जब पत्रकारों के लिए सुरक्षा कवच बने ‘जय श्रीराम’

उस छत पर कोई ऐसा पत्रकार नहीं था, जिसका सिर न टूटा हो.

कारसेवा के दौरान पुलिस की मानसिकता और भक्ति को जाने बिना बात अधूरी रहेगी. कंट्रोलरूम के बाहर पुलिस के एक राजपत्रित अधिकारी उत्तेजना के चरम क्षणों को जी रहे थे. वे आंखें बंद कर रामनाम जप रहे थे. बीच-बीच में उनकी आंखें खुलतीं तो ढांचे को देख उनके मुंह से निकलता- ‘अभी तो बहुत बाकी है.’ वे फिर आंखें बंद कर रामनाम का जाप शुरू कर देते. वे ढांचा गिरने का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे. फर्क सिर्फ इतना था कि ‘जय श्रीराम’ के नारे कारसवेक जोर से लगा रहे थे और सुरक्षा में लगे लोग मन-ही-मन जाप कर रहे थे. वातावरण राममय ही था.

इस बीच मानस भवन की छत पर पत्रकारों की पिटाई तेज हो गई थी. कारसेवक वहां से फोटोग्राफरों के कैमरे उछाल-उछालकर नीचे फेंक रहे थे. उस छत पर कोई ऐसा पत्रकार नहीं था, जिसका सिर न टूटा हो. ज्यादा खतरा गोरी चमड़ी वालों के लिए था. कारसेवक बी.बी.सी. फोटोग्राफर और उसकी टीम को ढूंढ़ रहे थे. तीस से ज्यादा कैमरे तोड़े जा चुके थे. अमेरिकी टी.वी. का एक कैमरामैन लहूलुहान हालत में पुलिस कंट्रोलरूम की ओर दौड़ा. कारसेवक उसका पीछा कर रहे थे.

Jai Shriram, जब पत्रकारों के लिए सुरक्षा कवच बने ‘जय श्रीराम’
कारसेवक बी.बी.सी. फोटोग्राफर और उसकी टीम को ढूंढ़ रहे थे.

अचानक चार-पांच पत्थर आकर हमारी छत पर भी पड़े. हम नीचे बैठ गए, पुलिस के अफसर इस छत से जा चुके थे. ऊपर देखा तो कुछ महिलाएं बड़े-बड़े पत्थर उठाए खड़ी थीं. वे चीख रही थीं, फौरन छत से भागिए वरना पत्थर गिरा दूंगी. इनमें से एक महिला साधुओं वाला चिमटा बजा कारसेवकों में लगातार दम भर रही थी. हम छत से नीचे उतरना चाह रहे थे, तभी देखा तो नीचे पुलिस भागती आई. उन्हें कारसेवकों ने दौड़ाया था. अजीब दशा. नीचे पिटाई करते कारसेवक, ऊपर पत्थर लिये कारसेविकाएं. मैं सीढ़ी पर खड़ा हो रामलला को याद करने लगा.

नीचे लुटे-पिटे पत्रकार मानस भवन की तरफ भागे. सभी पत्रकारों को वहां लोहे की ग्रिल वाले एक फाटक के अंदर बंद कर दिया गया, ताकि वे कारसेवकों की पहुंच से दूर रहें. दरअसल कारसेवक यह चाहते थे कि जब तक उनकी निर्णायक कारसेवा पूरी न हो जाए, तब तक बाकी दुनिया के लिए खबरों और फोटो को रोके रखा जाए. मैं अब नीचे खड़ा था. ‘सहारा’ अखबार के फोटोग्राफर राजेंद्र कुमार लहूलुहान हालत में वहां आए. कारसेवकों ने उनका कैमरा छीन लिया. उनके जबड़े तोड़ दिए. बी.बी.सी. की जिलियन राइट के साथ भी अभद्र व्यवहार हुआ.

Jai Shriram, जब पत्रकारों के लिए सुरक्षा कवच बने ‘जय श्रीराम’
उस छत पर कोई ऐसा पत्रकार नहीं था, जिसका सिर न टूटा हो.

घायल साथियों को अस्पताल पहुंचाने के लिए हम गाड़ियों की तरफ आए. गाड़ियों के शीशे टूटे थे. टायरों की हवा निकाल दी गई थी. हमने गाड़ी पर लगा प्रेस पास फाड़ ‘जय श्रीराम’ का स्टीकर लगाया और घायल साथियों को फैजाबाद रवाना किया. कारसेवकों के लिए ‘जय श्रीराम’ शक्ति का स्रोत थे, वही पत्रकारों के लिए सुरक्षा कवच बने. अब तक ढांचे की बाहरी दीवार गिराई जा चुकी थी.

बाबरी मस्जिद की टूटी ईंटों को प्रसाद के रूप में बांटा गया