Ayodhya Case: वो भयावह मंजर, जब कारसेवकों पर चली थीं गोलियां

अंधाधुंध फायरिंग बिना मजिस्ट्रेट के आदेश के हुई. फायरिंग के बाद सी.आर.पी.एफ. ने जिला मजिस्ट्रेट राम शरण श्रीवास्तव से गोली चलाने के आदेश पर दस्तखत करवाए.

दो नवंबर को अयोध्या फिर मरने-मारने पर उतारू थी. कारसेवक जन्मभूमि तक किसी भी हाल में जाने को कटिबद्ध थे, तो प्रशासन ने सारी ताकत इस बात पर लगाई थी कि कारसेवक किसी कीमत पर वहां फटक न पाएं. 30 अक्तूबर को कारसेवा की कामयाबी से प्रशासन में खीझ और हताशा तो पहले से ही थी.

सुबह-सुबह ही मणिरामदास छावनी, दिगंबर अखाड़े और सरयू की तरफ से कारसेवकों का हुजूम निकला. पुलिस ने तीनों तरफ से आती भीड़ को हनुमानगढ़ी चौराहे पर रोकने की कोशिश की. भीड़ नहीं मानी तो अंधाधुंध गोली चलने लगी.

एस.एस.पी. सुभाष जोशी का कहना था, गोली के अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं था. नहीं तो कारेसवक हमें कुचल डालते और ढांचे को तोड़ देते. पर जिस स्थान पर गोली चली वह ढांचे से कोई दो किलोमीटर दूर था. और कारसेवक निहत्थे थे. दिगंबर अखाड़े से आने वाला जुलूस तो गोली की आवाज सुन वहीं सड़क पर बैठ गया और रामधुन गाने लगा.

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मैं अपने एक साथी संवाददाता जे.पी. शुक्ला के साथ दीवार से सटकर खड़ा हो गया, क्योंकि पुलिस की गोलियां हमारे अगल-बगल से सनसनाती हुई निकल रही थीं. शुक्ला ‘द हिंदू’ से अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं. एक दफा तो शुक्लाजी की एस.एस.पी. सुभाष जोशी से झड़प भी हो गई. उनका कहना था कि जो सड़कों पर निहत्थे लोग बैठे हैं, उन पर गोली क्यों चला रहे हैं? लेकिन कोई कुछ नहीं कर पा रहा था. सबके माथे पर खून सवार था.

इस गोलीकांड के बाद अयोध्या की सड़कें, मंदिर और छावनियां कारसेवकों के खून से सन गईं. अर्धसैनिक बलों की अंधाधुंध फायरिंग से अनगिनत लोग मारे गए. ढेर सारे घायल हुए. हमने कोई पच्चीस लाशें सड़कों पर छितरी देखीं. शाम को इस गोलीकांड में मारे गए 40 कारसेवकों की सूची कारसेवक समिति ने अखबारों को जारी की. उनके पास भी घायलों का कोई हिसाब नहीं था.

प्रशासन ने दावा किया कि कारसेवक जन्मस्थान परिसर के करीब पहुंच गए थे. यह गलत था, क्योंकि गोलीकांड विवादित इमारत से दो किलोमीटर दूर हुआ. प्रशासन की दूसरी दलील थी. कारसेवकों को पहले आंसूगैस, लाठीचार्ज से खदेड़ने की कोशिश हुई. जब यह बेअसर रहा तो गोली चलाई गई. पर तथ्य यह है कि प्रशासन ने कारसेवकों पर अंधाधुंध गोलियां उस वक्त चलवाईं, जब कारसेवक सत्याग्रह के लिए सड़कों पर बैठकर रामधुन गा रहे थे.

कार्तिक पूर्णिमा का स्नान करके कारसेवक और साधु पुलिस घेरों की तरफ सबेरे करीब नौ बजे बढ़े. सुरक्षा बलों ने विवादित परिसर से एक किलोमीटर दूर तक का क्षेत्र पहले ही सील किया हुआ था. गलियों के मुहाने पर और हनुमानगढ़ी के पास पुलिस सुरक्षा चौकियां बनी थीं. कारसेवकों ने आकर यहीं जमाव बनाया.

