लोकतंत्र की ललकार से भौंचक्का रह गया चीन, 2020 में भी बजा रहा 1962 का रिकॉर्डर

LAC पर चीन की हर साजिश को नाकाम करने के लिए भारतीय सेना (Indian Army) तैयार है. लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक ड्रैगन आर्मी के हर दुस्साहस का करारा जवाब दिया जा रहा है.

  • TV9 Hindi
  • Publish Date - 11:17 pm, Thu, 17 September 20

भारत (India) के हौसले की बड़ी वजह ये है कि इस देश में सवा अरब आबादी का अपना-अपना हिस्सा है, अपना-अपना हक है और ये दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है जहां जनता की सरकार होती है, जनता का देश होता है. जबकि चीन (China) में हर जगह पीपुल्स नजर आता है जैसे पीपुल्स लिबरेशन आर्मी, पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना, पीपुल्स डेली चाइना से लेकर पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना तक हर जगह पीपुल्स जरूर मौजूद होता है.

पीपुल्स यानी आम लोग, चीन ये बताने की कोशिश करता है कि चीन में सबकुछ आम आदमी के ही हाथ में है. जबकि हकीकत में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी अपनी अवाम से गुलाम की तरह व्यवहार करती है. यही वजह है कि लोकतंत्र की ललकार से बीजिंग भौंचक्का रह गया है. वहीं, अब भारत की बदली हुई नीति अब संसद की दीवारों पर लिखी जा चुकी है.

सीमा पर चीन की हर साजिश को नाकाम करने के लिए भारत तैयार है. लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक ड्रैगन आर्मी के हर दुस्साहस का करारा जवाब दिया जा रहा है. लेकिन सरहद पर तनाव के बीच चीन का प्रोपेगेंडा वॉर भी बदस्तूर जारी है. चीनी सरकार की कठपुतली मीडिया बार-बार 1962 का राग अलाप रही है. भारत के खिलाफ साइकोलॉजिक वॉर के हथकंडे अपना रही है. लेकिन सच तो ये है कि LAC पर भारत के दमखम से हैरान ड्रैगन अब दुम दबाकर भागने का रास्ता तलाश रहा है.

ड्रैगन की दोहरी चाल अब लोकतंत्र के मंदिर के पन्नों में दर्ज हो गई है और भावी पीढ़ियां भी जब इस पन्ने को पलटेंगी तो उन्हें चीन का असली चरित्र नजर आएगा. ड्रैगन पहले तो शांति समझौते करता है, फिर समझौतों की धज्जियां उड़ाता है. सरहद पर नई LAC खींचने की कोशिश करता है. लेकिन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में आज ये साफ कर दिया कि एलएसी पर पड़ोसी देश की साजिश भारत नामंजूर करता है.

1962 में ही फंसा है चीन

दरअसल इतिहास कभी-कभी अंधा भी बना देता है और कुछ ये ही हो रहा है चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ, जो 1962 के भारत-चीन युद्ध के गुरूर में उलझे हुए हैं. ये देखते हुए भी कि 58 सालों में हिमालय का बर्फ कितना पिघल चुका है और पूर्वी लद्दाख में पिछले चार महीने से जंग का माहौल बनाने वाले ड्रैगन का दम अब टूट चुका है. एक-एक मोर्चे पर भारतीय जांबाजों से पिटने के बाद पैंगोंग से लेकर चुशूल तक भारतीय सेना से घिरने के बाद चीन की सेना अब वापस लौटने को बेचैन है.

लेकिन चीनी सरकार की भोंपू मीडिया 1962 के जंग का घिसा रिकॉर्ड बजा रही है. 58 साल पुराने इतिहास में अटकी है और ये साबित करता है कि जितना हिमालय पर बर्फ नहीं है उससे ज्यादा बर्फ चीन के हुक्मरानों के दिमाग पर जमा हो चुका है.

शी जिनपिंग सरकार के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स अपने आर्टिकल में भारत को 1962 के युद्ध की याद दिला रहा है. आगाह कर रहा है कि भारत 58 साल पुरानी गलती को ना दोहराए. प्रधानमंत्री नेहरू की तरह मोदी सरकार भी चीन की ताकत की परीक्षा लेने की कोशिश ना करे.

ऐसा पहली बार नहीं है जब चीनी सरकार की प्रोपेगेंडा मशीन 1962 की रट लगा रही हो. ये देखते हुए भी कि सरहद पर हालात बदल चुके हैं. लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक भारत की सेना ड्रैगन आर्मी पर हावी है. गलवान संघर्ष के बाद भारत के जांबाजों ने पेट्रोलिंग प्वाइंट 14 पर रेड आर्मी को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया.

फायरिंग रेंज में चीनी सेना

पैंगोग के पास चुशूल सेक्टर में पहाड़ियों की चोटी पर चढ़ाई कर भारत के वीरों ने मोल्डो गैरिसन और स्पांगुर गैप में चीनी सेना को अपनी फायरिंग रेंज में ले लिया है. भारत के इस सामरिक कूटनीति ने चीन को बैकफुट पर धकेल दिया है. हॉट स्प्रिंग्स में पेट्रोलिंग प्वाइंट 15 और गोगरा पोस्ट में पेट्रोलिंग प्वाइंट 17A पर चीनी सेना की चौकड़ी अब उसके काम नहीं आ रही.

काराकोरम पास के नजदीक सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण दौलत बेग ओल्डी पोस्ट से करीब 30 किमी दूर मौजूद डेप्सांग प्लेन्स में पीएलए ने अपनी दो ब्रिगेड तैनात की है, जिससे पीपी 10 से 13 तक पेट्रोलिंग जरूर बाधित हुई है. लेकिन भारतीय सेना यहां संयम से काम ले रही है. रेड आर्मी यहां वॉर गेम कर रही है. रास्ते में आकर भारतीय सेना को उकसाने की कोशिश कर रही है.

अरुणाचल में भी भारत चीन पर हावी

अरुणाचल प्रदेश में भी भारत चीन पर हावी है. वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पीएलए की तैनाती की बराबरी में वहां भारतीय सेना के जांबाज लगातार मुस्तैद हैं. अरुणाचल के पास LAC पर चीन को ऊंचाई पर होने का फायदा जरूर है, लेकिन ड्रैगन आर्मी के पास यहां सप्लाई लाइन्स मौजूद नहीं है.

जो सप्लाई लाइन्स हैं वो काफी दूर तिब्बत से गुजरती है. इसलिए चीन को पता है कि अरुणाचल प्रदेश में वो ज्यादा देर तक टिक नहीं सकता. भारतीय वायु सेना को यहां चीन की सप्लाई लाइन काटने में ज्यादा देर नहीं लगेगी. यही वजह है कि 1962 के युद्ध में अरुणाचाल प्रदेश के कुछ हिस्सों पर कब्जा करने के बाद भी चीन ने वापस लौटने में ही अपनी भलाई समझी.