जम्मू-कश्मीर में जमात-ए-इस्लामी पर शिकंजा, कई बड़े नेता हिरासत में

1990 के दशक में जब कश्मीर में आतंकवाद चरम पर था, उस समय अलगाववादी संगठन जमात-ए-इस्लामी को आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन का दाहिना हाथ माना जाता था. उस वक्त जमात-ए-इस्लामी, हिजबुल की राजनीतिक शाखा के तौर पर काम करता था.

जम्मू-कश्मीर: जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी समूह जमात-ए-इस्लामी पर ताबड़तोड़ कार्रवाई जारी है. जमात- ए- इस्लामी के कई नेताओं को हिरासत में लिया गया है. संगठन के खिलाफ UAPA (अनलॉफुल ऐक्टिविटी प्रिवेन्शन एक्ट) के तहत कार्रवाई की जा रही है. छापेमारी के दौरान अकेले श्रीनगर में जमात के कई बैंक खातों का पता चला है, जिन्‍हें सील कर दिया गया है. जम्‍मू- कश्‍मीर के किश्तवाड़ में भी जमात के खिलाफ छापेमारी हुई है. गुरूवार को सख्त रुख अख्तियार करते हुए सरकार ने जम्मू- कश्मीर के अलगाववादी समूह जमात-ए-इस्लामी पर बैन लगा दिया था.

जमात- ए- इस्लामी के कई नेता गिरफ्तार

कार्रवाई के दौरान अब्दुल हामिद फयाज, जाहिद अली, मुदस्सिर अहमद और गुलाम कादिर जैसे जमात-ए-इस्लामी के बड़े नेताओं को गिरफ्तार किया गया है. वहीं, दक्षिण कश्मीर के त्राल, बडगाम और अनंतनाग से जमात के कई नेताओं की भी गिरफ्तारी हुई है.

हिजबुल का दाहिना हाथ माना जाता है जमात-ए-इस्लामी

1990 के दशक में जब कश्मीर में आतंकवाद चरम पर था, उस समय अलगाववादी संगठन जमात-ए-इस्लामी को आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन का दाहिना हाथ माना जाता था. उस वक्त जमात-ए-इस्लामी, हिजबुल की राजनीतिक शाखा के तौर पर काम करता था. इसके विपरीत जमात-ए-इस्लामी खुद को हमेशा सामाजिक और धार्मिक संगठन बताता रहा है. आज भी जमात का एक एक बड़ा कैडर, हिजबुल से जुड़ा हुआ है.

जमात का इतिहास जान लीजिए

जमात-ए-इस्लामी की नींव 1942 में पीर सैदउद्दीन ने रखी थी. खुद को सामाजिक और धार्मिक संगठन बताने वाले जमात की कश्मीर की सियासत में भी महत्वपूर्ण भूमिका है. वर्ष 1971 में जमात ने कश्मीर में चुनाव लड़ा, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी थी. इसके बाद 1972 में जमात के पांच प्रत्याशी पहली बार विधायक बने थे. इनमें कट्टरपंथी नेता सैय्यद अली शाह गिलानी भी शामिल थे. जमात ने 1975में इंदिरा-शेख समझौते का खुलेआम विरोध किया था. इतना ही नहीं जमात को कश्मीर में युवाओं को देश-विरोधी गतिविधियों के लिए बरगलाने और पाकिस्तानी नारों के समर्थक के तौर पर भी देखा जाता रहा है. 1987 में जमात ने अन्य मजहबी संगठनों संग मिलकर मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट कश्मीर बनाया था. आपातकाल के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री शेख मुहम्मद अब्दुल्ला ने भी जमात देश विरोधी गैर-कानूनी गतिविधियों में शामिल होने की वजह से प्रतिबंध लगा दिया था.

‘लोकतंत्र में बाहुबल से निपटना चाहती है मोदी सरकार’

बता दें कि गुरूवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में सुरक्षा पर एक उच्चस्तरीय बैठक के बाद गृह मंत्रालय द्वारा प्रतिबंध को लेकर अधिसूचना जारी की गई. अधिसूचना में यह कहा था गया था कि जमात-ए-इस्लामी ऐसी गतिविधियों में शामिल रहा है जो कि आंतरिक सुरक्षा और लोक व्यवस्था के लिए खतरा हैं. इस प्रतिबंध के बाद पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) और नेशनल कॉन्फ्रेंस ने जमात-ए-इस्लामी जम्मू कश्मीर पर प्रतिबंध लगाने के केंद्र के फैसले की शुक्रवार को आलोचना की और कहा कि यह लोकतंत्र की उस मूल भावना के खिलाफ है जो विरोधी राजनीतिक विचारों की अनुमति देता है.

पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने ट्वीट करते हुए लिखा कि, ‘लोकतंत्र में विचारों का संघर्ष होता है. ऐसे में जमात- ए- इस्लामी (जेके) पर पाबंदी लगाने की ख़बर निंदनीय है और यह जम्मू- कश्मीर के राजनीतिक मुद्दे से कठोरता और बल प्रयोग के जरिए निपटने के भारत सरकार के रुख का एक अन्य उदाहरण है’.