Opinion : ये जो दिल्ली का चुनाव है… गोली के कद्रदान हैं पर अच्छी बोली के नहीं

प्रधानमंत्री कई-कई बार ‘सबका साथ सबका विकास’ की बात कर चुके हैं. लेकिन कुछ महानुभावों ने इस सीख पर अमल करने की कभी नहीं सोची. उनकी राजनीति इसकी इजाजत भी नहीं देती.
Opinion This is Delhi assembly election, Opinion : ये जो दिल्ली का चुनाव है… गोली के कद्रदान हैं पर अच्छी बोली के नहीं

पहले जामिया में गोली चली, फिर शाहीन बाग में और अब फिर से जामिया में. पहले गोली चलाने वाले दोनों ही लड़के कोई पेशेवर अपराधी नहीं हैं. उनके नाम कोई पुराना अपराध का रिकॉर्ड नहीं है. अब दोनों ही अपराधी हैं और भारत के भविष्य भी. एक नाबालिग है जबकि दूसरा भी महज 25 साल का. रविवार रात को हुई तीसरी घटना में उन दो स्कूटी सवारों की तलाश है, जो फायरिंग कर भाग निकले. इस तीसरी घटना को अंजाम देने वालों की सोच भी पहले दो से अलग होगी, ऐसा लगता नहीं.

शाहीन बाग में फायरिंग करने वाला कपिल कहता है कि इस देश में सिर्फ हिन्दुओं की चलेगी, किसी और की नहीं. जामिया में गोली चलाने वाला नाबालिग भगवान राम की भक्ति के लिए नहीं, बल्कि हिंसक भावावेश के साथ ‘जय श्री राम’ के नारे लगाता है. नागरिकता कानून के विरोधियों को गोली मारकर ‘आजाद’ कर देने की बात करता है.

राजनीति के ये कायल करने वाले मासूम सवाल

हर गोलीकांड के बाद राजनीतिक दल सवाल पूछते हैं कि इनके पीछे कौन है? पूछने का आशय ये होता है कि इन सिरफिरे हाथों में कट्टा-पिस्टल किसने थमाया? ठीक ऐसे ही सवाल तब भी पूछे जाते हैं, जब शरजील सरीखा कोई शख्स देश के खिलाफ नारे लगाता है. तब भी दूसरी राजनीतिक जमात सवाल पूछती है कि ऐसे नारों के पीछे कौन है? ये सवाल जितने मासूम दिखते हैं, उतने होते नहीं. सवाल पूछते हुए जुबां पर चिंता होती है, लेकिन दिमाग में शरारत. सवाल पूछते हुए राजनीतिक लाभ की कामना अधिक होती है, हालात को संभालने की कोशिश बेहद कम.

Opinion This is Delhi assembly election, Opinion : ये जो दिल्ली का चुनाव है… गोली के कद्रदान हैं पर अच्छी बोली के नहीं

हमारे राजनीतिक दल इतने टुच्चे काम नहीं करते !

फिजूल की बातें हैं. गलत आरोप हैं. जामिया के गोलीबाज को किसी ने कट्टा नहीं थमाया. शाहीन बाग के सिरफिरे को भी किसी ने हथियार नहीं दिया. शरजील को भी किसी राजनीतिक दल ने एएमयू में दिया उसका भाषण लिखकर नहीं दिया. मुंबई के आजाद मैदान में शरजील के समर्थन में नारे किसी राजनीतिक खेमे ने नहीं लगवाए. हमारे राजनीतिक दल और नेता इतनी टुच्ची बातें और काम नहीं करते. वे तो एक साथ लाखों लोगों पर असर डालने वाले प्रपंच करते हैं. फिर उसी असर में कोई शरजील देश विरोधी नारे लगाता है, तो कोई सिरफिरा (वस्तुत: बेचारा) शाहीन बाग या जामिया में कट्टा लहराता है.

बेअसर राजनीति और राजनेता

प्रधानमंत्री कई-कई बार ‘सबका साथ सबका विकास’ की बात कर चुके हैं. लेकिन कुछ महानुभावों ने इस सीख पर अमल करने की कभी नहीं सोची. उनकी राजनीति इसकी इजाजत भी नहीं देती. गौर कीजिए. जामिया और शाहीन बाग में गोली चलाने वालों की भाषा वही है, जो ऐसे चुनिंदा महानुभावों की होती है. यह सिर्फ एक संयोग नहीं है. एक गंभीर संकेत है. और बड़ी चिंता की बात भी.

एक केंद्रीय मंत्री भीड़ को गद्दार की परिभाषा तय करने की इजाजत देते हैं. गद्दार को गोली मारने की हिदायत भी देते हैं. तीन दिन बाद ही भीड़ में से एक शख्स सामने आता है और गोली मार देता है. यूपी के सीएम उपद्रवियों को ‘ऑन द स्पॉट’ गोली मार देने की अपने सरकार की खासियत बताई. एक और शख्स सामने आया और गोली चला दी.

यहां ‘गोली’ के कद्रदान कई हैं… ‘अच्छी बोली’ कहां बिकती है !

सैल्यूट कीजिए एक और केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी को. ‘गोली’ की जगह ‘बोली’ को तरजीह देने का साहसी बयान दिया. लेकिन यहां भी गड़बड़ी हो गई. नकवी की बातें मीडिया के नक्कारखाने में तूती की आवाज की तरह गुम हो गई. गोली वाली बोली का कायल मीडिया, नकवी की अच्छी बातों से प्रभावित नहीं हुआ. क्योंकि मीडिया की सोच है कि अच्छी जुबान का कोई ‘खरीदार’ (टीआरपी पढ़ें) नहीं है.

