, मोदी ने तो उरी के बाद ही कहा था- खून और पानी नहीं बह सकते साथ, फिर क्यों मिलता रहा पाक को पानी!
, मोदी ने तो उरी के बाद ही कहा था- खून और पानी नहीं बह सकते साथ, फिर क्यों मिलता रहा पाक को पानी!

मोदी ने तो उरी के बाद ही कहा था- खून और पानी नहीं बह सकते साथ, फिर क्यों मिलता रहा पाक को पानी!

पाकिस्तान को भारत के हिस्से का पानी मिलना पुरानी बात है. हर हमले के बाद पानी रोक देने की धमकी भी पुरानी बात है. पुलवामा के बाद वही धमकी फिर दी गई लेकिन सवाल है कि अब तक हमारे हिस्से का पानी पाकिस्तान क्यों पाता रहा?
, मोदी ने तो उरी के बाद ही कहा था- खून और पानी नहीं बह सकते साथ, फिर क्यों मिलता रहा पाक को पानी!

एक के बाद एक आतंकी हमले के बाद भारत सरकार की सहनशीलता आखिरकार जवाब दे ही गई. पाकिस्तान को दुनिया से काट कर अकेला करने की कई कोशिशें रात-दिन हो रही हैं. इसी सिलसिले में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी पाकिस्तान को अपने हिस्से का पानी ना देने का एलान कर दिया. गडकरी की इस घोषणा ने भारत और पाकिस्तानी मीडिया में अच्छी खासी सुर्खियां को बनाईं लेकिन आइए ज़रा उनकी इस भीषण घोषणा के कुछ पहलुओं को बारीकी से समझ भी लें…

 

एलान तो ठीक है लेकिन क्रियान्वयन कब और कैसे?

नितिन गडकरी ने ट्वीट में कहा कि सरकार पूर्वी नदियों का रुख मोड़कर उनके पानी का प्रयोग जम्मू-कश्मीर और पंजाब के लिए करेगी. उन्होंने ये भी बताया कि रावी पर शाहपुर-कांडी में बांध का निर्माण शुरू हो चुका है. UJH परियोजना में भी भारत ने अपने हिस्से का पानी जम्मू-कश्मीर भेजने का फैसला लिया है. उसके बाद बचा हुआ पानी दूसरी रावी व्यास लिंक के ज़रिए देश के दूसरे हिस्सों में भिजवाने की योजना है.

अब ये तो हुई गडकरी के एलान की बात लेकिन तथ्यों पर गौर करें तो सरकारी अफसरों के मुताबिक जिन घोषणाओं की वजह से गडकरी वाहवाही लूट रहे हैं उन्हें ज़मीन पर उतरने में 6 साल का वक्त लगेगा. ज़ाहिर है, पानी का प्रवाह रोकने के लिए 100 मीटर ऊंचाई के बांध बनाने होंगे जिनको मज़बूती से खड़ा करने में वक्त तो लगना ही है, यानि कम से कम 6 साल तक तो पाकिस्तान पर इस बयान का असर नहीं पड़ेगा.

 

पुराने बयान पर ताज़ी वाहवाही

लगे हाथ ये भी साफ कर दें कि गडकरी का पानी रोक देनेवाला एलान भले ही पुलवामा हमले के बाद आया हो मगर इसमें नया कुछ नहीं है. ये सरकार के ढाई साल पुराने बयान का दोहराव भर है. उरी हमले के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने सिंधु जल समीक्षा बैठक में कहा था कि, ‘एक ही समय में खून और पानी साथ नहीं बह सकते.’ ढाई साल बाद तक दोनों साथ बह रहे हैं.


सारा मामला है क्या?

दरअसल सारा विवाद सिंधु जल समझौते का है. भारत और पाकिस्तान के बीच साल 1960 में कराची शहर में 6 नदियों सिंधु, रावी, व्यास, झेलम, चिनाब, सतलुज नदियों को लेकर समझौता तो हुआ, मगर आज तक पानी के बंटवारे को लेकर खींचतान जारी है. सिंधु घाटी की इन 6 नदियों में कुल 168 मिलियन पानी है. भारत के हिस्से में तीन नदियां रावी, व्यास, सतलुज ही आती हैं यानि 168 मिलियन में से हमारे पास इस्तेमाल के लिए सिर्फ 33 मिलियन पानी ही है. ये आंकड़ा सारी छह नदियों के कुल पानी का महज़ 20% ही बैठेगा. अब समझिए कि भारत पहले से ही अपने हिस्से के 33 मिलियन पानी का 95% इस्तेमाल कर रहा है. इससे बचा सिर्फ 5% पानी ही पाकिस्तान को जाता है और इसी पर सारा शोर मचा है. अगर आप ध्यान से आंकड़ा तौलें तो पाएंगे कि पाकिस्तान के भूखे मरने की नौबत आना उतना आसान भी नहीं है जितना सरकारी एलानों से लगता है.

 

समझौता टूटा तो होगी जंग?

वैसे भारत ने सिंधु जल समझौते को तोड़ने की बात नहीं कही है. जो कहा गया है वो पानी का रोका जाना है, मगर पाकिस्तान इसे समझौता तोड़ना ही बता रहा है. भारत ने जब भी इन नदियों के पानी को रोकने के बारे में कहा तब पाकिस्तान ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे युद्ध के लिए उकसावा ठहराया. 

पाकिस्तान युद्ध कर पाएगा या नहीं ये तो बाद की बात है लेकिन इतना ज़रूर है कि वो भारत के पानी रोकने पर अंतर्राष्ट्रीय अदालत का दरवाज़ा ज़रूर खटखटाएगा. 

रणनीतिक विचारक और लेखक ब्रह्म चेलानी मानते हैं कि भारत वियना समझौते के लॉ ऑफ ट्रीटीज़ के मुताबिक समझौते को ये कह कर तोड़ सकता है कि पाकिस्तान उसके खिलाफ आतंक को बढ़ावा दे रहा है.

वहीं पूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दुबे का तर्क है कि समझौता विश्व बैंक ने कराया था इसलिए इसके टूटने पर विश्व बैंक और भारत के बीच खटास भी आ सकती है. 

बाकी अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भी ऐसा फैसला कूटनीति के लिहाज से भारत के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता.

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के निजी हैं. )

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