पैरों तले खिसकी ज़मीन को वापस लाने की तैयारी में महबूबा, पढ़ें क्यों अमरनाथ यात्रा पर खोला मुंह?

जम्मू-कश्मीर में चुनाव का इंतज़ार है. महबूबा मुफ्ती ने अपने बयानों से माहौल बनाना शुरू कर दिया है वही संघ परिवार भी फील्डिंग में जुटा है. ताज़ा मामला अमरनाथ यात्रियों की सुरक्षा पर खड़े किए गए सवाल से जुड़ा है.

जम्मू-कश्मीर से जुड़ा एक विवाद शांत नहीं होता कि नेता दूसरा बवाल छेड़ देते हैं. विधानसभा चुनाव का इंतज़ार कर रहे जम्मू-कश्मीर की पूर्व सीएम महबूबा मुफ्ती ने अब ऐसा ही एक बयान दिया है जिस पर विरोधियों की भौंहें तन गई हैं. माना जा रहा है कि ये बयान चुनाव से पहले उनकी तैयारी से जुड़ा है.

चुनाव से पहले महबूबा क्यों दे रही हैं विवादित बयान
महबूबा ने कहा है कि अमरनाथ यात्रियों के लिए की गई सुरक्षा व्यवस्था कश्मीरियों के लिए परेशानी बन जाती है. उन्होंने कहा कि- अमरनाथ यात्रा के लिए पिछले कई सालों से यहां की ज़मीन इस्तेमाल की जा रही, लेकिन दुर्भाग्य है कि इस बार व्यवस्थाएं स्थानी लोगों के खिलाफ हैं. महबूबा ने राज्यपाल सत्यपाल मलिक से अनुरोध भी किया कि वो श्रद्धालुओं की सुरक्षा व्यवस्था से सामने आ रही दिक्कतों को संज्ञान में लेकर लोगों को राहत दें. भले ही महबूबा ने ये भी कहा हो कि हम अमरनाथ यात्रा के खिलाफ नहीं लेकिन ऐसे बयान के बाद अगर वो उम्मीद कर रही हैं कि सब शांत रहेगा तो इसे अव्यवहारिक ही कहा जा सकता है.

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जिस सुर में महबूबा ने अमरनाथ यात्रा को लेकर आपत्ति जताई है उसी में उन्होंने केंद्र को नसीहत दी कि वो अलगाववादियों से बातचीत करे. उन्होंने कहा कि- हुर्रियत नेताओं ने कहा कि संगठन बातचीत के लिए तैयार है. ऐसे में सरकार को इस मौके का फायदा उठाना चाहिए और बातचीत शुरू करनी चाहिए.

सभी को मालूम है कि हाल तक बीजेपी-पीडीपी मिलकर राज्य में शासन कर रहे थे. जब से गठबंधन टूटा है तब से दोनों के बीच कड़वाहट लगातार बढ़ी है और खुद महबूबा को भी मालूम है कि उनकी किसी नसीहत पर बीजेपी कितना ध्यान देगी. दूसरी तरफ उन्होंने अमरनाथ यात्रा पर जैसा बयान दिया है वो सिर्फ ऐसी फुलटॉस है जिस पर बीजेपी के पास जमकर शॉट मारने का मौका है.

सूबे में चुनाव से पहले ऐसे बयानों की बहार दिखा रही है कि माहौल खूब जमकर बनाया जा रहा है. महबूबा को इल्म है कि उनका कोर वोटर एक नाराज़गी से भरा है. उसकी नाराज़गी लोकसभा चुनाव में भी साफ दिखी. पीडीपी के हाथ एक भी सीट नहीं लगी. बीजेपी से गलबहियां करके पीडीपी ने जितने दिन सत्तासुख भोगा उतने ही दिन पीडीपी के धुर समर्थक पसोपश में फंसे रहे. देखा जाए तो दोनों ही दलों की कश्मीर नीति एक-दूसरे के उलट थी पर कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस को श्रीनगर से दूर रखने की कवायद में ये बेमेल जोड़ा बन गया. बेमेल होने की वजह से इसका बहुत दिन टिकना मुश्किल था. अब जब ये टूट गया तो महबूबा मुफ्ती के सामने चुनौती है कि वो अपने पिता की अनुपस्थिति में पार्टी के वफादारों को समेटें, वोटर्स को मनाएं, कट्टर समर्थकों को सफाई दें या फिर उन पर भरोसा करने की वजहें दें.

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जम्मू-कश्मीर में मोर्चा लेने को तैयार संघ परिवार
वहीं चुनाव की तैयारियों में संघ परिवार भी पीछे नहीं है. उसने भी परंपरागत हिंदू लाइन पर चलना शुरू कर दिया है. बरसों से उजाड़ पड़े मंदिरों के जीर्णोद्धार की मांग उठ रही है. शाखाओं का विस्तार हो रहा है. राज्य में विधानसभा क्षेत्रों के नए परिसीमन का भी समर्थन ज़ोरशोर से चल रहा है ताकि कश्मीर से ज़्यादा सीटें जम्मू को मिल जाएं जहां बीजेपी का समर्थक बड़ी तादाद में है.

