महिला IPS ने कहा- वर्दी पहनी है तो फिर Corona से क्यों और कैसा डर?

स्कूल (School) टाइम में वह खाकी वर्दी के बारे में सिर्फ इतना ही जानती थीं कि, ये पुलिस (Police) वाले गुंडों को पकड़ कर जेल भेजते हैं. बस इसी सोच ने उन्हें IPS अधिकारी बना डाला. विजयंता आर्य के पति भी दिल्ली पुलिस में DCP हैं.

Corona Warrior Women IPS, महिला IPS ने कहा- वर्दी पहनी है तो फिर Corona से क्यों और कैसा डर?

उत्तर पश्चिमी दिल्ली जिले की डीसीपी (DCP) विजयंता आर्य (Vijayanta Arya) ने बेबाकी से कहा, “कोरोनावायरस (Coronavirus) किसी वर्दी वाले को नहीं डरा सकता. वर्दी पहनी है तो फिर कोरोना से क्यों और कैसा डर? इससे बचने के लिए हर किसी को सावधानी बरतनी पड़ रही है. हां, कोरोना में 15-16 घंटे की ड्यूटी के बाद देर रात घर पहुंचती हूं.”

वह कहती हैं, “घर जाते ही सात साल का एकाग्र और पांच साल का श्रेष्ठ मुझसे मिलना चाहते हैं. सोशल डिस्टेंसिंग मेंटेन रखने के लिए मैं उनसे छिपती हूं. बच्चों को खुद से दूर करने के लिए सौ बहाने बनाती हूं. बच्चों से झूठ बोलती हूं. इन सबके बाद जब-जब सिपाही अमित (Amit Rana) का चेहरा सामने आता है, तो खुद को बेहद थका-टूटा और हारा हुआ महसूस करती हूं.

बेहद कम उम्र में अमित का दिल्ली पुलिस (Delhi Police) से  बिछड़ना आज भी कंपा देता है और उसकी मौत हमेशा जिंदगी में एक कोना सूना ही रखेगी. जब ध्यान आता है कि, कोरोना ने अमित को हमसे छीन लिया है, तो शून्य में पहुंच जाती हूं.”

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पंजाब के किसान दंपत्ति की बेटी हैं विजयंता

अग्मूटी कैडर की IPS विजयंता आर्य मूल रूप से नाभा (पंजाब) के किसान दंपत्ति बीरबल गोयल और शशि गोयल की छोटी बेटी हैं. इन दिनों वह उत्तर पश्चिमी दिल्ली जिले की डीसीपी (जिला पुलिस उपायुक्त) हैं. वहीं, विजयंता के बड़े भाई दीपांकर गोयल आज भी नाभा में पिता के साथ खेती-किसानी करती हैं.

इस सोच ने उन्हें बनाया आईपीएस अधिकारी

MCM DAV कॉलेज चंडीगढ़ से ग्रेजुएशन करने वाली विजयंता बचपन और किशोरावस्था में खाकी वर्दी का मतलब तो जानती थीं. आईपीएस (IPS) क्या होता है? इसका ज्ञान दूर-दूर तक नहीं था. फिर भी जिद्दी विजयंता चौथे प्रयास में आईपीएस ही बनीं. स्कूल टाइम में वह खाकी वर्दी के बारे में सिर्फ इतना ही जानती थीं कि, ये लोग (पुलिस वाले) गुंडों को पकड़ कर जेल भेजते हैं. बस इसी सोच ने उन्हें ‘वर्दी-वाली’ यानि कि आईपीएस अधिकारी बना डाला.

पहली बार दिल्ली को देखकर क्या सोचा था

आज विजयंता खुद दिल्ली में DCP हैं. जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने पहली बार दिल्ली कब देखी? तो उन्होंने बताया कि जब वह 10वीं या बारहवीं में पढ़ती थीं, तब एक बार पंजाब पब्लिक स्कूल, नाभा (पंजाब) के स्टूडेंट्स का टूर दिल्ली आया था. उन्होंने कहा, “हम लोग यहां एक रात रुककर निकल गये. तब मन में आया था कि, यह शहर तो भीड़भाड़ वाला है. यहां आदमी और वाहन की भीड़ बराबर है. दोनों एक दूसरे में खोये रहते हैं. यहां के लोग कैसे रहते होंगे?”

