन देशों में खौफ भर जाए. चाहे वो वॉर एक्सरसाइज हो, लाइव ड्रिल का ड्रामा हो या फिर जंगी जहाजों और मिसाइलों की खौफनाक ताकत दिखाने की ओछी हरकत. चीन वो सब कुछ करता है, जो उसे लार्जर दैन लाइफ की छवि दे सके. बावजूद इसके जब वीडियो से डराने का हथकंडा नाकाम हो जाता है तो ड्रैगन जंग लड़ने की धमकी पर उतर आता है.

अब दुनिया के डिप्टी सुपर पावर और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी उसी आखिरी स्टेज में पहुंच चुके हैं. धमकी देने की स्टेज पर आ चुके हैं. अव्वल तो कोरोना बांटकर शी जिनपिंग बीजिंग में बिल में जा घुसे और महीनों बाद बाहर निकले तो उनके उदासीन चेहरे से युद्ध के बोल निकलने लगे हैं. सबसे पहले ये जान लीजिए कि चीन कम्यूनिस्ट पार्टी के महासचिव और सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के चेयरमैन शी जिनपिंग ने क्या कहा है.

जिनपिंग ने कहा, “आपको अपना दिमाग और पूरी ऊर्जा युद्ध की तैयारी के लिए लगाना चाहिए और हमेशा बेहद सतर्क रहना चाहिए. मरीन सैनिकों के बहुत से अलग-अलग मिशन हैं और आपकी डिमांड काफी ज्यादा होगी. इसलिए आपको अपनी ट्रेनिंग में जंग की तैयारी पर फोकस रखना चाहिए. साथ ही अपने प्रशिक्षण के मानक और लड़ाकू क्षमता बढ़ाना चाहिए.”

ड्रैगन के इस दांव का टांय-टांय फुस्स होना तय

दक्षिण और पूर्वी चीन सागर से सटे देशों और भारत के साथ चल रहे तनाव के बीच चीन के राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग ने गुआंगडोंग प्रांत का दौरा किया. दौरे के दूसरे दिन एक मिलिट्री बेस पर पहुंचे. सुरक्षा बलों की तैयारियों का जायजा लिया और मरीन सैनिकों को युद्ध के लिए तैयार रहने को कहा.

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक जिनपिंग ने सैनिकों से कहा कि वो ‘एक साथ कई मोर्चो पर मुकाबला करने और सभी मौसम और इलाके में जंग लड़ने के लिए तैयार रहें. चीनी राष्ट्रपति ने कहा कि देश के इलाके, संप्रभुता, समुद्री हितों और विदेशों में चीनी हितों की रक्षा की जिम्मेदारी मरीन सैनिकों के कंधे पर है. सवाल ये है कि मरीन सैनिकों का हौसला बढ़ाकर जंग के लिए तैयार रहने का आदेश देकर बीजिंग के लाल बादशाह आखिर किसे डराने की कोशिश कर रहे थे. शी जिनपिंग का इशारा और इरादा क्या था.

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चीनी राष्ट्रपति की जुबान पर किसी देश का नाम तो नहीं आया, लेकिन माना जा रहा है कि डिप्टी सुपरपावर का इशारा सुपरपावर की तरफ था. शी जिनपिंग का इशारा अमेरिका की तरफ था. क्योंकि दक्षिण चीन सागर से सटे चीन के गुआंगडोंग प्रांत की उनकी यात्रा ऐसे समय पर हो रही है जब ताइवान स्ट्रेट में तनाव अपने चरम पर है. एक तरफ चीन और ताइवान में तनातनी बढ़ रही है तो दूसरी तरफ ताइवान और अमेरिका की नजदीकियां बढ़ रही है. इधर चीन साफ कर चुका है कि ताइवान पर अपना नियंत्रण बनाने के लिए वो सेना का इस्तेमाल कर सकता है. उधर अमेरिका और ताइवान के बीच हथियारों की तीन डील साइन होने की खबर है.

जाहिर है छल-कपट और प्रपंच में माहिर ड्रैगन अब प्रशांत महासागर में अमेरिकी जहाजों की मौजूदगी से बौखला गया है. पड़ोसी देशों पर दादागिरी में विफल होने के बाद अब सीधे-सीधे जंग की बातें करने लगा है, लेकिन ये दीया बुझने से पहले की फड़फड़ाहट है. ड्रैगन का आखिरी दांव है, जिसका टांय-टांय फुस्स होना तय है.