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सुरक्षा बलों के खदेड़ने पर कारसेवक वहीं पर बैठ जाते. भीड़ जमती देख आई.जी. जोन जी.एल. शर्मा ने मातहत अधिकारियों से कहा कि सरकार के साफ निर्देश हैं कि भीड़ किसी भी कीमत पर सड़कों पर नहीं बैठेगी. आई.जी. के इस निर्देश के बाद सुरक्षा बलों ने आंसू गैस और लाठीचार्ज कर कारसेवकों को भगाने की कोशिश की. मगर कारसेवक डटे रहे. तभी अर्धसैनिक बल बिना चेतावनी के गोली चलाने लगे. गली-कूचों में दौड़ा-दौड़ाकर कारसेवकों को निशाना बनाकर गोलियां दागी गईं.

गोलीकांड ऑपरेशन का संचालन आई.जी. जोन जी.एल. शर्मा, एस.एस.पी. सुभाष जोशी, सी.आर.पी.एफ. के उप-कमांडर उस्मान, और 58वीं बटालियन के उप कमांडर तरमेंदर भुल्लर कर रहे थे. प्रशासन का यह ऑपरेशन इतना बर्बर और निर्मम था कि घायलों को उठाने तक की कारसेवकों को इजाजत नहीं थी, न ही पुलिस बल घायलों को खुद उठा रहे थे. घायल सड़कों पर तड़प रहे थे.

इस निर्मम गोलीकांड में जो मरे, उनमें पांच लोग दंतधावन कुंड में, तीन खाकी अखाड़े में, तीन हनुमानगढ़ी पर, एक रामबाग में, तीन लोग अलग-अलग घरों में और दो लाशें कोतवाली के सामने मिलीं. पांच कारसेवकों की लाश उनके साथी उठाकर ले गए. उन्हें मणिरामदास छावनी के चार धाम मंदिर में रखा गया था.

अंधाधुंध फायरिंग बिना मजिस्ट्रेट के आदेश के हुई. फायरिंग के बाद सी.आर.पी.एफ. ने जिला मजिस्ट्रेट राम शरण श्रीवास्तव से गोली चलाने के आदेश पर दस्तखत करवाए. जब गोलियां चल रही थीं, तब जिलाधिकारी बेचैन थे. उन्होंने अधिकारियों से कहा, “मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि इस तरह कितने लोगों को मारा जाएगा.”

गोली चलाने के आदेश पर जबरन दस्तखत कराने के खिलाफ जिलािधकारी उसी रात छुट्टी पर चले गए. फैजाबाद के आयुक्त मधुकर गुप्ता तक यह बताने की स्थिति में नहीं थे कि कितने राउंड गोली चलाई गई हैं.

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हनुमानगढ़ी चौराहे पर सबसे पहले गोली सुबह 10:30 बजे चली. इसके बाद पुलिस बल दिगंबर अखाड़े की ओर बढ़ा. सुरक्षा बलों के निशाने पर कई रोज से यह अखाड़ा था. सारी गतिवििधयां यहीं से संचालित हो रही थीं. दिगंबर अखाड़े के पास एक घर से बाहर खींचकर सी.आर.पी.एफ. के जवानों ने कोलकाता से आए दो भाई शरद कोठारी और रामकुमार कोठारी का सिर गोलियों से उड़ा दिया.

वहीं हमारे सामने सड़क के उस पार खड़े जोधपुर के सीताराम माली का कसूर सिर्फ इतना था कि वह आंसू गैस का गोला उठाकर नाली में डाल रहा था. सी.आर.पी.एफ. की टुकड़ी ने बंदूक उसके मुंह पर रखकर गोली दागी. फैजाबाद के राम अचल गुप्ता की अखंड रामधुन बंद नहीं हो रही थी. सुरक्षा बलों ने उन्हें पीछे से गोली दागकर मार डाला.

अंधाधुंध फायरिंग में पुलिस ने मंदिरों, अखाड़ों की पवित्रता का भी ध्यान नहीं रखा. मंदिरों में घुस-घुसकर कारसेवकों पर गोलियां चलाईं. रामानंदी दिगंबर अखाड़े में घुसकर साधुओं पर कई राउंड गोलियां चलाईं. साधुओं में त्राहि-त्राहि मच गई. फायरिंग के वक्त सी.आर.पी.एफ. के कुछ जवान रो रहे थे. कई ने अपनी बंदूक रख डंडा उठा लिया था.

