आज से 25 साल पहले भी टकराए थे चुनाव आयुक्त, शेषन को काबू में लाने का रोचक किस्सा

चुनाव आयोग में घमासान सतह पर आ चुका है. अशोक लवासा ने खुली जंग छेड़ दी है मगर ये पहली बार नहीं है. ऐसा पहले भी हुआ है जब चुनाव आयुक्त आमने-सामने आ गए हों.

लोकसभा चुनाव खत्म होते-होते चुनाव आयोग की फूट भी सामने आ ही  गई. प्रधानमंत्री मोदी को आचार संहिता तोड़ने के मामले में आयोग बार-बार क्लीन चिट दे रहा था लेकिन सूत्रों के मुताबिक चुनाव आयुक्त अशोक लवासा इस पर असहमति जता रहे थे. अब लवासा ने मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा को खत लिख दिया है. खत में लिखा कि आयोग के फैसलों में आयुक्तों के बीच मतभेद को भी आधिकारिक रिकॉर्ड में शामिल किया जाए.

इस बवाल पर मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने कहा है कि- चुनाव आयोग में 3 सदस्य होते हैं और तीनों एक-दूसरे के क्लोन नहीं हो सकते. मैं किसी भी तरह के बहस से नहीं भागता. हर चीज का वक्त होता है.

ज़ाहिर है, लवासा चुनाव आयोग में सुप्रीम कोर्ट जैसी व्यवस्था चाहते हैं जिसमें किसी केस में फैसला सुनाते हुए जज की असहमति भी दर्ज होती है.

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि तीनों चुनाव आयुक्तों की ताकत समान होती है और किसी फैसले में बहुमत को ही आधार माना जाता है पर भारत में ये व्यवस्था हमेशा नहीं थी. एक वक्त था जब एक ही चुनाव आयुक्त होता था.

दरअसल 1990 में मुख्य चुनाव आयुक्त बने टी एन शेषन ने अपने तौर तरीकों से नेताओं में खौफ पैदा कर दिया था. सरकारी अफसरों को भी उनकी डांट फटकार से दो-चार होना पड़ता.

ECI, आज से 25 साल पहले भी टकराए थे चुनाव आयुक्त, शेषन को काबू में लाने का रोचक किस्सा
टी एन शेषन ने चुनाव आयोग संभालने के बाद जैसी सख्ती दिखाई उसने नेताओं को दहला दिया

2 अगस्त 1993 को टीएन शेषन ने 17 पेज का एक ऐसा आदेश जारी किया जिसने देशभर के नेताओं को अहसास करा दिया कि चुनाव आयोग बिना दांतों का शेर बनकर रहने को तैयार नहीं. शेषन ने लिखा कि “जब तक वर्तमान गतिरोध दूर नहीं होता, जो केवल भारत सरकार द्वारा बनाया गया है, चुनाव आयोग अपने संवैधानिक कर्तव्य निभा पाने में खुद को असमर्थ पाता है. उसने तय किया है कि उसके नियंत्रण में होने वाले हर चुनाव, जिसमें हर दो साल पर होने वाले राज्यसभा के चुनाव और विधानसभा के उप चुनाव भी, जिनके कराने की घोषणा की जा चुकी है, आगामी आदेश तक स्थगित रहेंगे.”

ऐसे आदेश पर हंगामा कटना ही था लेकिन शेषन का आदेश भी महज़ दिखावटी नहीं था. उन्होंने पश्चिम बंगाल की राज्यसभा सीट पर चुनाव नहीं होने दिया जिसके चलते केंद्रीय मंत्री प्रणब मुखर्जी को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ गया.

जब सरकार ने देखा कि शेषन किसी भी तरह काबू नहीं आ रहे तो दो और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कर दी गई. ये दो चुनाव आयुक्त थे- जीवीजी कृष्णमूर्ति और एम एस गिल. सबसे हैरानी की बात थी कि जब ऐसा किया गया तब शेषन दिल्ली से बाहर थे.

ECI, आज से 25 साल पहले भी टकराए थे चुनाव आयुक्त, शेषन को काबू में लाने का रोचक किस्सा
एम एस गिल ने टीएन शेषन के साथ पटरी बैठाने की खूब कोशिश की

बीबीसी से बात करते हुए बाद में मुख्य चुनाव आयुक्त बने एम एस गिल ने कहा था-  “मैं उन दिनों कृषि सचिव था. मैं ग्वालियर गया हुआ था किसी दौरे के सिलसिले में. जब मैं वहाँ पहुंचा तो वहाँ नरसिम्हा राव के प्रधान सचिव अमरकांत वर्मा का फ़ोन आया. वो आईएएस में मुझसे सीनियर थे और मेरे दोस्त भी थे. उन्होंने मुझसे तुरंत दिल्ली आने के लिए कहा.”

“जब मैंने अपनी मुश्किल बताई तो उन्होंने मुझे लाने के लिए एक जहाज़ भेज दिया. मैं चार बजे दिल्ली पहुंचा और सीधे प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव से मिलने पहुंचा, जहाँ मेरी उनसे काफ़ी तफ़सील से बात हुई. जब मैं चुनाव आयोग अपना पद गृहण करने पहुंचा, तब तक कृष्णामूर्ति अपना चार्ज ले चुके थे,  क्योंकि वो नौकरी लेने के लिए उतावले थे.”

कृष्णामूर्ति ने पद संभालते ही राष्ट्रपति से शिकायत कर दी कि आयोग में उन्हें बैठने के लिए जगह नहीं दी जा रही है. उधर शेषन भी पुणे से दिल्ली लौटे. उन्हें सरकार के इस फैसले से नाराज़गी थे. टीएन शेषन के जीवनीकार गोविंदन कुट्टी बताते हैं कि  “कृष्णामूर्ति ने शेषन के बगल में पड़ी कुर्सी पर ये कहते हुए बैठने से इनकार कर दिया कि ये कुर्सियाँ तुम्हारे चपरासियों के लिए हैं. उन्होंने शेषन से कहा कि अगर आपको मुझसे बात करनी है तो मेरे बगल में आ कर बैठिए.”

“तभी गिल कमरे के अंदर घुसे. उनकी समझ में नही आया कि वो मूर्ति की बगल में बैठें या शेषन के सामने की कुर्सी पर बैठें. पूरी बैठक के दौरान कृष्णामूर्ति शेषन पर फ़ब्तियाँ कसते रहे, जिसकी उस समय की सरकार की उनसे अपेक्षा थी.”

ECI, आज से 25 साल पहले भी टकराए थे चुनाव आयुक्त, शेषन को काबू में लाने का रोचक किस्सा
जीवीजी कृष्णमूर्ति ने शेषन को खूब भड़काया पर वो नहीं भड़के

टीएन शेषन नवनियुक्त आयुक्तों के भड़काने से भड़के तो नहीं लेकिन सहयोग भी नहीं किया. जब शेषन को अमेरिका जाना था तो उन्होंने इनमें से किसी को भी चार्ज नहीं सौंपा. उनकी जगह उप चुनाव आयुक्त डीएस बग्गा को कार्यभार सौंपा. इससे तो बवाल और बड़ा हो गया. आखिरकार मामला सुप्रीम कोर्ट जा पहुंचा. आदेश आया कि शेषन की गैर हाज़िरी में चनाव आयोग एम एस गिल चलाएंगे.