अभी इन देशों में है चीफ ऑफ डिफेंस स्‍टाफ, जानिए भारत में क्‍यों हुई देरी? आगे क्‍या होगा

युद्ध के समय, एक फैसला पूरी जंग का रुख बदल सकता है और यह फैसला चीफ ऑफ डिफेंस स्‍टाफ के जरिए होना चाहिए, न कि किसी कमेटी के. पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्‍टन चर्चिल ने भी कहा था, "कमेटियां युद्ध नहीं लड़ सकतीं."

आखिरकार भारत को पहला चीफ ऑफ डिफेंस स्‍टाफ मिलने जा रहा है. स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका ऐलान किया. भारत में अभी चीफ ऑफ स्‍टाफ कमेटी (CoSC) के चेयरमैन का पद है, मगर उसके पास शक्तियां नहीं हैं. अभी CoSC के प्रमुख का पद रोटेशनल होता है.

तीनों सेनाओं के प्रमुखों में सबसे सीनियर अधिकारी CoSC का चीफ होता है. उसके रिटायर होते ही यह ऑफिस भी खत्‍म हो जाता है. वर्तमान CoSC एयर चीफ मार्शल बिरेंदर सिंह धनोआ हैं. जब वह सितंबर 2019 में रिटायर होंगे तो सिर्फ चार महीने इस पद पर रहकर जाएंगे.

क्‍यों महसूस हुई चीफ ऑफ डिफेंस स्‍टाफ की जरूरत?

भारत इकलौता ऐसा देश है जहां रक्षा मंत्रालय में मिल‍िट्री प्रोफेशनल्‍स नहीं हैं. ऐसे ब्‍यूरोक्रेट्स जिनका कोई मिलिट्री बैकग्राउंड नहीं है, वे सारा काम चला रहे हैं. युद्ध के समय भारत की तीनों सेनाओं के बीच तालमेल का अभाव दिखा. 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना को कोई काम ही नहीं दिया गया, जबकि वह तिब्‍बतन प्‍लेटू पर तबाही मचा सकती थी.

1965 में पाकिस्‍तान के भीतर अंतरराष्‍ट्रीय बॉर्डर पर तीन तरफ से हमला करने के बारे में नौसेना को बताया तक नहीं गया था. 1971 की जंग में ऐसी गलती नहीं हुई. तीनों सेनाओं के बीच बेहतरीन तालमेल से भारत को जीत मिली.

करगिल के बाद उठी CDS की मांग

भारत में चीफ ऑफ डिफेंस स्‍टाफ बनाने की मांग लंबे समय से चल रही है. इस बारे में शुरुआत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान शुरू हुई. 1999 में करगिल युद्ध के बाद इसकी जरूरत समझी गई कि देश को तीनों सेनाध्यक्षों (आर्मी, नेवी और एयरफोर्स) के अलावा एक और फोर स्टार ऑफिसर की जरूरत है, जो सेना का यूनिफिकेशन करे. चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के पद का निर्माण करना के सुब्रह्मण्यम के नेतृत्‍व वाली करगिल समीक्षा समिति की एक प्रमुख सिफारिश रही है.

इस प्रस्‍ताव पर तीनों सेनाओं में सहमति नहीं बनी. तब विपक्ष में रही कांग्रेस CDS के हाथों में इतनी सैन्‍य ताकत देने के विरोध में थी. इसके बाद पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में नरेश चंद्र की अध्यक्षता में समिति का गठन हुआ और अंत में मोदी सरकार ने सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल डी.बी. शेकटकर की अध्यक्षता में 11 सदस्यीय समिति का गठन किया था.

पिछली सरकारें एक चौथा ‘पावर सेंटर’ नहीं बना सकीं, यहां तक कि प्रधानमंत्री मोदी भी अपने छह साल के शुरुआती कार्यकाल में इसकी घोषणा नहीं कर सके. इसकी मुख्य वजह यह है कि इस कदम को उठाने में कई कॉम्पलि‍केशंस शामिल हैं. यह आर्म्‍ड फोर्सेज का स्‍ट्रक्‍चर बदल सकती हैं.

अभी किन देशों में है चीफ ऑफ डिफेंस स्‍टाफ?

अधिकतर लोकतांत्रिक देशों में चीफ ऑफ डिफेंस स्‍टाफ की भूमिका संकट के समय क्रिटिकल हो जाती है. एडवांस्‍ड मिलिट्री वाले अधिकांश देशों में यह पद है, हालांकि उनकी ताकतें अलग-अलग हैं.

