क्यों कांग्रेस के लिए मरते दम तक अहम रहीं शीला दीक्षित?

शीला दीक्षित 81 साल की उम्र तक कांग्रेस के लिए काम करती रहीं. कोई तो बात होगी कि कांग्रेस के नेतृत्व को अपने संकट में हमेशा शीला याद आईं.

शीला दीक्षित के अचानक निधन ने दिल्ली को तो झकझोरा ही कांग्रेस के सामने भी संकट खड़ा कर दिया है. अपने प्रभावशाली ससुर की विरासत संभाल रहीं शीला दीक्षित ने बार-बार पार्टी को अपनी अहमियत का अहसास कराया था. कांग्रेस ने भी उन्हें हमेशा परेशानी में याद भी किया लेकिन अब पार्टी किसे याद करेगी?

शीला दीक्षित के महत्व का अंदाज़ा इस बात से लगाइए कि वो दिल्ली में हार गईं लेकिन यूपी विधानसभा चुनाव में उन्हें कांग्रेस ने अपना चेहरा बनाने में संकोच नहीं किया. बहुत कम होता होगा कि लगातार 15 साल तक किसी सूबे के सीएम रहे शख्स को किसी दूसरे सूबे में पार्टी सीएम प्रोजेक्ट करे. कांग्रेस ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वो जानती थी कि शीला दीक्षित शासन-प्रशासन की बारीक परतों को तो समझती ही हैं, साथ में वो भले ही दिल्ली की राजनीति करती रही हों पर बहू यूपी की ही हैं. वो कन्नौज भी यूपी में ही है जहां से उन्होंने 1984 में लोकसभा चुनाव जीतकर अपने राजनीतिक करियर की शुरूआत की थी. कोई शक नहीं कि वो ब्राह्मणों का वोट भी रिझा सकने में सक्षम रहीं.

sheila dikshit, क्यों कांग्रेस के लिए मरते दम तक अहम रहीं शीला दीक्षित?
2019 के चुनाव से ठीक पहले (10 जनवरी) कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने दिल्ली प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपी थी.

इसके अलावा दिल्ली में उनका पंजाबी पृष्ठभूमि से आना हमेशा कांग्रेस के लिए फायदेमंद रहा. यही तो वजह है कि जीवन के अंतिम दौर में एक बार फिर राहुल गांधी ने उन्हें ही दिल्ली के मोर्चे पर ना सिर्फ लगाया बल्कि लोकसभा चुनाव भी लड़वाया. ये बात और है कि 2013 से उनकी हार का दौर शुरू हुआ तो वो थमा नहीं.

ये बात लोगों को हमेशा हैरान करती रही कि युवा नेताओं से भरी कांग्रेस में भी 81 साल की शीला दीक्षित आखिरी समय तक सक्रिय रही और ना सिर्फ ज़ोरशोर से काम करती रहीं बल्कि पार्टी के बाहर और भीतर भी प्रतिद्वंद्वियों से खूब जूझीं. उनकी सक्रियता का अनुमान ऐसे लगाइए कि अपनी मौत के दिन से पहले तक वो मीडिया में अपने बयानों से सुर्खियों में थीं और दिल्ली में पार्टी के प्रभारी पीसी चाको के साथ उनकी अदावत सतह पर आ चुकी थी.

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जब शीला दीक्षित को दिल्ली का कार्यभार सौंपा गया तब दिल्ली प्रदेश महिला कांग्रेस की अध्यक्ष शर्मिष्ठा मुखर्जी ने कहा था कि- शीला दीक्षित की सबसे बड़ी खासियत ये है कि वो सबके साथ सहज हैं. सबके साथ आसानी से घुलमिल जाती हैं. इससे पार्टी के कार्यकर्ता उन्हें अपना समझते हैं और उनकी प्रेरणा से खुशी के साथ पार्टी के काम को आगे बढ़ाते हैं जिससे पार्टी को मजबूती मिलती है.

लोगों को मनोज तिवारी की वो तस्वीर अभी तक याद ही होगी जब वो शीला दीक्षित को 2019 का लोकसभा चुनाव हराकर उनके घर पहुंचे थे. मनोज तिवारी ने शीला के पांव छूकर आशीर्वाद लिया था. उनके निधन का समाचार पाकर बीजेपी के दिल्ली अध्यक्ष मनोज तिवारी बेहद भावुक दिखे. यहां तक कि दिल्ली में लंबे वक्त तक उनके प्रतिस्पर्धी रहे केंद्रीय मंत्री डॉ हर्षवर्धन भी गमगीन थे.

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2019 लोकसभा चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को पार्टी ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली से टिकट दिया था लेकिन वह चुनाव हार गई थीं. भाजपा के मनोज तिवारी के सामने हार का सामना करना पड़ा था.

कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी ने शीला दीक्षित को अगर कांग्रेस की प्यारी बेटी करार दिया तो ये सिर्फ शब्दों के संयोजन से निर्मित एक उदार श्रद्धांजलि ही नहीं थी बल्कि वो अहमियत थी जो शीला दीक्षित ने हमेशा कांग्रेस से अपने काम के बूते पाई.