निर्भया के दोषियों की फांसी पर रोक के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई पूरी, कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला

तुषार मेहता ने जेल मैनुअल का नियम 834 पढ़कर सुनाया. उन्होंने कहा कि दोषियों की कोशिश फांसी को टालने की है.
Nirbhaya gang rape case, निर्भया के दोषियों की फांसी पर रोक के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई पूरी, कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला

निर्भया गैंगरेप मामले में फांसी पर रोक के खिलाफ दायर याचिका पर रविवार को हाईकोर्ट में सुनवाई हुई. यह याचिका गृह मंत्रालय की ओर से दायर की गई है. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हाईकोर्ट में केंद्र सरकार का पक्ष रखा. न्यायधीश सुरेश कैत ने इस मामले की सुनवाई की.

Hearing Updates:

  • दिल्ली हाईकोर्ट ने निर्भया मामले पर फैसला सुरक्षित रख लिया. साथ ही फैसला सुनाने के लिए कोई समय नहीं बताया है.
  • निर्भया मामले में दोषियों की फांसी पर रोक के पटियाला हाउस कोर्ट के फैसले के खिलाफ केन्द्र सरकार ने याचिका दायर की. दिल्ली हाईकोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद निर्भया मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया है.
  • तुषार मेहता ने कहा कि सभी दोषियों को अलग-अलग फांसी देने में दिल्ली सरकार और तिहाड़ जेल प्रशासन को को आपत्ति नहीं है. शत्रुघ्न चौहान मामले में फैसला दोषी को केन्द्र में रख कर है, लेकिन भविष्य को देखते हुए उसमें सुधार की जरूरत है.
  • सरकार का पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनल तुषार मेहता ने कहा कि राष्ट्रपति के पास संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत अधिकार है. राष्ट्रपति पहले ही मुकेश और विनय की दया याचिका खारिज कर चुके हैं. याचिका खारिज करते हुए तथ्यों को देखा होगा.
  • केन्द्रीय सरकार और दिल्ली राज्य सरकार दोनों की याचिका है. हो सकता है कि दिल्ली सरकार ने कोर्ट को एप्रोच नहीं किया हो, लेकिन कोर्ट ने क्या किया? दोषी पवन गुप्ता ने अभी तक दया याचिका दायर नहीं की, तो वो नहीं करना चाहता या 6 महीने बाद करेगा.
  • शत्रुघ्न चौहान के मामले का इससे कोई लेना-देना नहीं है. हमने उस फैसले में सुधार के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है.
  • रेबेका जॉन ने सुनवाई के दौरान शत्रुघ्न चौहान के मामले का हवाला दिया. उन्होंने कहा कि दया याचिका को न‌ए तथ्यों के आधार पर चुनौती दी जा सकती है.
  • राष्ट्रपति तथ्यों के आधार पर कोर्ट से अलग निर्णय दे सकते हैं. राष्ट्रपति क्षमा भी कर सकते हैं. इसलिए हम जोर दे रहे हैं कि सबको एक साथ सजा दी जाए.
  • हरवंश सिंह के मामले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दया याचिका से पहले की स्थिति सही है.
  • सुप्रीम कोर्ट के 1982 के हरवंश सिंह बनाम उत्तर प्रदेश के मामले में एक ही अपराध के लिए अलग-अलग सजा हुई. दोषी जीता सिंह को इसलिए लाभ नहीं मिल पाया क्योंकि उसे पहले फांसी दे दी गई थी.
  • रेबेका जॉन ने कहा कि हम भी इस मामले में वो स्थिति नहीं चाहते कि किसी को फांसी मिल जाए और किसी की सजा में बाद में बदलाव हो जाए. फांसी की सजा को फांसी के बाद वापस नहीं किया जा सकता.
  • रेबेका जॉन ने कहा कि संविधान के अनुसार मौत की दहलीज पर खड़े दोषी के भी आखिरी सांस तक कुछ अधिकार हैं.
  • रेबेका जॉन ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 कहता है कि अगर दोषी ने घिनौने से भी घिनौना अपराध किया है तो भी कानून की दृष्टि में उसके साथ भेदभाव नहीं कर सकता.
  • दिल्ली हाईकोर्ट में निर्भया के दोषी की तरफ से सीनियर एडवोकेट रेबेका जॉन पेश हुईं. रेबेका जॉन ने बताया CRPC का 28( 2) कहता है कि ट्रायल कोर्ट कोई भी सजा पास कर सकता है लेकिन फांसी के मामले में हाईकोर्ट से कंफर्म करवाना होता है.
  • उन्होंने बताया कि एडिशनल सेशन कोर्ट ने 2013 में 120बी में भी चारों दोषियों को दोषी ठहराया और फांसी की सजा सुनाई, जिसे बाद में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा था.
  • उन्होंने मेरा इतना ही कहना है कि एक अपराध, एक सजा तो फांसी भी एक साथ होनी चाहिए. इस दुनिया में मौत की सजा से बड़ी कोई सजा नहीं है. चारों को अलग-अलग फांसी नहीं दी जा सकती.
  • निर्भया के दोषियों की ओर से वकील एपी सिंह जेल मैनुअल का 838 रूल पढ़कर सुना रहे हैं कि अगर दोषियों की याचिका लंबित है तो फांसी नहीं दे सकते. अगर एक मामले में एक से ज्यादा दोषी हैं तो किसी की भी याचिका लंबित है तो फांसी कैसे दी जा सकती है.
  • एपी सिंह ने कहा कि दोषी को सभी याचिकाओं के खारिज होने पर भी फांसी से पहले समय दिया जाता है, ताकि वो परिजनों से मिल सकें और जहनी तौर पर तैयार हो सकें.
  • उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के 2014 के शत्रुघ्न चौहान मामले में भी कहा गया है कि न्यूनतम 14 दिन का वक्त दिया जाना चाहिए.
  • अक्षय, विनय और पवन की तरफ से एडवोकेट एपी सिंह पैरवी कर रहे हैं. सिंह ने कोर्ट से एफीडेविट फाइल करने की इजाजत मांगी.
  • एपी सिंह कोर्ट को बता रहे हैं कि उनके तीनों मुवक्किलों ने कब कौनसी याचिका लगाई.
  • तुषार मेहता ने कहा कि ये सेशन कोर्ट की जिम्मेदारी है कि फांसी की सजा होने के बाद उसका क्रियान्वयन किया जाए‌.
  • केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, ASG के‌एम नटराजन और दोषियों की तरफ से एडवोकेट एपी सिंह, वृंदा ग्रोवर और रैबेका जॉन कोर्ट पहुंचे.
  • निर्भया के माता-पिता भी कोर्ट में अपने वकील जितेंद्र झा के साथ मौजूद थोड़ी देर में सुनवाई शुरू होगी.