अमेरिका में ज्‍वॉइंट चीफ ऑफ स्‍टाफ कमेटी (CJCSC) होता है जो कि बेहद ताकतवर पद है. वह मिलिट्री को लेकर राष्‍ट्रपति का सलाह देता है. हालांकि CJCSC को कोई ऑपरेशनल अथॉरिटी है, उन्‍हें एक्शन के लिए राष्‍ट्रपति से अंतिम अनुमति लेनी होती है.

UK में एक परमानेंट सेक्रेट्री होता है जो रक्षा सचिव के समकक्ष है. साथ ही चीफ ऑफ डिफेंस स्‍टाफ का भी पद है. UK की सरकारी गाइडलाइंस के मुताबिक, CDS बतौर मिलिट्री स्‍ट्रैटेजिक कमांडर ब्रिटिश आर्म्‍ड फोर्सेज का प्रोफेशनल हेड होता है. वह प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री का सबसे वरिष्‍ठ मिलिट्री एडवाइजर भी होता है.

रूस में चीफ ऑफ द जनरल स्‍टाफ ऑफ द आर्म्‍ड फोर्सेज ऑफ रशिया का प्रावधान है. NATO देशों में चीफ हेड ऑफ डिफेंस (CHOD) होता है. अमेरिका, युनाइटेड किंग्‍डम, कनाडा जैसे देशों से इतर कई छोटे देशों में भी त्‍वरित फैसलों के लिए CDS होता है.

भारतीय सेना और रक्षा मंत्रालय का मॉडल युनाइटेड किंग्‍डम से प्रभावित है. भारत के पड़ोसी देशों की बात करें तो श्रीलंका में भी CDS है. यहां तक कि पाकिस्‍तान में भी ज्‍वॉइंट चीफ्स ऑफ स्‍टाफ कमेटी का पद है जो CDS के समकक्ष है.

न्‍यूक्लियर वेपनरी के लिए भी अहम है CDS

भारत की न्‍यूक्लियर डॉक्ट्रिन और पॉलिसी को नेशनल सिक्‍योरिटी काउंसिल और कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्‍योरिटी गवर्न करते हैं. वे जो फैसला करते हैं, उसे अंजाम देने की जिम्‍मेदारी तीनों सेनाओं पर होती है और उनका साथ काम करना जरूरी है. भारत ने न्‍यूक्लियर वेपंस की प्‍लॉनिंग, कोऑर्डिनेशन और कंट्रोल के लिए स्‍ट्रेटेजिक फोर्सेज कमांड (SFC) बनाई है. इसे सीधे CDS के दायरे में लाने की मांग हो रही है.

युद्ध के समय, एक फैसला पूरी जंग का रुख बदल सकता है. और यह फैसला किसी खास डिफेंस चीफ के जरिए होना चाहिए, न कि किसी कमेटी के. जैसा कि पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्‍टन चर्चिल ने भी कहा था, “कमेटियां युद्ध नहीं लड़ सकतीं.”

इतिहास से कई बार मिला सबक

दूसरे वर्ल्‍ड वॉर के दौरान खराब मौसम के बावजूद तत्‍कालीन अमेरिकी राष्‍ट्रपति डी. आइजनहॉवर ने नॉरमैंडी लैंडिंग्‍स लॉन्‍च करने का फैसला लिया था. इसे इतिहास में समुद्र के जरिए सबसे बड़ा आक्रमण माना जाता है. इस एक फैसले ने विश्‍व युद्ध की दिशा ही बदल दी थी.

ऐसा ही एक फैसला लिया था अमेरिकी जनरल डगलस मैकऑर्थर ने. करीब-करीब पूरा स्‍टाफ नॉर्थ कोरिया की खतरनाक टेरेन में हमला करने के खिलाफ था, मगर मैकऑर्थर के फैसले ने बैटल ऑफ इनचोन को यादगार बना दिया. हमले के महीने भर के भीतर ही नॉर्थ कोरिया ढह गया और अमेरिका ने 1,35,000 कोरियाई सैनिकों को बंदी बना लिया.

क्‍या करेंगे चीफ ऑफ डिफेंस स्‍टाफ?

अभी तक रक्षा मंत्रालय ने चीफ ऑफ डिफेंस स्‍टाफ का मॉडल सामने नहीं रखा है, मगर दूसरे देशों की तरह यहां भी CDS को उसी तरह की भूमिका दी जा सकती है. चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ सशस्त्र बलों की संयुक्त खरीद, प्रशिक्षण, रसद और वित्तीय प्रबंधन जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने वाले कार्यो को देखेगा, जबकि तीन सेना प्रमुखों के पास एक ऑपरेशंस कमान रहेगी.

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