जब भारत के गृहमंत्री की बेटी को आतंकियों ने किया अगवा

वो घाटी में बीत रहा सर्दियों का कोई आम दिन ही था, लेकिन सूरज छिपतेछिपते एक वारदात उस तारीख को सनसनीखेज़ बना देनेवाली थी. 29 साल पहले का वो कश्मीर आज जैसा नहीं था. राजनीतिक रस्साकशी करनेवाले हाथों ने नारे लिखी तख्तियां छोड़कर बंदूकें थाम ली थीं. दो साल पहले जम्मूकश्मीर में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव की धांधलियों ने राजनीतिक कार्यकर्ताओं के एक बड़े तबके को आतंक के कुएं में धकेल दिया था. उनमें बहुत नाराज़गी थी. चुनाव में खड़ा हुआ एक उम्मीदवार मोहम्मद युसुफ शाह हिज्बुल मुजाहिद्दीन का खूंखार आतंकी सईद सलाहुद्दीन बन गया था जबकि उसका बूथ मैनेजमेंट संभालनेवाला यासीन मलिक हथियारबंद जेकेएलएफ की कमान संभालने में जुट गया था.

वो शाम जब गृहमंत्री की बेटी हुई अगवा

बम और बंदूक की राह पर चलनेवालों ने अपना एक खास मिशन पूरा करने के लिए 8 दिसंबर 1989 का दिन तय किया. छह दिन पहले ही देश के पहले मुस्लिम गृहमंत्री के तौर पर मुफ्ती मोहम्मद सईद ने शपथ ली थी. आतंकियों ने तय किया कि मुफ्ती की छोटी बेटी रुबिया के सहारे ही वो भारत सरकार को ब्लैकमेल करेंगे.  

दोपहर करीब 3 बज कर 25 मिनट पर 23 साल की रुबिया जो श्रीनगर के लल देद मेमोरियल अस्पताल में इंटर्न थी, मिनी बस में चढ़ी. रुबिया की मंज़िल नौगाम में उसका घर थी लेकिन बीच सफर में ही उसका अपहरण करने की नीयत से कुछ युवक बस में चढ़ गए. करीब बीस मिनट बाद अचानक तीन अजनबियों ने बंदूकों की नोंक पर रुबिया को बस से उतार लिया और नीले रंग की मारुति कार में बैठाकर ओझल हो गए.

दो घंटे के भीतर रुबिया के अपहरण की खबर दिल्ली में उसके पिता गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद तक पहुंच चुकी थी. जम्मूकश्मीर लिबरेशन फ्रंट नाम के संगठन ने घटना की ज़िम्मेदारी लेते हुए अपनी मांग रख दी थी. वो चाहते थे कि उनके पांच साथियों को जेल से रिहा कर दिया जाए. उनके नाम थे 

जेकेएलएफ का एरिया कमांडर शेख अब्दुल हमीद, मकबूल भट्ट का छोटा भाई गुलाम नबी भट्ट, नूर मुहम्मद कलवल, मुहम्मद अल्ताफ और मुश्ताक अहमद ज़रगर जिसे 1999 में Indian Airlines Flight 814 को बंधकों से मुक्त कराने के लिए भारत सरकार ने मौलाना मसूद अज़हर के साथ छोड़ा था.

 

घाटी में वारदात, दिल्ली तक हलचल

देशभर में हड़कंप मचा था. महज़ छह दिन पुरानी सरकार के हाथ पांव फूले हुए थे. आनन फानन में अरुण नेहरू, आरिफ मुहम्मद खान और इंद्रकुमार गुजराल को बुलाकर एक कमेटी बनाई गई. उधर श्रीनगर में भी राज्य के चीफ सेक्रेटरी मूसा रज़ा ने स्पेशल सेल बनाकर संकट से सामना करने की ठानी. अगले पूरे दिन अपहरणकर्ताओं से संपर्क करने की कोशिशें चलती रहीं.

