केंद्र ने दिल्ली हाईकोर्ट में कहा, समलैंगिक विवाह को हमारा कानून, समाज और मूल्य मान्यता नहीं देते

एलजीबीटी (LGBT) समुदाय के चार सदस्यों ने मिलकर 8 सितंबर को एक जनहित याचिका दायर की थी. याचिका में कहा गया है कि हिंदू मैरिज एक्ट ये नहीं कहता कि शादी सिर्फ महिला-पुरुष के बीच ही सकती है समलैंगिक नहीं.

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दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) में समलैंगिक विवाह को हिंदू मैरिज एक्ट के तहत मान्यता देने के लिए लगाई गई जनहित याचिका (PIL) पर आज सुनवाई हुई. केंद्र सरकार ने यहां दिल्ली हाईकोर्ट को बताया कि समलैंगिक विवाह को हमारी कानूनी प्रणाली, समाज और मूल्य मान्यता नहीं देते हैं. समलैंगिक विवाह को हिंदू मैरिज एक्ट के तहत मान्यता देने की PIL पर चीफ जस्टिस डीएन पटेल और जस्टिस प्रतीक जालान की बेंच सुनवाई कर रही थी. जिसके सामने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा ”हमारी कानूनी व्यवस्था, हमारा समाज और हमारे मूल्य समलैंगिक विवाह को मान्यता नहीं देते हैं.”  उन्होंने कहा, “जब तक अदालत विभिन्न कानूनों पर बदलाव नहीं करती, तब तक ऐसा नहीं किया जा सकता है.”

एलजीबीटी (LGBT) समुदाय के चार सदस्यों ने मिलकर 8 सितंबर को एक जनहित याचिका दायर की थी. याचिका में कहा गया है कि हिंदू मैरिज एक्ट ये नहीं कहता कि शादी महिला-पुरुष के बीच ही हो. साल 2018 से भारत में समलैंगिकता अपराध नहीं है. लेकिन फिर भी समलैंगिक शादी अपराध क्यों है. याचिका में कहा गया है कि जब एलजीबीटी (LGBT) समुदाय को सुप्रीम कोर्ट ने मान्यता दी है, तो फिर शादी को मान्यता न देना संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन होगा.

कोर्ट ने मांगी प्रभावितों की लिस्ट

कोर्ट ने यह माना कि दुनिया काफी बदल रही है. लेकिन जरूरी नहीं कि भारत में उन बदलावों को मान्यता मिले या उनका विरोध हो. कोर्ट ने पूछा कि आखिर जो लोग प्रभावित हैं वह आगे क्यों नहीं आ रहे हैं. जिस पर याचिकाकर्ताओं के वकील अभिजीत अय्यर मित्रा ने कहा कि लोगों को डर है कि अगर वह इस मुद्दे को लेकर आगे आए तो उनके साथ हिंसा हो सकती है. जिसके बाद कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा कि वह उन लोगों की लिस्ट उपलब्ध कराएं जिनकी शादी हिंदू मैरिज एक्ट के तहत रजिस्टर्ड नहीं हो सकी है. इस मामले में अगली सुनवाई 21 अक्टूबर को होगी.

सुप्रीम कोर्ट ने दिया था ये फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने 6 सितंबर, 2018 को समलैंगिकता को अवैध बताने वाली भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को रद्द कर दिया था. जिसमें कहा गया था कि सहमति से दो वयस्कों के बीच समलैंकिग संबंध होना अपराध नहीं माना जाएगा. हालांकि, उस फैसले में समलैंगिक शादी का जिक्र नही था. इस वजह से वर्तमान में समलैंगिक विवाह तो हो रहे हैं लेकिन उनका पंजीयन नहीं हो पा रहा है.

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