अंबेडकर आज होते तो हाथरस और गोंडा जैसी घटनाओं को देखकर दलितों के लिए क्‍या कदम उठाते?

दलितों ने जितनी तरक्की की है, उनको दबाने और कुचलने के मामले भी उतने ही बढ़े हैं. ये एक पिछड़े समाज के उत्थान के प्रति अगड़ी जातियों का प्रतिरोध है. इसीलिए कानून से ज्यादा ये एक सामाजिक समस्या है.

  • TV9 Hindi
  • Publish Date - 6:24 pm, Wed, 14 October 20

14 अक्टूबर 1956. इसी दिन बाबा साहब अंबेडकर ने हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाया था. आज से ठीक 64 साल पहले ये दलितों के सबसे बड़े नेता और विचारक का हिंदू धर्म में हो रहे भेदभाव के विरोधस्वरूप लिया फैसला था. बाबा साहब ने अपने 3 लाख 80 हजार समर्थकों के साथ हिंदू धर्म का त्याग किया था.

बाबा साहब पूरी जिंदगी दलितों को एक सम्मानपूर्ण जिंदगी दिलाने के लिए संघर्ष करते रहे. लेकिन हिंदू समाज में फैली छुआछूत और भेदभाव जैसी कुरीतियों को खत्म करने में नाकाम रहे. आज 64 साल बाद ये ठहरकर देखने का वक्त है कि बाबा साहब ने दलितों की जागृति के लिए जो आंदोलन चलाया था, उसकी रोशनी कहां तक पहुंची है. उस दौर में नाकाम रहने वाले अंबेडकर आज के वक्त में दलितों के हालात पर क्या कदम उठाते.

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क्या हाथरस और गोंडा जैसी घटनाओं को देखने के बाद ऐसा लगता है कि दलितों के हालात में पिछले 64 वर्षों में कोई बड़ा बदलाव आया है? हाथरस की कहानी चाहे जो हो, हकीकत ये है कि एक दलित की लड़की मारी गई. मामले की जो दर्दनाक कहानी सामने आई, उसने पूरे देश को झकझोर दिया. मीडिया में दलित लड़की के साथ हुए अत्याचार की कहानी ने सुर्खियां बटोरीं और देशभर की मीडिया मामले की पड़ताल में जुट गई.

इस घटना की माडिया में जांच पड़ताल में चाहे जो सामने आया हो लेकिन दलितों की दयनीय स्थिति एक बार फिर देश के सामने आ गई. इसने एक बार फिर बता दिया कि एक समुदाय के तौर पर दलित आज भी उस मुकाम को हासिल नहीं कर पाए हैं, जहां उन्हें सम्मान के साथ जीने का हक हासिल हो. हाथरस मामले की मीडिया पड़ताल में जाने अनजाने दलितों के हालात के कई स्याह सच सामने आ गए. इससे शर्मनाक बात और क्या हो सकती है कि आरोपी परिवार के लोग कहते हैं कि वो दलितों को छूते तक नहीं, उनके बेटे दलित बेटों को कैसे हाथ लगा सकते हैं. ये गुनाह से बचने के लिए दूसरे पाप की स्वीकारोक्ति है, जो आज बेहद ही घिनौना और भद्दा है.

हाथरस प्रतीकात्मक तस्वीर

हाथरस में 19 साल की लड़की से हुआ था रेप (फाइल फोटो)

आप सोच सकते हैं कि जिस वक्त पूरे देश की मीडिया हाथरस में दलित बेटी को इंसाफ दिलाने में लगी थी. उस दौर में भी दलित उत्पीड़न के मामले कम नहीं हुए. टेलीविजन में दिनरात दलित बेटी को न्याय दिलाने की बहस के बीच ही 1 अक्टूबर को खबर आई कि यूपी के बलरामपुर में एक दलित लड़की की गैंगरेप के बाद हत्या कर दी गई. इस मामले में भी पुलिस पर आरोप लगा कि पुलिस ने पीड़िता का जबरदस्ती अंतिम संस्कार करवा दिया. 1 अक्टूबर को भदोही में एक दलित लड़की की सिर कुचलकर हत्या कर दी गई. घरवालों ने आरोप लगाया कि पहले उनकी बेटी से रेप हुआ फिर बेहरमी से कत्ल कर दिया गया.

4 अक्टूबर को खबर आई कि सोनभद्र में तीन भाइयों ने मिलकर एक दलित महिला का गैंगरेप किया. 4 अक्टूबर को ही भोपाल से जानकारी मिली कि 20 साल की एक दलित लड़की से उसके परिचित चौकीदार ने रातभर बंधक बनाकर बलात्कार किया. जब चौकीदार लड़की से रेप कर रहा था, उसके दो साथी कमरे के बाहर पहरेदारी कर रहे थे. रेप के दौरान लड़की को बेहरमी से पीटा भी गया.

6 अक्टूबर को यूपी के प्रतापगढ़ में एक दलित नाबालिग लड़की के साथ रेप की वारदात हुई. लड़की अपने घर में अकेली थी. आरोपी छत के जरिए उसके कमरे में दाखिल हुआ और रेप की घटना को अंजाम दिया. 13 अक्टूबर को पता चला कि यूपी के ही गोंडा में तीन दलित लड़कियों के ऊपर एसिड फेंककर उन्हें जख्मी कर दिया गया. तीनों बहनों पर सोते वक्त उनपर एसिड फेंका गया.