अब दिल्ली के सब लोग लगते हैं अपने

जब उनसे पुछा गया कि आज खुद उसी बेइंतहा भीड़ वाली दिल्ली के एक जिले की डीसीपी बनकर अब क्या सोचती हैं? तो इस पर विजयंता बोलीं, “अब दिल्ली की भीड़ के लोग ‘अपने लोग’ लगने लगे हैं. वे नागरिक, जिनकी रक्षा-सुरक्षा और जिन्हें न्याय दिलाने की खातिर ही, मुझे आईपीएस की वर्दी पहनने को मिली है.”

कोरोना काल में कर रहीं 15 से 16 घंटे की ड्यूटी

विजयंता आर्य से पूछा गया कि हर आईपीएस के अरमान होते हैं कि वह, वर्दी पहनने के बाद ये करेगा वो करेगा. इस बारे में वह क्या सोचती है? उन्होंने कहा, “सोचना क्या है….कोरोना काल में मैं 15-16 घंटे ड्यूटी दे रही हूं. सुबह 6-7 बजे से अपनी जिंदगी, डिपार्टमेंट की डेली डायरी से शुरू करती हूं. रात करीब 12 से 1 बजे तक घर पहुंच पाती हूं.”

बच्चों को संक्रमण से बचाने के लिए नहीं जातीं उनके पास

कोरोना संक्रमण के अच्छे-बुरे वे अनुभव, जो जिंदगी में आखिरी दम तक साथ रहेंगे? पूछने पर विजयंता बोलीं, “दिन भर की कोरोना ड्यूटी के बाद जब 10-11 बजे या आधी रात को घर पहुंचती हूं, तो एकाग्र और श्रेष्ठ (दोनों बेटे) मुझसे लिपटने को दौड़ते हैं. उस वक्त दोनों बच्चों से मैं दूर घर में इधर-उधर छिपने की कोशिश करती हूं.

बच्चों के दादा (दीवान चंद आर्य) उन्हें पकड़ते हुए मुझसे दूर घर में कहीं ले जाने की कोशिश करते हैं, ताकि जाने-अनजाने वे सब किसी संक्रमण की चपेट में न आ जायें. तब कलेजा मुंह को आ जाता है कि, इस कोरोना के चलते मैं 15 घंटे दूर रहने के बाद भी बच्चों को छू नहीं सकतीं. सिर्फ और सिर्फ कोरोना के कारण.”

रुला देता है बहादुर सिपाही अमित राणा की मौत का गम

अब तक करीब तीन महीने के लॉकडाउन (Lockdown) और कोरोना-काल की दिल्ली पुलिस की नौकरी का सबसे खुशी का मौका? पूछने पर डीसीपी विजयंता आर्य ने कहा, “बच्चों को खुद से दूर भगाना और भारत नगर थाने के अपने बहादुर सिपाही अमित राणा की कोरोना संक्रमण से हुई मौत रुला देती है. बच्चे, पति, परिवार, दोस्त तो साथ हैं. आज नहीं तो कल मिल लूंगी. अमित राणा को मैं और दिल्ली पुलिस इतनी छोटी उम्र में खो चुके हैं कि, बस पूछिये मत.”

किसी से जाहिर नहीं करतीं अपने मन का दर्द

उन्होंने कहा, “अमित की मौत का गम शब्दों से बयान कर पाना बेईमानी सा लगता है. अक्सर सोचती हूं कि काश कोई अचानक सामने आकर कह दे, ‘मैडम अमित तो जीवित हैं.’ लेकिन यह सब तो इंसानी मन को समझाने के फिजूल रास्ते हैं. सच और दु:ख को मिटाने की कोई रबड़ तो बनी ही नहीं है. अमित को लेकर खुद के मन का दर्द अपनों (पुलिस स्टाफ) के सामने केवल इसलिए जाहिर नहीं करतीं कि, कहीं उनके सब्र का बांध टूट न जाये.”

