डॉ. अंबेडकर की राह पर मायावती; पढ़िए, बाबा साहब ने क्यों अपनाया था बौद्ध धर्म?

अंबेडकर ने हिंदू धर्म छोड़ने की घोषणा 1936 में की थी लेकिन धर्म परिवर्तन 1956 में किया. इस बीच उन्होंने सभी धर्मों का अध्ययन किया और फिर अपने हिसाब से श्रेष्ठ धर्म का चयन किया.

भारतीय संविधान के निर्माता भीम राव अंबेडकर ने 14 अक्टूबर 1956 को अपने 3,85,000 अनुयाइयों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार किया था. बसपा (बहुजन समाज पार्टी) प्रमुख मायावती ने सोमवार को इस बात की घोषणा की है वह भी बौद्ध धर्म अपना लेंगीं.

दरअसल मायावती महाराष्ट्र चुनाव के लिए नागपुर में एक जनसभा को संबोधित करने पहुंची थी. वहीं पर उन्होंने कहा कि वह बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की तरह बौद्ध धर्म अपना लेंगीं. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इसका फ़ैसला सही समय पर किया जाएगा.

सवाल यह उठता है कि भीम राव अंबेडकर ने हिंदू धर्म छोड़ने के बाद बौद्ध धर्म को ही क्यों चुना?

बौद्ध धर्म ही क्यों? डॉ. अंबेडकर ने लिखे कई लेख

डॉ. अंबेडकर के लेख ‘बुद्ध और उनके धर्म का भविष्य’में उन्होंने बताया है कि क्यों बौद्ध धर्म उनकी नजरों में श्रेष्ठ है और संपूर्ण मनुष्य जाति के लिए कल्याणकारी है. हालांकि यह लेख मूल रूप से अंग्रेज़ी में हैं.

बुद्धा एंड दि फ्यूचर ऑफ हिज रिलिजन (Buddha and the Future of his Religion) नाम से एक लेख साल 1950 में कलकत्ता की महाबोधि सोसाइटी की मासिक पत्रिका में प्रकाशित हुआ था. इस धर्म में उन्होंने हिंदू धर्म, ईसाई धर्म और इस्लाम की तुलना बौद्ध धर्म से की है.

लेख में अंबेडकर ने बताया है कि उन्हें बौद्ध धर्म ही क्यों पसंद है? दरअसल किसी भी धर्म की बात कीजिए, फिर चाहे वो हिंदू धर्म हो या इस्लाम, या फिर ईसाई धर्म, सभी धर्मों में संस्थापक या तो भगवान के बेटे हैं या संदेशवाहक. वहीं हिंदू धर्म में तो कई अवतार और उनके चमत्कारों का ज़िक्र किया गया है. वहीं बौद्ध धर्म में किसी ने ख़ुद को अवतार या चमत्कार करने वाला नहीं बताया है.

अन्य धर्मों से बौद्ध की तुलना

डॉ. अंबेडकर गौतम बुद्ध की तुलना पैगंबर साहब, ईसा मसीह और हिंदू देवी-देवताओं से करते हुए लिखते हैं, ‘बुद्ध ने मनुष्य के बेटे के तौर पर जन्म लिया और जीवनपर्यन्त साधारण व्यक्ति के रूप में अपने धर्म का प्रचार करते रहे. उन्होंने कभी भी अपने पास किसी तरह की अलौकिक शक्ति होने का दावा नहीं किया और न ही उसकी सिद्धी के लिए कोई चमत्कार दिखाए. बुद्ध ने मार्ग-दाता और मुक्ति-दाता में स्पष्ट भेद किया.’

डॉ. अंबेडकर के मुताबिक, ‘ईसा, पैगंबर मुहम्मद और कृष्ण ने स्वयं के मोक्ष-दाता होने का दावा किया, जबकि बुद्ध केवल मार्ग-दाता होने पर ही संतुष्ट थे.’

डॉ. अंबेडकर को ईश्वर या ईश्वर के बेटे, पैगम्बर या खुद ईश्वर के अवतार वाले किसी धर्म को अपनाने में रुची नहीं थे. वो गौतम बुद्ध को मानना चाहते थे क्योंकि वह मानव थे और इसमें ईश्वर के लिए कोई जगह नहीं है.

