जेल में मसूद से पूछताछ करने वाले सैन्य अधिकारी का खुलासा, ऐसे बच सकती थी CRPF जवानों की जान

नई दिल्‍ली। सुरक्षा विशेषज्ञ और आईबी-रॉ के अधिकारी रहे अवनीश मोहनानी ने जम्‍मू-कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ बटालियन पर हुए आत्मघाती हमले को लापरवाही का नतीजा बताया है. जम्‍मू-कश्‍मीर को करीब से देखने वाले आईपीएस अवनीश मोहनानी आईबी में 15 साल काम कर चुके हैं. वह जम्मू-कश्मीर, श्रीनगर में तैनात रहे इस्लामाबाद के उच्‍चायोग में […]

नई दिल्‍ली। सुरक्षा विशेषज्ञ और आईबी-रॉ के अधिकारी रहे अवनीश मोहनानी ने जम्‍मू-कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ बटालियन पर हुए आत्मघाती हमले को लापरवाही का नतीजा बताया है. जम्‍मू-कश्‍मीर को करीब से देखने वाले आईपीएस अवनीश मोहनानी आईबी में 15 साल काम कर चुके हैं. वह जम्मू-कश्मीर, श्रीनगर में तैनात रहे इस्लामाबाद के उच्‍चायोग में भी चार साल तैनात रहे और आईबी की कश्मीर डेस्क पर लंबे समय तक तैनात रहे. अवनीश मोहनानी 1994 में पुलवामा हमले के गुनहगार मसूद अजहर को भी इंटैरोगेट कर चुके हैं.

अवनीश मोहनानी बताते हैं कि उनके करियर में इस तरह का यह पहला हमला है। इससे पहले भी आत्मघाती हमले होते रहे हैं. कार में बम प्‍लांट करके भी हमले हुए हैं, लेकिन किसी कार में इतनी बड़ी मात्रा में आरडीएक्स एक्सप्लोसिव एकठ्ठा करना, बम असेंबल करना, फिर किसी कश्मीरी का आत्मघाती हमले में शामिल होना चौंकाता है, परेशान करता है. यह हमला बताता है कि हमारी इंटेलिजेंस इस हमले को लेकर फेल रही है, ये फेलियर सिर्फ आईबी का नहीं है बल्कि कश्मीर पुलिस, मिलिट्री इंटेलिजेंस, सीआरपीएफ इंटेलिजेस का भी है. जर्नल इंटेलिजेंस और स्पेसिफिक इंटेलिजेंस में फर्क होता है. एजेंसीज जर्नल इंटेलिजेंस जारी करती रहती हैं। उसे डेवलप करना सीआरपीफ और आर्मी का काम होता है, यहां जर्नल इंटेलिजेंस को हल्के में लिया गया, जिससे यह हमला हुआ। यह हमला इसलिए चिंता का विषय है, क्‍योंकि हमले में कश्मीरी युवक का शामिल होना भविष्य की चुनौतियों को लेकर आगाह करता है।

पहले कश्मीर में सुरक्षाबलों पर हमलों में पाकिस्तानी सीधे शामिल होते थे, लेकिन इस बार कश्मीर को आत्मघाती दस्ते में शामिल किया गया है. अब इंटेलिजेंस में बड़े बदलाव करने का वक्‍त आ गया है, क्योंकि पिछले कुछ सालों में कश्मीर के हालात दिन-ब-दिन खराब ही हो रहे हैं। इतनी बड़ी मात्रा में आरडीएक्स एक दिन में तो आया नहीं होगा। उसके बाद गाड़ी हायर करना, फिर आत्मघाती सदस्य को तैयार करना गाड़ी में बम प्‍लांट करवाना, उसके बाद गाड़ी को कई दिन तक छुपाए रखना फिर गांव से गाड़ी निकालकर सीधे हमला करना, इस पूरी साजिश में कई दर्जन लोग शामिल होंगे. इस पूरी प्रक्रिया के दौरान कोई खबर निकलकर इंटेलिजेंस एजेंसियों तक नहीं पहुंची, यह चूक है और कमजोरी भी. ये हमला मौजूदा सरकार को कमजोर दिखाने की कोशिश भी है, क्योंकि आने वाले दिनों में चुनाव होने हैं और पाकिस्तान माहौल खराब करके सरकार की छवि धूमिल करना चाहता है.