आरएसएस प्रचारक ना सिर्फ घाटी बल्कि जम्मू में भी वीरान पड़े मंदिरों का जीर्णोद्धार करने की कोशिश में जुटे हैं. राज्य में ऐतिहासिक मंदिरों का जीर्णोद्धार करने पर आरएसएस ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट, 2019 में लिखा है- पुरमंडल जम्मू से 40 किलोमीटर दूर देविका नदी के किनारे स्थित एक पवित्र स्थल है. कभी संस्कृत भाषा का अध्ययन केंद्र रहे इस स्थान की काफी समय से उपेक्षा होती रही है. इसका पुनरुद्धार करने के लिए एक ट्रस्ट का गठन किया गया है. सीमावर्ती क्षेत्रों और श्रीनगर से दूर रहने वाले अल्पसंख्यकों को मुख्यधारा में लाने के लिए आरएसएस नेताओं ने एक व्यापक योजना ‘एकल विद्यालय’ (एक शिक्षक, एक कक्षा) शुरू की है. इस परियोजना में 6 हज़ार शिक्षक हैं. संघ की योजना इस परियोजना के अंतर्गत लद्दाख और कारगिल जैसे इलाकों में प्रभाव जमाने की है.

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केवल हिंदू ही आरएसएस के राडार पर हों ऐसा नहीं, सीमावर्ती इलाके के मुस्लिम गांवों में भी विस्तार का खाका खींचा जा चुका है. आरएसएस की रिपोर्ट कहती है कि- सीमावर्ती क्षेत्र सीमापार गोलीबारी से बुरी तरह प्रभावित हैं. इस कारण लोगों को प्रवास, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं में बाधा तथा दैनिक जीवन में असुरक्षा का सामना करना पड़ता है. इन मुद्दों से निपटने के प्रयास शुरू कर दिए गए हैं. शुरुआती तौर पर कुल 701 गांवों में से 457 गांवों का सर्वे किया गया है. समान उद्देश्यों वाले विभिन्न संगठनों की मदद से एक कार्यकारिणी समिति गठित कर दी गई है.

मुफ्ती और संघ की रणनीति के सामने अब्दुल्ला बेबस
स्वाभाविक है कि महबूबा और संघ परिवार धीरे-धीरे अपने कट्टर समर्थकों और परंपरागत वोटर्स के बीच जीत का फॉर्मूला खोज रहे हैं, तो ऐसे में अब्दुल्ला परिवार को बेचैन होना ही है. देश की आज़ादी के बाद से अब्दुल्ला परिवार जम्मू-कश्मीर के शासन में अहम भूमिका निभाता रहा है. 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में राज्य की 6 में से 3 सीटें बीजेपी ने जीत लीं जबकि पिछले चुनाव में उसका खाता तक नहीं खुला था. पीडीपी को एक सीट मिली जबकि नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 3 में से 2 सीटें खो दीं.

केंद्र में बीजेपी ताकतवर बनकर आई थी और कांग्रेस करारी शिकस्त पाकर बाहर हो गई थी, लिहाज़ा सूबे के समीकरण भी बदल गए. उसी साल के अंत में विधानसभा चुनाव हुए जिसमें बदले समीकरण खुलकर सामने आ गए. उत्साह से लबरेज़ बीजेपी ने 87 में से 25 सीटों पर जीत हासिल की जो पिछले चुनाव में महज़ 11 थी. पीडीपी की सीटें भी 21 से बढ़कर 28 हो गईं. सत्तासीन नेशनल कॉन्फ्रेंस 28 से 15 सीटों पर आ गई और अब्दुल्ला से अलग होकर अकेले लड़नेवाली कांग्रेस 17 में से 12 सीटों पर पहुंच गई. ऐसे में मुफ्ती मोहम्मद सईद को एक मौका दिखा और उन्होंने सभी को हैरान करते हुए बीजेपी से हाथ मिलाकर सीएम पद संभाल लिया.

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हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने राज्य की लोकसभा सीट में 3 सीटें बरकरार रखीं जबकि नेशनल कॉन्फ्रेंस ने सीटें बढ़ाकर 3 कर लीं. भले ही नेशनल कॉन्फ्रेंस का प्रदर्शन सुधरा हो लेकिन इस नतीजे में भी अब्दुल्ला परिवार के लिए खराब खबर छिपी थी. उनका मत प्रतिशत बीजेपी (46.39%) और कांग्रेस (28.47%) के मुकाबले 7.89% ही रहा.  अब जब राज्य के परिसीमन की चर्चा छिड़ी है तो अब्दुल्ला परिवार की परेशानी में इजाफा होता दिख रहा है. गौरतलब है कि फारूक अब्दुल्ला ने जम्मू एवं कश्मीर जन प्रतिनिधि कानून 1957 में संशोधन कर परिसीमन को 2026 तक के लिए रोक दिया था. दूसरी तरफ जम्मू में प्रभाव वाली बीजेपी हर हाल में परिसीमन चाहेगी ताकि उसके प्रभावक्षेत्र में अधिक सीटें आ जाएं.

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इस तरह देखा जाए तो नेशनल कॉन्फ्रेंस के पास 2026 से  पहले ये मौका है कि वो परिसीमन ना हो पाने का फायदा उठा ले लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि क्या केवल इतने भर से उसकी सत्ता में वापसी हो सकेगी? जब देश में लगातार ध्रुवीकरण का माहौल हो और जम्मू-कश्मीर में इसका लाभ लेने के लिए बीजेपी और पीडीपी मौजूद हों तो धर्मनिरपेक्षता का नारा बुलंद करती रही नेशनल कॉन्फ्रेंस को कौन वोट देगा? फारुक अब्दुल्ला उम्र के हाथों थक रहे हैं जबकि उमर अब्दुल्ला ट्विटर पर ही ज़्यादा सक्रिय दिखते हैं. निश्चित तौर पर ये चुनाव पिता की विरासत संभाल रहे उमर के लिए सबसे अधिक मुश्किल होनेवाला है.

(प्रस्तुत लेख में प्रकट किए गए विचार लेखक के निजी हैं)