डॉ. अंबेडकर ईश्वरीय वाणी के संदर्भ में कहते हैं, ‘इन चारों धर्म प्रवर्तकों के बीच एक और भेद भी है. ईसा और मुहम्मद दोनों ने दावा किया कि उनकी शिक्षा ईश्वर या अल्लाह की वाणी है और ईश्वर वाणी होने के कारण इसमें कोई त्रुटि नहीं हो सकती और यह संदेह से परे है. कृष्ण अपनी स्वयं की ही धारण की हुई उपाधि के अनुसार विराट रूप परमेश्वर थे और उनकी शिक्षा चूंकि परमेश्वर के मुंह से निकली हुई ईश्वर वाणी थी, इसलिए इसमें किसी प्रकार की कोई गलती होने का प्रश्न ही नहीं उठता.’

बौद्ध धर्म में कुछ भी अंतिम सत्य नहीं

डॉ. अंबेडकर इन तीनों की तुलना बुद्ध से करते हुए लिखते हैं, ‘बुद्ध ने अपनी शिक्षा में इस तरह के अंतिम सत्य होने का दावा नहीं किया. ‘महापरिनिर्वाण-सूत्र’ में उन्होंने आनन्द को बताया कि उनका धर्म तर्क और अनुभव पर आधारित है.’

बुद्ध ने यह भी कहा है कि उनके अनुयायियों को उनके द्वारा दी गई शिक्षा या उपदेश को ही अंतिम नहीं मान सेना चाहिए. यदि किसी विशेष समय या विशेष स्थिति में इस शिक्षा में से कोई बात सटीक न मालूम हो तो अनुयायी उसमें बदलाव ला सकते हैं.

अंबेडकर लिखते हैं कि ‘बुद्ध चाहते थे कि उनके धर्म पर भूतकाल का मुर्दा बोझ न लादे जायें. उनका धर्म सदाबहार रहे और सभी वक्त के लिए उपयोगी भी हो.’

वो लिखते हैं कि ‘किसी भी अन्य धर्म-उपदेशक ने ऐसा करने का साहस नहीं दिखाया.’

विज्ञान और तर्क की कसौटी पर परखा गया धर्म

‘बुद्ध एंड फ्यूचर ऑफ हिज रिलिजन’ शीर्षक के इसी लेख में डॉ. अंबेडकर धर्म को विज्ञान और तर्क की कसौटी पर तौलने की सलाह देते हैं. वे लिखते हैं, ‘धर्म को यदि वास्तव में कार्य करना है तो उसे बुद्धि या तर्क पर आधारित होना चाहिए, जिसका दूसरा नाम विज्ञान है. किसी धर्म के लिए इतना पर्याप्त नहीं है कि उसमें नैतिकता हो. उस नैतिकता को जीवन के मूलभूत सिद्धान्तों- स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व को मानना चाहिए.’

डॉ. अंबेडकर बुद्ध की अन्य विशेषताओं को रेखांकित करते हुए लिखते हैं,‘यह तमाम बातें शायद बहुत आश्चर्यजनक प्रतीत हों. यह इसलिए कि जिन लोगों ने बुद्ध के सम्बन्ध में लिखा है, उनमें से एक बड़ी संख्या ने यह सिद्ध करने पर जोर लगाया कि बुद्ध ने केवल एक ही बात की शिक्षा दी और वह है अहिंसा.’

धार्मिक और लैंगिक समानता को सर्वोपरि माना

वे आगे लिखते हैं कि ‘यह सच है कि बुद्ध ने अहिंसा की शिक्षा दी. मैं इसके महत्व को कम नहीं करना चाहता, क्योंकि यह एक ऐसा महान सिद्धान्त है कि यदि संसार इस पर आचरण नहीं करता तो उसे बचाया नहीं जा सकेगा. मैं जिस बात पर बल देना चाहता हूं, वह यह है कि बुद्ध ने अहिंसा के साथ ही समानता की शिक्षा दी. न केवल पुरुष और पुरुष के बीच समानता, बल्कि पुरुष और स्त्री के बीच समानता की भी.’

समानता को अंबेडकर किसी धर्म का सबसे मूलभूत सिद्धांत मानते थे. वे लिखते हैं कि ‘हिन्दू धर्म का असली सिद्धान्त असमानता है. चातुर्वण्य का सिद्धान्त इस असमानता के सिद्धान्त का ठोस और जीता-जागता साकार रूप है.’

अंबेडकर ने हिंदू धर्म छोड़ने की घोषणा 1936 में की थी लेकिन धर्म परिवर्तन 1956 में किया. इस बीच उन्होंने सभी धर्मों का अध्ययन किया और फिर अपने हिसाब से श्रेष्ठ धर्म का चयन किया.

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