कोरोना ने समझाई सोशल डिस्टेंसिंग की अहमियत

कोरोना ने क्या दिखाया और क्या सिखाया? पूछे जाने पर विजयंता बोलीं, “कोरोना काल में आधुनिक तकनीक ने इंसानों के रिश्तों को रिप्लेस किया. सोशल डिस्टेंसिंग (Social Distancing) की अहमियत कोरोना ने ही समझाई है. कोरोना ने ‘प्रोटोकॉल’ की ऐसी परिभाषा दी है, जो सदियों बाद भी इतिहास के पीले पड़ चुके पन्नों से कोई नहीं मिटा पायेगा. कोरोना सिर्फ महामारी ही नहीं, हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बुरा इतिहास है, जिसकी यादें मन को कंपा जायेंगी.”

कोरोना काल में पुलिस और पब्लिक आए एक-दूसरे के करीब

महिला डीसीपी और कोरोना वॉरियर (Corona Warrior) आईपीएस अधिकारी विजयंता आर्य के ही शब्दों में, “पुलिस और पब्लिक दोनों को कोरोना-काल ने ही सिखाया-समझाया कि, हम एक दूसरे के कितने काम के हैं? इंसानी जिंदगी की नई प्राथमिकताएं (Priorities) कोरोना काल ने ही तय की हैं.

कानून की नजर से देखने पर भले ही लॉकडाउन में पुलिस और पब्लिक के बीच गैप बढ़ा होगा, लेकिन सच यह है कि लॉकडाउन में ही हम दोनों (पुलिस और पब्लिक) दिल से एक दूसरे के करीब भी पहुंचे हैं. अब तक तीन महीने के कोरोना काल ने लोगों को तमाम जिंदगी भर की सीखें दे दी हैं. अचानक किसी के सामने खतरा कैसे बढ़ सकता है? यह भी कोरोना ने सिखाया है.”

सभी रिश्तों से वर्दी है सबसे आगे

कोरोना काल की इन व्यस्तताओं में मां, पिता, भाई और अन्य रिश्तेदारों के साथ कैसे कॉन्टैक्ट रख पा रही हैं? पूछने पर वह बोलीं, “उन सबको समझाना आसान है कि, वर्दी सबसे आगे है. लेकिन वर्दी को समझाना बिलकुल सही नहीं होगा कि, मेरे सामने वर्दी से पहले कोई इंसानी रिश्ता (मां-बाप, भाई, बहन) भी खड़ा है.”

क्या सीखा लॉकडाउन के सन्नाटे और कोरोना के काले दिनों में

विशेष बातचीत के अंत में पूछे जाने पर कि, “बीते कल की पंजाब के नाभा के किसान परिवार की बेटी और आज राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की महिला आईपीएस-डीसीपी ने एक लाइन में लॉकडाउन के सन्नाटे और कोरोना के काले दिनों में क्या सीखा?” बेबाक विजयंता बोलीं, “लॉकडाउन के सूनेपन/सन्नाटे ने भीड़ वाली दिल्ली की गलियों में पेड़ पर बैठी कोयल की कू-कू सुनना-देखना सिखा दिया है.”

एक छोटा सा फार्मूला है कोरोना की हर समस्या का हल

पति भी दिल्ली पुलिस में डीसीपी हैं. वह खुद भी जिला डीसीपी हैं. ऐसे में घर-परिवार और दोनों छोटे बच्चों की जिम्मेदारी के बीच संतुलन का क्या फार्मूला है? पूछने पर विजयंता बोलीं, “कोरोना काल में तो वर्दी और जनता सबसे आगे है. बाकी सबकुछ पीछे है. यह छोटा सा फार्मूला कोरोना की हर समस्या को काट देता है.”

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