इन 5 गलतियों की वजह से चुनावों में डूबी कांग्रेस की लुटिया

पार्टी के पास मजबूत रणनीति बनाकर उसे जमीन पर उतारने का मौका था मगर वह ऐसा करने में कामयाब न हो सकी.

नई दिल्‍ली: लगातार दो आम चुनावों में कांग्रेस की करारी हार ने पार्टी नेतृत्‍व पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. 2014 में हार के बाद कई विधानसभा चुनावों में पार्टी की हार ने दबाव बनाना शुरू कर दिया था. इस बीच 2018 में तीन राज्‍यों के चुनाव में कांग्रेस की जीत से उसकी वापसी की उम्‍मीदें तो जगीं मगर 2019 आते-आते पार्टी फिर रसातल की ओर जाने लगी. आइए जानते हैं वो 5 बड़ी गलतियां, जिनकी वजह से कांग्रेस को चुनाव में मुंह की खानी पड़ी.

औसत चुनाव प्रचार

बीजेपी के धुआंधार प्रचार के मुकाबले कांग्रेस का प्रचार बेहद सतही साबित हुआ. ‘आएगा तो मोदी ही’ और ‘मोदी है तो मुमकिन है’ जैसे नारों की बदौलत बीजेपी ने लोगों की जुबान पर जगह बनाई, मगर कांग्रेस ‘चौकीदार चोर है’ के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की आस लगाए रही. नतीजे आने के बाद कांग्रेस के कई नेताओं ने माना कि चुनाव प्रचार की रणनीति बनाने में उनसे चूक हुई. कांग्रेस का पूरा चुनाव अभियान पीएम नरेंद्र मोदी पर केंद्रित रहा. कई कांग्रेस नेताओं ने चुनाव नतीजों के बाद कहा है कि ‘अत्‍यधिक नकरात्‍मक प्रचार’ करना पार्टी को भारी पड़ गया.

बयानवीरों ने गर्क किया बेड़ा

नरेंद्र मोदी सरकार ने प्रचार में बालाकोट एयर स्‍ट्राइक, 2016 सर्जिकल स्‍ट्राइक्‍स का खूब जिक्र किया. इसके मुकाबले में कांग्रेस के कई नेताओं ने जब इन कार्रवाइयों पर सवाल उठाए तो वोटर उनसे छिटकता गया. 1984 सिख विरोधी दंगों पर सैम पित्रोदा का ‘हुआ तो हुआ’ कहना भी कांग्रेस के लिए परेशानी लेकर आया. इसके बाद रही-सही कसर मणिशंकर अय्यर ने पीएम मोदी को ‘नीच’ कहने वाला बयान दोहराकर पूरी कर दी.

मुकम्‍मल रणनीति का अभाव

2014 के चुनाव में कांग्रेस ने अपने संसदीय इतिहास में सबसे कम सीटें (44) हासिल की थीं. तब दो बार के यूपीए कार्यकाल की एंटी इनकंबेंसी से पार्टी जूझ रही थी, मगर इस बार ऐसा कुछ नहीं था. पार्टी के पास मजबूत रणनीति बनाकर उसे जमीन पर उतारने का मौका था, मगर कई जगह तो नामांकन के दिन तक तय नहीं हो सका कि प्रचार कैसे करेंगे.

सोनिया का नेतृत्‍व छोड़ना

सोनिया गांधी 18 साल तक कांग्रेस अध्‍यक्ष रहीं. चुनाव परिणाम आने के बाद सवाल उठ रहे हैं कि उन्‍होंने अपने बेटे राहुल को ही 2017 में पार्टी की कमान क्‍यों सौंपी. प्रियंका गांधी की एंट्री को भी परिवारवाद के चश्‍मे से देखा गया. बीजेपी ने इसका फायदा उठाया और चुनाव प्रचार में लगातार आरोप लगाया कि कांग्रेस सिर्फ एक परिवार की पार्टी है.

सहयोगी दलों से खींचतान

कांग्रेस ने महाराष्‍ट्र, बिहार, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और झारखंड जैसे राज्‍यों में गठबंधन पर चुनाव लड़ा. मगर इन राज्‍श्यों में सीट बंटवारे को लेकर आखिरी वक्‍त तक खींचतान चलती रही. कर्नाटक और बिहार में घटक दल एक-दूसरे पर आरोप लगाते रहे.

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