कोरोना काल में भी कम नहीं हुए दलित उत्पीड़न के मामले

ये कोई एक जगह की बात नहीं है. दलितों के साथ अत्याचार की घटनाएं पूरे देश से सामने आईं. ये अपने आप में हैरान करने वाली बात है कि कोरोना के जिस दौर में लोगों को इंसानियत की कद्र सबसे ज्यादा करनी चाहिए, उस वक्त भी दलित उत्पीड़न के मामले कम नहीं हुए. एक रिपोर्ट के मुताबिक लॉकडाउन में दलितों के साथ अत्याचार के मामले और बढ़ गए.

मई के महीने में यूपी के कुशीनगर के एक क्वारंटीन सेंटर पर कोई रसोइया नहीं था. दलित समाज से आने वाली एक महिला प्रधान ने कोरोना संक्रमितों की सेवा के लिए अपने हाथों से खाना बनाया. लेकिन दो लोगों ने खाना खाने से ये कहकर इनकार कर दिया कि वो एक दलित के हाथ का खाना नहीं खा सकते. मध्य प्रदेश में एक दलित दंपत्ति को टॉयलेट में क्वारटीन कर दिया गया. लॉकडाउन के दौरान पीएम ने एक दिन कोरोना वॉरियर्स के सम्मान में लाइट बंद करने का आह्वान किया था. एक दलित के घर लाइट जलती रह गई. इलाके के दबंगों ने उसपर हमला कर दिया.

इससे बुरी बात और क्या हो सकती है कि कोरोना काल में लोगों को बचाने के लिए साफ सफाई करने वाले कर्मचारी को मार डाला गया. मई महीने में यूपी के रामपुर में एक सफाईकर्मी एक गांव में सैनिटाइजर का छिड़काव करने गया था. दबंगों ने उसे जबरदस्ती सैनिटाइजर पिलाकर मार डाला.

दलितों पर अत्याचार की पुष्टि करते हैं ये सरकारी आंकड़े

ये दलितों की दयनीय स्थिति को बताने वाली कुछ दर्दनाक कहनियां हैं. सरकारी आंकड़े तक पुष्टि करते हैं कि दलितों पर अत्याचार के मामले साल दर साल बढ़ते ही जा रहे हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ने साल 2019 के अपराध के रिकॉर्ड जारी किए हैं. आंकड़ों के मुताबिक साल 2019 में दलितों के साथ अत्याचार के मामलों में 7.3 फीसदी की वृद्धि हुई है. दलितों पर अत्याचार के 2018 में 42,793 मामले दर्ज हुए. 2019 में ये बढ़कर 45,935 हो गए. साल 2019 में दलितों के साथ रेप के 3,486 मामले दर्ज किए गए. दलितों पर अत्याचार के मामलों में यूपी नंबर वन पर रहा. यहां दलित उत्पीड़न के 2,378 मामले दर्ज हुए.

आखिर आजादी के 73 वर्षों बाद भी भारत में दलितों के हालात क्यों नहीं बदले? दलित उत्पीड़न के मामले क्यों बढ़ते जा रहे हैं? दरअसल दलितों ने जितनी तरक्की की है, उनको दबाने और कुचलने के मामले भी उतने ही बढ़े हैं. ये एक पिछड़े समाज के उत्थान के प्रति अगड़ी जातियों का प्रतिरोध है. इसीलिए कानून से ज्यादा ये एक सामाजिक समस्या है. दलितों में अपने अधिकारों को लेकर चेतना आई है. लेकिन इसी चेतना के कारण उन्हें प्रतिकार का भी ज्यादा सामना करना पड़ रहा है.

दलितों की बढ़ती आकांक्षाओं की वजह से भी दलित और गैर दलित समुदाय के बीच संघर्ष बढ़ा है. भीमराव अंबेडकर के विचारों से प्रभावित युवाओं के कई समूहों ने अपने हक की आवाज को बुलंद करने के लिए देश के कई हिस्सों में छोटे-मोटे आंदोलन चलाए हैं. ये एक सम्मानजनक जीवन पाने के लिए संघर्ष की लड़ाई है. ऐसी लड़ाइयों का हाल के वर्षों में विस्तार बढ़ा है, इस वजह से भी टकराव की स्थिति बनी है.

प्रदर्शन (सांकेतिक फोटो)

कभी कभार ऐसे ही टकराव एक बड़े आंदोलन का रूप ले लेते हैं. दलित विचारकों का मानना है कि ऐसे ही जन आंदोलनों से हालात बदलेंगे और ऐसा होना जरूरी भी है. जमीनी स्तर पर दलित समुदाय की जिंदगी में तभी बदलाव मुमकिन है, जब उनकी जिंदगी से जुड़े मसले आज की राजनीति पर असर डालने वाले ना हो जाए. बिना सामाजिक क्रांति के हालात बदलने के प्रति ज्यादा आशान्वित नहीं हुआ जा सकता.

भीमराव अंबेडकर का एक कथन बड़ा मशहूर है. उन्होंने कहा था कि सामाजिक अत्याचार की तुलना में राजनीतिक अत्याचार कुछ भी नहीं है और समाज को चुनौती देने वाला व्यक्ति सरकार को चुनौती देने वाले नेता से कहीं ज्यादा साहसिक आदमी होता है. उनके इस कथन को आज
के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखें तो मौजूदा दौर में भी भेदभाव और उत्पीड़न वाली परंपराओं को चुनौती देने वाली छोटी-छोटी घटनाएं होनी चाहिए. ऐसी घटनाओं से ही बदलाव होगा. प्रतिरोध के छोटे-छोटे मामले ही किसी दिन बड़े आंदोलन का आधार बनेंगे. किसी बड़े आंदोलन से ही बदलाव मुमकिन होगा.

Opinion: हाथरस की घटना के बाद देशद्रोह के मामले को लेकर फिर उठे सवाल