दस दिसंबर को जेकेएलएफ ने अपनी मांग दोहराते हुए साफ कहा कि कल तक हमारे साथियों को छोड़ दें वरना रुबिया की लाश श्रीनगर में फेंक दी जाएगी. राज्य सरकार के मुखिया और मुफ्ती मोहम्मद सईद के कट्टर प्रतिद्वंद्वी फारुख अब्दुल्ला लंदन में अपनी छुट्टियां अधूरी छोड़कर श्रीनगर वापस लौट आए. वो जेकेएलएफ की मांग के सामने झुकने को तैयार नहीं थे, लेकिन केंद्र सरकार नरम पड़ती दिख रही थी. अब तक इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस एम एल भट्ट रुबिया की रिहाई के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाने को तैयार हो गए थे. भट्ट की मुफ्ती से पुरानी दोस्ती थी.

वक्त तेज़ी से बीत रहा था. जो डेडलाइन दी गई थी वो गुज़र गई. केंद्र और राज्य के बीच एक खींचतान साफ देखी जा रही थी. 13 दिसंबर की तड़के करीब साढ़े 3 बजे इंद्रकुमार गुजराल और आरिफ मुहम्मद खान श्रीनगर पहुंचे. उन्होंने सीएम फारुख को प्रधानमंत्री की तरफ से मिले आदेश की सूचना दी. असहमत होते हुए भी फारुख ने पांचों कैदियों को छोड़ दिया. दोपहर 3 बजतेबजते जेकेएलएफ के साथी रिहा हुए और एक घंटे बाद घाटी के पत्रकार ज़फर मीराज के पास फोन गया कि हमारे लोग लौट आए हैं, अब रुबिया भी जल्द ही घर पहुंच जाएगी.

वाकई एक घंटे के बाद रुबिया अपने परिवार के साथ थी. मुफ्ती परिवार खुश था और उधर पांचों आतंकियों की रिहाई का जश्न भी श्रीनगर में मनाया जा रहा था. अलगाववादी धड़ा इन रिहाइयों को अपनी जीत की तरह ले रहा था. फारुख अब्दुल्ला कसमसा रहे थे. उन्होंने तो साफ कह दिया था कि अगर मेरी अपनी बेटी को भी किडनैप किया जाता तो भी मैं किसी आतंकी को रिहा नहीं करता.

 

किसका था आतंकियों की रिहाई का फैसला?

मुफ्ती मोहम्मद सईद ने हमेशा ही कहा कि आतंकियों की रिहाई का फैसला राज्य सरकार का था। जनवरी 1990 में उन्होंने इंडिया टुडे से कहा कि मेरा और केंद्र का, राज्य सरकार की कैबिनेट द्वारा लिए गए फैसले में कोई दखल नहीं था।

वहीं दिल्ली में दुल्लत की किताब के विमोचन पर फारुख अब्दुल्ला ने घटना को दूसरी तरह से पेश किया। उन्होंने कहा कि केंद्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान और आई के गुजराल ने आतंकियों की रिहाई का विरोध करने पर उन्हें सत्ता से बेदखल करने की धमकी दी थी। फारुख बताते हैं कि आतंकियों की रिहाई को खुद उन्होंने भारत के ताबूत में आखिरी कील तक कहा था।

कारवां में छपे एक लेख में प्रवीण दोंती ने लिखा है कि पत्रकार युसुफ ज़मील के मुताबिक, ‘वो एक निर्णायक मोड़ था। इसे भारत सरकार और सुरक्षाबलों पर कश्मीरियों की फतह के रूप में देखा गया। इसका असर ज़बरदस्त हुआ।

