इंदिरा गांधी के अंडरवर्ल्ड डॉन से मिलने पर क्यों चौंक गया मीडिया?

करीम लाला अंरडवर्ल्ड डॉन था. तथ्य है कि एक जमाने में मुंबई और कई दूसरे इलाकों में सरकारी सिस्टम के समानान्तर उसका सिक्का (सत्ता भी कह सकते हैं) चलता था.
underworld don karim lala, इंदिरा गांधी के अंडरवर्ल्ड डॉन से मिलने पर क्यों चौंक गया मीडिया?

अब्दुल करीम शेर खान ऊर्फ करीम लाला. 1920 में अफगानिस्तान से मुंबई आए करीम की कुंडली निकाल ली गई. जितनी जानकारी देश को कई बड़ी शख्सियतों के बारे में नहीं होगी, उससे ज्यादा लाला को देश ने जान लिया.

सबने जाना कि कैसे भिंडी बाजार में आकर बसा अदना-सा करीम अंडरवर्ल्ड का बादशाह बन गया? और कैसे 60 से 80 के दशक तक जिसके दरबार में महाराष्ट्र के बड़े-बड़े राजनेता माथा टेकते थे.

हाजी मस्तान से उसके रिश्तों के बारे में भी जाना और जाना कि कैसे करीम लाला के हाथों दाऊद इब्राहिम पिट गया था? कह सकते हैं कि पूरे 90 साल जीने के बाद 2002 में मर चुका पठान डॉन अचानक जिंदा हो उठा. ये सबकुछ संजय राउत के ‘बासी’ खुलासे और टीवी मीडिया के सौजन्य से हुआ. ग्रेट.
करीम लाला से मुलाकात क्यों?

तथ्य है कि करीम लाला अंरडवर्ल्ड डॉन था. तथ्य है कि एक जमाने में मुंबई और कई दूसरे इलाकों में सरकारी सिस्टम के समानान्तर उसका सिक्का (सत्ता भी कह सकते हैं) चलता था. लेकिन साथ ही यह भी सत्य है कि लाला के दरबार में नेताओं की हाजिरी लगती थी.

तो फिर सवाल सिर्फ इंदिरा गांधी और करीम लाला की मुलाकात पर ही क्यों? खासकर तब और भी, जब उन्हीं संजय राउत ने ये भी कहा है कि लाला बाकायदा दरबार लगाता था. लोगों की समस्याएं सुनता था. समस्याओं का निपटारा करता था.

राउत ये नहीं बता पाए कि इंदिरा गांधी डॉन करीम लाला से मिलती थीं या लोगों की शिकायतें निपटाने वाले करीम लाला से या दोनों से? हां, इस बात का इशारा राउत ने जरूर किया कि लाला और उस जैसे दूसरे अंडरवर्ल्ड डॉन राजनेताओं की मजबूरी क्यों थे?

सवाल तो बनता है. इंदिरा गांधी अगर डॉन करीम लाला से मिलती थीं, तो भी इस पर ऐतराज और सवाल बनता है. अगर वह कथित दयावान (क्योंकि कहते हैं कि करीम लोगों की समस्याएं भी निपटाता था) लाला से मिलती थीं, तो भी सवाल बनता है.

फडणवीस और दूसरे विरोधियों ने कई गंभीर सवाल उठाए भी हैं. लेकिन तब साथ ही सवाल ये भी है कि ये सब बातें करते हुए हम इतने मासूम और अनजान क्यों नजर आते हैं? क्यों ऐसा लगता है कि जैसे महाराष्ट्र की सत्तर से लेकर नब्बे के दशक और यहां तक कि उसके बाद की भी राजनीति के बारे में किसी को कुछ पता ही नहीं?

मुंबई के अंडरवर्ल्ड के साथ राजनीति और बॉलीवुड के रिश्तों पर कितनी ही किताबें लिखी जा चुकी हैं. न जाने कितनी फिल्में बन चुकी हैं.

सरकारों के फैसले पर लाला (अंडरवर्ल्ड) का असर!
महाराष्ट्र में सरकार के फैसलों पर अंडरवर्ल्ड के असर की बात कोई नई नहीं है. बयान से पलटने से पहले संजय राउत ने भी इस बात का जिक्र किया है. ऐसे में निश्चय ही कांग्रेस की अगुवाई वाली महाराष्ट्र की तमाम पूर्व सरकारों के फैसलों को लाला या दूसरे डॉन प्रभावित करते होंगे.

फिर भी इंदिरा गांधी जैसी शख्सियत का करीम लाला से मिलना चौंका सकता है. पर अगर पार्टी की सरकार पर किसी बाहरी ताकत (मसलन करीम लाला) का असर था, तो ये संभव ही है कि उसका (पार्टी का) मुखिया उस बाहरी ताकत से कभी-न-कभी मिला हो. या मिलता रहा हो.

अपराध-राजनीति के गठजोड़ पर ऐसा भी क्या चौंकना?
राजनीति सबसे ज्यादा बदनाम क्यों है? इस सवाल पर आपका शायद दो ही जवाब होगा. करप्शन और अपराध से रिश्ता. देश में प्रदेश बदलते जाइए. राजनीति में ये दो बातें आपको कॉमन मिलेंगी. कहीं ज्यादा, तो कहीं कम. इंदिरा गांधी का व्यक्तित्व और अंडरवर्ल्ड की खबरों से मिलने वाली टीआरपी.

टीवी मीडिया को फिर और क्या चाहिए? फिर क्या हुआ, हमने बखूबी देखा. गुरुवार सुबह राउत सुर्खियों में रहे. दोपहर होते-होते भारी दबाव में और शाम से पहले बयान वापसी के लिए मजबूर हो गए.

ऐसा हुआ क्योंकि देवेंद्र फडणवीस राउत के कथित खुलासे के हवाले से सवालों की लंबी फेहरिस्त लेकर आए, जबकि नए साथियों (कांग्रेस और एनसीपी) ने बांहें चढ़ा लीं. चेतावनियां तक दे दीं.

पत्रकार राउत, ताक में बैठा मीडिया!
संजय राउत पत्रकार रहे हैं. ‘सामना’ से जुड़कर अभी भी पत्रकार की पहचान बरकरार रखते हैं. मुंबई में लंबा समय बिताया है. राजनीति और अंडरवर्ल्ड के रिश्तों को करीब से देखा है. राउत शायद पत्रकारिता के अपने मोह नहीं त्याग पाए. अपने अनुभव को साझा कर दिया.

लेकिन पत्रकार हैं, तो राउत को ये भी पता होना था कि मौजूदा मीडिया को दायें-बायें से क्या मतलब? उसे तो वही दिखेगा, जो टीआरपी के पैमाने पर बिकेगा.

सोचिए. कितनी बिकाऊ पंक्ति है – इंदिरा गांधी अंडरवर्ल्ड डॉन करीम लाला से मिलती थीं ! लाला के साथ इंदिरा गांधी की एक ‘श्वेत-श्याम’ तस्वीर भी सामने आ गई.

इंदिरा गांधी की उपलब्धियों पर फिलहाल ये तस्वीर और खबर भारी है. जवाब कांग्रेस को देना है. मौजूदा राजनीति अपराध और अपराधियों की कितनी करीब है, चर्चा इस पर नहीं है. सवाल सिर्फ ये है कि क्या कांग्रेस अपराधियों के सहारे ही राजनीति करती रही है?

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