लड़की ने रेलवे से मांगा सेनेटरी पैड, लोग करने लगे ऊटपटांग बातें

ये नाराजगी, अभद्र टिप्पणियां और भद्दी गालियां इस बात का सबूत हैं कि आज में हमारे समाज के लोग एक महिला की मूलभूत आवश्यकता के प्रति कितने असंवेदनशील हैं.

एक महिला ने ट्रेन में यात्रा के दौरान ट्विटर पर भारतीय रेलवे को ट्वीट कर सेनेटरी नैपकिन देने की गुहार लगाई. उसके ट्वीट करते ही प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गयी. कई ट्विटर यूजर्स को ये ट्वीट पसंद नहीं आया और वे उस लड़की को न केवल ट्रोल करने लगे बल्कि भद्दे कमेंट्स कर गालियां भी दीं.

सेनेटरी नैपकिन की मांग की खिलाफत करने वालों न सिर्फ पुरुष बल्कि महिलाएं भी शामिल थीं. एक हिंदूवादी समर्थक शेफाली वैद्य ने तो ये तक कह दिया कि “आप क्या चाहती हैं भारतीय रेलवे और क्या बेचे? कंडोम? अगर आपको यात्रा के दौरान कोई मिल गया और जरूरत पड़ गयी तो?”

शेफाली सेनेटरी नैपकिन की तुलना कंडोम से कर रही थीं और इस बात पर नाराज हो रही थीं कि एक महिला ने एमर्जेन्सी में सेनेटरी नैपकिन मांग लिया. इस बात पर नाराज होने वाली शेफाली अकेली नहीं थी, बल्कि ट्विटर यूजर्स की जमात थी.

ये नाराजगी, अभद्र टिप्पणियां और भद्दी गालियां इस बात का सबूत हैं कि आज में हमारे समाज के लोग एक महिला की मूलभूत आवश्यकता के प्रति कितने असंवेदनशील हैं. चाहे किसी का राजनितिक रुझान कुछ भी हो, लेकिन ये बिल्कुल समझ से परे है कि कोई सेनेटरी नैपकिन और कंडोम की तुलना कैसे कर सकता है और जरूरत के वक्त सेनेटरी नैपकिन मांगे जाने पर नाराज कैसे हो सकता है.

जिसने सेनेटरी नैपकिन की मांग की थी उस लड़की का नाम श्रुति द्विवेदी है. श्रुति के ट्वीट पर जो कमेंट आये हैं और जो लोग नाराज हो रहे हैं उनकी दलीलें बेहद बेतुकी और बचकानी है. सारे रिप्लाई पढ़ के कोई भी समझदार इंसान यही कहेगा कि आज भी हमारे समाज में लोगों को संवेदनशील होने के साथ-साथ पीरियड्स के प्रति जागरूक होने की आवश्यकता है. यही नहीं कोई भी लड़की इस तरह के हालांत से गुजर सकती है, शेफाली भी. इसमें किसी को बुरा भला कहने जैसी बात ही नहीं होनी चाहिए थी.

लोगों को यह समझने की जरूरत है की पीरियड्स मेडिकल इमरजेंसी है जो महिलाओं के साथ निश्चित डेट पर होती है, मगर यह डेट स्ट्रेस या किन्हीं और कारणों से आगे पीछे हो सकती है. यूं तो महिलायें अपने साथ सेनेटरी नैपकिन रखती ही हैं, पर हैवी फ्लो के दौरान उन्हें एक्स्ट्रा नैपकिन की जरूरत भी पड़ सकती है. आखिरकार महिलाएं भी इंसान ही हैं. संभव है की कभी वो अपने साथ नैपकिन रखना भूल जाएं. तो सवाल ये उठता है कि क्या जरूरत पड़ने पर इसकी मांग कर लेना गलत है? कई एयरपोर्ट, मॉल और थिएटर सेनेटरी नैपकिन उपलब्ध करवाते हैं, तो रेलवे क्यों ऐसी व्यवस्था नहीं कर सकता?

वो भी एक ऐसे देश का रेलवे, जो लम्बी यात्रा करने के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है. रेलवे को तो देश आधी आबादी यानि महिलाओं की जरूरत का ख्याल तो रखना ही चाहिए. लोग चाहे वो किसी भी लिंग के हो, उन्हें जागरूक होना चाहिए और इस मुद्दे की गंभीरता और संवेदनशीलता को समझना चाहिए. तब ही जाकर ऐसे टैबू ख़त्म होंगे. ये विडम्बना है कि पढ़े-लिखे लोग ही ट्विटर पर इसका विरोध कर रहे हैं.

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