पुलवामा में आत्मघाती हमले का जो वीडियो जारी हुआ है, उससे भी यह बात पुष्ट होती है कि कैसे सांप्रदायिक उन्माद भड़काने वाली बात कही जा रही है, एक संप्रदाय को निशाने पर लेने की बात कही जा रही है, इसलिए मकसद को भांपना बेहद जरूरी है. इंटेलिजेंस को जर्नल अलर्ट के अलावा स्पेसिफिक अलर्ट पर फोकस करना चाहिए. ऐसे बड़े सुरक्षाबलों के काफ़िले में सबकुछ पहले से तय नहीं होता है, ऐसे काफ़िले के वक्‍त अचानक समय में परिवर्तन करना, रूट में परिवर्तन करना, संदिग्ध देखते ही एक्शन लेना और रास्ते की पैट्रोलिंग बहुत जरूरी है. इतने बड़े काफ़िले की सुरक्षा का स्तर पीएम की सुरक्षा की तरह या तर्ज पर ही होना चाहिए. ऐसे काफ़िला जब गुजरे तो सड़क पर यातायात रुकना चाहिए, जहां पर शहर और गांव की सड़कें आकर मिल रही हैं उन्हें पूरी तरह से बंद किया जाना चाहिए. हर रास्‍ते पर सुरक्षाबलों की तैनाती समेत कई और कदम उठाए जाने चाहिए थे, क्‍योंकि आपके सुरक्षाबल आपके पीएम जैसे ही महत्वपूर्ण हैं. सुरक्षाबलों को एयरलिफ्ट करके ले जाना एक विकल्प है.

आरडीएक्स ब्लास्ट में… देखिए ये या तो पाकिस्तान आर्मी के पास मिलेगा या फिर भारत की आर्मी के पास, ये कोई ऐसी चीज नहीं है, जो किसी से खरीदी जा सके. ये पुख्‍ता तौर पर पाकिस्तान की आर्मी और आईएसआई ने मुहैया कराया है, इसमें कोई शक नहीं है। हमें सोच बदलना होगी जिम्मेदारी तय करनी होगी और जिम्मेदारी नीचे से नहीं बल्कि समय आ गया है, जब ऊपर से जिम्मेदारी तय की जाए।

बताइए, इस देश में प्लेन हाईजैक हो गया, 26/11 हुआ, संसद पर हमला हुआ और अब सीआरपीएफ पर हमला हुआ, लेकिन किसी मामले में शीर्ष पर बैठे व्यक्ति को हटाया तक नहीं गया, यह बताता है कि हम गलत दिशा में हैं. शीर्ष पर बैठे अधिकारी को हटाएं तो खौफ पैदा होगा, जिम्मेदारी तय होगी, नीचे बैठे लोगों पर शीर्ष का दबाव बढ़ेगा फिर काम बेहतर होगा, एक दारोगा कमांडर का तबादला और निलंबन विकल्प नहीं है. पहले कई अधिकारियों ने बैरिकेडिंग पर लगातार रोका-टोकी की, संदिग्ध दिखने पर गोली चलाई, लेकिन वे अधिकारी जेल में है, ऐसी घटनाओं से सुरक्षाबलों का आत्मविश्वास टूटता है.

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि कश्मीरी लोगो में खोया हुआ विश्वास पाना बहुत जरूरी है, जिस पर काम नहीं हो रहा है, उन्हें बताना होगा हम या सुरक्षाबल उनके दुश्मन नहीं हैं, माहौल बदलना होगा. ऐसा नहीं कि कश्मीर का माहौल एक बार या एक दिन या कुछ सालों में बिगड़ा है, कश्मीर में 2006 में जब गुलाम नबी आजाद सीएम थे, तब से हालात बिगड़ना शुरू हुए और तब से आज तक खराब ही हो रहे हैं. कश्मीरियों के दिल में बैठी नफरत के लिए टेलिविजन भी जिम्‍मेदार है।

शाम को टेलिविजन वाररूम में तब्दील हो जाते है, जिसमें कश्मीरी को देशद्रोही बताया जाता है, यह गलत है, सरकार को ऐसी डिबेट रोकने की दिशा में भी प्रयास करना चाहिए. अब ऐसे वक्‍त में भावनाओं में बहकर, गुस्से या आक्रोश में आकर एक्शन लेने से बचना होगा ठंडे दिमाग से प्लान बनाकर जवाब देना चाहिए.

जहां तक 9/11 के बाद अमेरिका का ओसामा को मारने जैसे एक्शन का सवाल है तो ये थोड़ा मुश्किल है क्योंकि मसूद अजहर हो या हाफिज सईद दोनों बॉर्डर के पास नहीं रहते, एक लाहौर में है तो एक और किसी जगह, इन्हें पाकिस्‍तान में घुसकर मारना मुश्किल है. पाकिस्तान पर सीधे हमला करना संभव नहीं है, क्‍योंकि दोनों देश न्यूक्लियर पावर से लैस हैं, इसलिए पाकिस्‍तान को अंतरराष्ट्रीय दबाव समेत कई तरीकों से जवाब देना ठीक होगा. भारत की स्थिति पाकिस्तान जैसी नहीं है, हमारा देश उनसे अलग है, अगर हम सीधे हमला करेंगे एक कमजोर को मारने जैसा होगा, इसलिए सीमा में रहते हुए नीति के साथ जवाब देना होगा. कश्मीरी लोगों में खोया विश्वास वापस पाने के लिए कदम उठाने होंगे।