शांति का ‘हे राम’ बनाम ‘जय श्री राम’ का भावावेश

जामिया में गोलीकांड वाले दिन बापू की शहादत का दिन था. 30 जनवरी. वतन पर जान कुर्बान करते हुए बापू ने ‘हे राम’ कहा था. जान लेने की कोशिश करते हुए उस सिरफिरे ने ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाए. जुबां पर दोनों बार ‘राम’ ही थे. बस भाव का फर्क था. भाव का यही फर्क शांति का संदेश भी देता है और हिंसा का आदेश भी. उस दिन देश बापू के सिद्धांतों और मूल्यों की उतनी चर्चा नहीं कर रहा था, जितनी उस हिंसक नाबालिग की बातें हो रही थीं. मीडिया के लिए एक सिरफिरा ही इस 30 जनवरी 2020 की सबसे बड़ी खबर था. देश बदल रहा है. देश बढ़ रहा है. मगर किधर?

इस गुनाह में हम सब हिस्सेदार?

जामिया में गोली चलाने वाला नाबालिग है. हल्के-फुल्के दंड के साथ बच भी जाएगा. बालिग भी होता, तो क्या फर्क पड़ जाता? हमारा सिस्टम थोड़ी बड़ी सजा दे देता. हत्या की कोशिश का मामला भी बन सकता था. लेकिन इससे क्या बदल जाता? एक सिरफिरे ने गोली चला दी, पता नहीं ऐसे कितने इन दिनों ताक में बैठे हैं. किस-किस को रोकेंगे? रोकना क्या, उल्टे हम ही तो ऐसे सिरफिरों को समर्थन का खाद-पानी देकर सींच रहे हैं. तभी तो जामिया के बाद शाहीन बाग में वही कहानी दोहरा दी गई. और फिर से जामिया में तीसरी घटना हो गई. सोशल मीडिया पर नजर दौड़ा लीजिए. बुरी-से-बुरी घटनाओं, करतूतों और बातों के समर्थन में हजारों खड़े हैं. कई बार तो लाखों.

फिर सवाल क्यों न पूछा जाए कि जामिया में प्रदर्शन के बीच ‘जय श्रीराम’ के नारे के साथ फायरिंग करने वाला दोषी है, तो वे लोग क्यों नहीं, जिनकी बातों से अपना ब्रेन वॉश कराकर वह कट्टा लेकर सड़क पर तांडव करने लगा? शाहीन बाग में भारतवर्ष को सिर्फ हिन्दुओं का बताकर गोली चलाने वाला दोषी है, तो वे लोग क्यों नहीं, जो भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की बातें कर समाज के एक हिस्से को बरगलाते हैं. बराबर के दोषी वे लोग भी क्यों नहीं, जो इन घटनाओं का समर्थन या बचाव कर रहे हैं?

Opinion This is Delhi assembly election, Opinion : ये जो दिल्ली का चुनाव है… गोली के कद्रदान हैं पर अच्छी बोली के नहीं

पढ़ा-लिखा शरजील हो या अदना-से ये सिरफिरे

गोली चलाने वाला एक नाबालिग है. जबकि दूसरा 25 साल का. जामिया कांड करने वाला नाबालिग पढ़ने-लिखने में भी बेहद साधारण बताया जाता है. अपनी हरकतों और हाव-भाव से अल्प समझ वाला भी लगता है. जबकि शाहीन बाग में गोली चलाने वाले 25 साल के कपिल को जानने वाले उसे बेहद जिम्मेदार और समझदार इंसान बताते हैं. लेकिन दोनों में कुछ बातें एक जैसी दिखती हैं. दोनों ही प्रचार का भूखा हो सकता है. वह कुंठित या भ्रम का शिकार हो सकता है.

शरजील के साथ तो ऐसी कोई बात भी नहीं थी. वह क्यों देश के खिलाफ बहक गया? तस्वीर बिल्कुल साफ है और भयावह भी. हदें पार करने की वजहें बड़ी प्रभावी हैं. इतनी प्रभावी कि वह जामिया नगर में आ धमके एक अल्प समझ से नाबालिग से लेकर आईआईटियन, जेएनयू स्कॉलर और अमेरिका में अच्छी-खासी नौकरी करके लौटे शख्स को भी भटका सकती हैं. क्योंकि इसी भटकाव के मैदान में अकसर राजनीति की फसल लहलहाती है.

ये जो दिल्ली का चुनाव …

दिल्ली के चुनाव में पाकिस्तानी मंत्री की अपील है. भारत और पाकिस्तान में से एक को चुनने की पेशकश है. गद्दार होने का लांछन है. देशद्रोह के आरोप हैं. देश के टुकड़े करने की बातें हैं. गोली मारने का आदेश है. आदेश का ‘स्वत:स्फूर्त पालन’ भी है. और इन सबका केंद्र एक अकेला शाहीन बाग है. क्या हम (वोटर) वाकई इतने नादान हैं?

ये भी पढ़ें –

संसद शुरू होते ही गूंजा CAA-NRC-NPR का मुद्दा, शाहीन बाग और जामिया पर भी हो रहा हंगामा

Delhi Assembly election: कपिल मिश्रा ने कहा, ‘AAP का नया नाम होना चाहिए मुस्लिम लीग’

Related Posts