निर्भया के दोषियों की कानूनी उपचारों की दृष्टि से क्या स्थिति है?

1. मुकेश सिंह के दोनों विकल्प क्यूरेटिव पिटीशन और दया याचिका खत्म हो चुके हैं.

2. विनय शर्मा के भी के दोनों विकल्प क्यूरेटिव पिटीशन और दया याचिका खत्म हो चुके हैं.

3. अक्षय ठाकुर की क्यूरेटिव पिटीशन खारिज हो चुकी है. उसकी दया याचिका राष्ट्रपति के पास विचाराधीन.

4. पवन गुप्ता ने न तो क्यूरेटिव पिटीशन दायर की है और न ही राष्ट्रपति के पास दया याचिका भेजी है.

  • तुषार मेहता ने कोर्ट को एक चार्ट बनाकर दिया है, जिसमें बताया गया है कि किसने कब कब याचिका दाखिल की और कानून का किस तरह से दुरुपयोग किया गया.ट
  • साल-साल भर बाद याचिकाएं दाखिल की गई थीं. राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका खारिज होने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. हर मौके पर देर की गई.
  • पवन की तरफ से न क्यूरेटिव पिटीशन दाखिल की गई और न ही दया याचिका. इन्हें यह लग रहा है कि अगर ये याचिका दाखिल नहीं करेंगे तो फांसी से बचें रहेगें.
  • पवन ने 2018 में खुद को नाबालिग बताया. कोर्ट ने भी याचिका को खारिज कर दिया.
  • सुप्रीम कोर्ट में SLP लगाई गई, वो भी खारिज हो गई. उसके खिलाफ भी पुनर्विचार याचिका दाखिल की गई, उसके भी कोर्ट ने खारिज कर दिया.
  • तुषार मेहता ने जेल मैनुअल का नियम 834 पढ़कर सुनाया. ये इनकी कोशिश फांसी को टालने की है. इन दोषियों ने पीड़िता के साथ जघंय अपराध को अंजाम दिया है.
  • नियम कहता है कि ट्रायल कोर्ट के फांसी की सजा देने और हाई कोर्ट कंफर्म और सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी सजा को बरकरार रखने पर जेल अधीक्षक दोषियों को अपने कानूनी उपचारों का इस्तेमाल करने के लिए नोटिस जारी करता है. इसके बाद तय सीमा में इनका इस्तेमाल करना होता है.
  • तुषार मेहता ने कहा कि एक जैसे अपराध में एक से ज्यादा दोषियों को फांसी की सजा मिलती है. सभी के कानूनी उपचारों के खत्म होने का इंतजार किया जाता है.
  • उन्होंने हरवंश बनाम उत्तर प्रदेश 1982 सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया.
  • दया याचिका राष्ट्रपति के विवेक पर निर्भर करता है. तुषार मेहता ने कहा कि दया याचिका से पहले अलग-अलग फांसी नहीं दी जा सकती है. लेकिन दया याचिका खारिज होने के बाद दी जा सकती है.
  • उन्होंने जेल मैनुअल के नियम 836 का हवाला. उन्होंने कहा कि अगर दिए गए तय वक्त में कानूनी उपचारों का इस्तेमाल किया जाता है तो उसके निस्तारण तक फांसी नहीं होती.

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