अखाड़े में घुसने के बाद डी.आई.जी. रेंज जी.एल. शर्मा ने सी.आर.पी.एफ. की टुकड़ी को लौट आने को कहा. सी.आर.पी.एफ. के एक डिप्टी कमांडर संपत सिंह ने तैश में आकर कहा, “सर, अब हम पीछे नहीं हटेंगे, हमने कामयाबी हासिल कर ली है, अब हम मंदिरों और अखाड़ों को खाली कराकर ही लौटेंगे.” डी.आई.जी. पीछे हो गए और टुकड़ी ने अंधाधुंध गोलियां चलाईं.

एस.एस.पी. की चेतावनी के बाद भी हम वहां से हट नहीं रहे थे. मुझे लगा कि शायद हमारी उपिस्थति से उनकी बर्बरता कम हो, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हम सड़क के इस किनारे से उस किनारे तक अपने को बचाते दीवारों की ओट लेकर खड़े रहे. अब हम हनुमानगढ़ी चौराहे से दिगंबर अखाड़े तक आने वाली गली में थे.

जब पत्रकारों के लिए सुरक्षा कवच बने ‘जय श्रीराम’

राजस्थान के श्रीगंगानगर से आया एक कारसेवक, जिसका नाम पता नहीं चल पाया, गोली लगते ही गिर पड़ा और उसने अपने खून से सड़क पर लिखा—सीताराम. पता नहीं यह उसका नाम था या भगवान का स्मरण. मगर उसके सड़क पर गिरने के बाद भी सी.आर.पी.एफ. की टुकड़ी ने उसकी खोपड़ी पर गोली मारी. बिलखते साथी ने बताया कि वे गंगानगर से आए हैं.

तुलसी चौराहे के कत्लेआम के बाद 10:45 पर पुलिस ने कोतवाली के सामने बैठे कारसेवकों पर गोली चलाई. कारसेवकों की यह भीड़ एक घंटे से सड़क पर बैठकर रामधुन गा रही थी. इसका नेतृत्व खजुराहो से सांसद उमा भारती और अहमदाबाद के सांसद हरेंद्र पाठक कर रहे थे. दोनों को गिरफ्तार करने के बाद पुलिस ने यहां भी गोली चलाई.

कोतवाली के सामने वाले मंदिर का पुजारी वहीं ढेर हो गया. रामबाग के ऊपर से एक साधु आंसू गैस से परेशान लोगों के लिए बाल्टी से पानी फेंक रहा था. सुरक्षा बलों ने उसे भी निशाना बनाया. गोली लगते ही साधु छत से नीचे टपक गया. फायरिंग के बाद सड़कों और गलियों में छितरे शवों को छुप-छिपाकर कारसेवक उठा ले गए. विनय कटियार ने 40 मृतकों की सूची हमें दी.

देर शाम तक अयोध्या में मरघट का सन्नाटा था. चौतरफा शोक और उत्तेजना थी. समूची अयोध्या पर पुलिस और कारसेवकों का कब्जा था. साधु-संत मंदिरों में कैद थे. मंदिरों के पट बंद थे. घंटे-घड़ियाल बंद हो गए थे. शाम का भोग कहीं नहीं लगा. चारों तरफ स्यापा था. कर्फ्यू केवल कागजों पर था. लोग घायलों को लेकर सड़कों पर दौड़ रहे थे.

प्रतिक्रिया में देश के दूसरे हिस्सों में दंगों की शुरुआत हो चुकी थी. इनमें 54 लोगों के मारे जाने की खबर थी, अयोध्या में जो मारे गए, उनके अलावा 24 गुजरात में, 13 बिहार में, चार कर्नाटक में, छह आंध्र प्रदेश में और राजस्थान में दो लोगों के मारे जाने की खबर थी. उत्तर प्रदेश के 42 शहरों में कर्फ्यू लगा दिया गया था. राज्य से गुजरने वाली कई ट्रेनें रद्द कर दी गईं. खबरों पर रोक लग गई. इलाहाबाद, लखनऊ और वाराणसी में अखबारों के सांध्य संस्करणों को सरकार ने जब्त कर लिया, ताकि तनाव और न फैले.

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