क्या कांग्रेस को वंशवाद के विनाश से बचा पाएंगे राहुल गांधी?

राहुल अगर इसी तरह अपनी हार का खाता बढ़ाते रहे, तो हाथ के पंजे वाले निशान में भी बहुत जल्द शून्य जोड़ना पड़ेगा
Will Congress president Rahul Gandhi save party from dynasty?, क्या कांग्रेस को वंशवाद के विनाश से बचा पाएंगे राहुल गांधी?

नई दिल्ली: आंकड़ों के आईने में सीटों की सच्चाई देखने के बाद अब तो राहुल गांधी ने भी मान लिया है कि कांग्रेस के खाते से ज़ीरो कम करना उनके बस की बात नहीं. ये हम नहीं, मोदी के समर्थक नहीं, बल्कि आंकड़े ख़ुद सच्चाई बयां कर रहे हैं.

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए गठबंधन इस बार 353 तक पहुंच गया तो राहुल गांधी का यूपीए 92 तक पहुंचने में बुरी तरह हांफने लगा. कांग्रेस के बाकी दिग्गजों की क्या बात करें, जब अध्यक्ष ही 21 साल पुराना अमेठी का सियासी किला नहीं बचा पाए. देश का चौकीदार बनने की रेस में राहुल पीएम मोदी को हराने के लिए सब कुछ दांव पर लगा बैठे. मगर, नतीजा ये हुआ कि कांग्रेस और मोदी की सीटों में तीन गुना से भी ज़्यादा का अंतर है.

अगर कांग्रेस ऐसा ही प्रदर्शन करती रही, तो ये वो फ़ासला है, जिसे तय करने में उसे अगले 6 चुनाव तक इंतज़ार करना पड़ सकता है. क्योंकि, राहुल के ज़रिए कांग्रेस के खाते में सीटों के बजाय शून्य बढ़ते जा रहे हैं. 2014 में कांग्रेस 44 सीटें जीत सकी थी और बीजेपी 282, वहीं 2019 में राहुल की सरपरस्ती में पार्टी के हिस्से में सिर्फ़ 52 सीटें आईं, जबकि बीजेपी ने 303 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया.

यानी अगर सीधे-सीधे गणित के हिसाब से बात करें, तो कांग्रेस 5 साल में सिर्फ़ 8 सीटें ही बढ़ा सकी. अगर कांग्रेस की 2014 और 2019 की सीटों को मिला दें, तो भी (44+52) 96 सीटें होती हैं. बीजेपी ने ना सिर्फ़ पिछली बार से बेहतर प्रदर्शन किया, बल्कि ट्रिपल डिजिट के आंकड़े को अकल्पनीय तक पहुंचाया. इस हिसाब से कांग्रेस को बीजेपी की तरह 303 सीटों का आंकड़ा छूने के लिए शायद अगले कई चुनावों तक इंतज़ार करना पड़ेगा.

इस सोच विचार के दौर में ख़बर ये भी है कि राहुल गांधी वंशवाद की सियासत को लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं पर बहुत बरसे. पहले तो कांग्रेस वर्किंग कमेटी की मीटिंग में इस्तीफ़े की पेशकश कर दी, जिसे नामंज़ूर कर दिया गया. (जो कि शायद पहले से तय लग रहा था). हालांकि, राहुल ने हार की नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए इस्तीफ़े की पेशकश की थी, क्योंकि वो जानते हैं कि अब उनके सामने बचने का कोई रास्ता नहीं है. नतीजा घोषित हो चुका है, जिसमें कई सारे ज़ीरो के साथ वो बुरी तरह फेल हो चुके हैं.

अब सवाल ये है कि राहुल को अगर वंशवाद की सियासत का दंश कांग्रेस के लिए घातक लगने लगा है, तो सबसे पहले उन्हें एक बार पार्टी के इतिहास पर गौर करना चाहिए. इसी वंशवाद को बीजेपी ने राहुल के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार बनाया. अगर राहुल को ये लगता है कि वंशवाद की वजह से कांग्रेस अपनी जड़ें खोती जा रही है, तो उन्हें ये भी समझना होगा कि इसकी बड़ी शुरुआत कहां से होनी चाहिए. अब विकल्प के तौर पर कांग्रेस और कांग्रेसी दोनों ही प्रियंका गांधी की ओर देख रहे हैं. अभी कुछ तय नहीं है, लेकिन अगर ऐसा हुआ तो शायद नतीजे एक बार फिर इसी तरह आ सकते हैं.

हालांकि, तब तक वंशवाद कांग्रेस के विनाश में आखिरी कील ठोंक चुका होगा.

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