रेडिफ के एक लेख में चिंदू श्रीधरन इस घटना का विस्तार से उल्लेख करते हैं। दस साल तक घाटी में रहनेवालीं आशा खोसा ने कहा कि, ‘अपहरण कांड को लेकर घाटी में रुबिया के लिए कोई हमदर्दी नहीं थी। लोग अपहरणकर्ताओं के साथ दिखे। ये घटना एक झटका थी। अब तक लोग मिलिटेंसी को मज़ाक की तरह लेते थे, लोग कहा करते थे कि मेरा कज़िन भी अब मिलिटेंट है, उसके पास बंदूक है।एक अपहरण ने लोगों का नज़रिया बदलकर रख दिया। आशा आगे कहती हैं कि, ‘उग्रवादियों के छूटने के बाद चारों तरफ जश्न था। इतने लोग मैंने कभी एक साथ गलियों में नहीं देखे थे। वो गा रहे थे, नाच रहे थे और भारत विरोधी नारे लगा रहे थे।

इस दौर में एक नारा बेहद चलाजो करे खुदा का खौफ, उठा ले कैलेशनिकोव!

माना जाता है कि इस कांड के बाद साल 1995 तक अपहरणों का दौर ही चल पड़ा। उन दिनों देश बहस करने लगा था कि अगर वीपी सिंह सरकार ने रुबिया सईद मामले में घुटने ना टेके होते तो आतंकवादियों को इतनी शह नहीं मिलती। हालांकि साल 1999 में एक बार फिर देश के सामने कंधार अपहरण कांड खड़ा था और तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने वही दोहराया जो वीपी सिंह सरकार ने किया था।

 

खुद गृहमंत्री ने रचा था बेटी के अपहरण का नाटक!

चलतेचलते एक थ्योरी के बारे में और बता दें। कई लोगों का मानना है कि रुबिया का अपहरण सिर्फ एक नाटक था, और इसमें खुद मुफ्ती मोहम्मद सईद शामिल थे। घाटी के अलगाववादी नेता हिलाल वार ने एक किताब लिखी हैग्रेट डिस्कलोज़रसीक्रेट अनमास्क्ड। उन्होंने आरोप लगाया कि रुबिया का अपहरण सिर्फ एक राजनीतिक नाटक था।

कारवां में छपी मुफ्ती की लंबी चौड़ी प्रोफाइल में लिखा कि गृहमंत्री के तौर पर जब मुफ्ती दिल्ली में रहते थे तो पास ही रहनेवाले गुरुस्वामी की उनसे मुलाकात हुई। उन्होंने बताया कि, ‘अपहरण कांड के दौरान मुफ्ती एकदम चुप थे, जबकि उनके ईर्द गिर्द लोग खूब बतियाते थे। उन्हें पता था कि लड़के उनकी बेटी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाएंगे और उसका अच्छा ख्याल रखेंगे।

जुलाई 2012 में नेशनल सिक्योरिटी ग्रुप के पूर्व मेजर जनरल ओपी कौशिक ने भी दावा किया था कि खुद रुबिया के पिता और तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी जल्द रिहा हो। कौशिक ने कहा था कि अपहरण की सूचना मिलने के महज़ पांच मिनट के भीतर एनएसजी ने मालूम कर लिया था कि रुबिया को कहां छिपाया गया है। कौशिक ने सईद को बताया था कि रुबिया को कुछ ही देर में सुरक्षित रिहा करा लिया जाएगा मगर गृहमंत्री ने उनकी बात अनसुनी कर दी। इसके उलट उन्होंने कौशिक से कहा कि वो तुरंत मीटिंग से बाहर निकलें और एनएसजी को पीछे हटाएं।

बहरहाल, सच्चाई जो भी हो। किसी देश के गृहमंत्री की बेटी का अपहरण और सरकार का अपहरणकर्ताओं की बात मान लेना बहुत डरावनी बात थी। उस दौरान मीडिया आज जैसा नहीं था, लेकिन तब भी बेहद सरगर्मी से इस घटना के एकएक पहलू पर जमकर चर्चा होती थी।

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