एनआरसी जैसा नहीं होगा नागरिकता संशोधन बिल का हश्र, जागरूकता के लिए संघ की वेबसाइट तैयार

एनआरसी की गलतियों से सबक लेते हुए संघ इस बात का पुख्ता इंतजाम करेगा कि नागरिकता संशोधन बिल (कैब) लागू होने के क्रम में इसबार एक भी हिन्दू का नाम रजिस्टर से छूटने ना पाए.

संसद में नागरिकता संशोधन बिल पास होने से पहले ही आरएसएस ने इसको सफलता पूर्वक लागू कराने और इन बावत आमलोगों की भागीदारी सुनिश्चित कराने की कोशिश तेज कर दी है.

नागरिकता संशोधन बिल (सिटीजन अमेंडमेंट बिल) सफल बनाने के लिए आरएसएस ने पूरी तैयारी के साथ देश की जनता के सामने पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में रह रहे माइनॉरिटी यानी हिन्दुओं की दुर्दशा पर पूरी जानकारी देने और सिटीजन अमेंडमेंट बिल के बारे में विस्तृत रिपोर्ट हेतु एक वेबसाइट तैयार करवाई है.
www.cab.getfacts.in नामक इस वेबसाइट के जरिये तीनों देशों में रह रहे हिंदुओं की दशा और 1971 में बांग्लादेश के निर्माण के साथ ही भारत आये हिंदुओं की मुकम्मल जानकारी उपलब्ध होगी.

आरएसएस से जुड़े सूत्रों के मुताबिक एनआरसी की गलतियों से सबक लेते हुए संघ इस बात का पुख्ता इंतजाम करेगा कि नागरिकता संशोधन बिल (कैब) लागू होने के क्रम में इसबार एक भी हिन्दू का नाम रजिस्टर से छूटने ना पाए और कोई त्रुटि ना रह जाए. संघ कहता है कि ये हमारे लिए राजनीतिक नहीं बल्कि भावनात्मक मुद्दा है.

संघ का मानना है कि सिटीजन अमेंडमेंट बिल का समर्थन बीजेपी विरोधी दल भी करेंगे और ये आसानी से संसद के दोनों सदन में पास हो जाएगा. विधेयक के ड्राफ्ट में धार्मिक उत्पीड़न की वजह से पड़ोसी देशों से 31 अगस्त 2014 से पहले के आये सभी गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का प्रावधान है.

Tv9 भारतवर्ष को संघ के एक वरिष्ठ अखिल भारतीय अधिकारी ने बताया कि संघ को ये भरोसा है कि नए बिल (कैब) के जरिये आजादी के बाद से ही अल्पसंख्यक होने का दंश झेल रहे लगभग 2.5 से 3 करोड़ हिंदु, सिख, बौद्ध, जैन, क्रिस्चियन आदि को एक पहचान मिल जाएगी. संघ का मानना है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान से आये ऐसे माइनॉरिटीज को पहली बार न्याय मिलने जा रहा है.

संघ के मुताबिक जिस दिन हमें अंग्रेजों से आजादी मिली, उसी दिन पाकिस्तान और बांग्लादेश में रह रहे हिंदुओं की गुलामी के दिन शुरू हो गए थे. उनको हमने कोई विकल्प ही नहीं दिया, कि वो हिंदुस्तान आना चाहते हैं या नहीं. आखिरकार उनकी क्या गलती थी?

संघ सूत्र का कहना है कि पाकिस्तान में रह रहे ज्यादातर हिंदुओं की हालत ठीक नहीं है. फिलहाल वहां 80 लाख हिन्दू हैं जिनमें से अधिकतर दलित वर्ग के हैं उनमे से 65 लाख तो सफाई कर्मचारी हैं. वहीं बांग्लादेश में करीब 1.7 करोड़ हिन्दू हैं जिनमे से 70% दलित वर्ग के नामशूद्र हैं.

आजादी के वक़्त बांग्लादेश में 1.35 करोड़ हिन्दू थे जो 72 साल बाद भी 1.7 करोड़ हैं यानी उनकी संख्या में वृद्धि नाममात्र ही हुई. आरएसएस मानता है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश में जो ईसाई भी हैं वो ज्यादातर हिन्दू ही कन्वर्ट हुए हैं.

1971 में बांग्लादेश बनने के बाद करीब 1 करोड़ हिन्दू भारत आये थे. जिन्हें नागरिकता देने के मोरल और कांस्टीट्यूटीनल जिम्मेदारी से हम बच नहीं सकते. अब जाकर उस एतिहासिक गलती को सुधार करने का वक़्त आया है. हम अपने उस जिम्मेदारी से बच नहीं सकते हैं.

बांग्लादेश से भारत आकर गैरकानूनी ढंग से रह रहे मुसलमानों के मुद्दे पर संघ का कहना है, दुबई एक मुस्लिम देश है पर वहां कोई भी दूसरे मुल्क से जाकर नागरिकता नहीं हासिल कर सकता. आप वहां रह सकते हैं, काम भी कर सकते हैं पर नागरिक नहीं बन सकते.

आरएसएस सूत्रों का कहना है कि अरब गणराज्य के दुबई में 30 लाख विदेशी रहते हैं, जिनमें से 15 लाख तो भारतीय ही हैं. वहां दो पीढ़ियों से रह रहे विदेशियों को भी अबतक नागरिकता नहीं मिली है. चाहे वो मुस्लिम ही क्यों ना हो. संघ मानता है कि आप वर्क परमिट दीजिये, परंतु ऐसे इलिगल माइग्रेंट्स को नागरिकता कैसे दे सकते हैं. जो भी मुस्लिम कागजी कार्यवाही करके आएंगे उसमें उन्हें कोई आपत्ति नहीं है.

आरएसएस सूत्र बताते हैं कि कैब के जरिये केंद्र सरकार बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आये लोगों को अपना नाम भारत की नागरिकता सूची में जुड़वाने के लिए पर्याप्त समय देगी, सम्भवतः 6 महीने की समय सीमा होगी. साथ ही नाम जुड़वाने के प्रोसेस को आसान रखा जाएगा, ताकि किसी को कोई ज्यादा दिक्कत ना हो.

आरएसएस का मानना है कि बांग्लादेशी हिंदुओं को नागरिकता देने के बाद असम की डेमोग्राफी खराब होने जैसा भ्रामक प्रचार जानबूझकर किया जा रहा है. जबकि असम में बाहर से आकर बसे 31 लाख लोगों में से महज 3 लाख ही बंगाली हिन्दू हैं. उसमें से भी ज्यादातर गुवाहाटी में नहीं बल्कि सिलहट में रहते हैं और उनका बेटी-रोटी का रिश्ता सैकड़ों साल पुराना है. संघ के मुताबिक 1971 के बाद लगभग 99 लाख बंगाली हिन्दुओं को रिहैबिलिटेट किया गया, जिनमें से 92 लाख को बंगाल में और सिर्फ 3 लाख हिंदुओं को ही असम में रखा गया फिर डेमोग्राफी बिगड़ने का प्रश्न कहाँ से पैदा होता है ?

रोहिंग्या के मुद्दे पर आरएसएस का मानना है कि ये लोग बंगाली मुसलमान हैं, जो सैकड़ों साल पहले मूलतः बांग्लादेश के चटगांव से गये म्यांमार गए थे. रोहिंग्या द्वितीय विश्वयुद्ध के समय अंग्रेजों के साथ काम कर रहे थे और म्यांमार में वो रखाइन मुस्लिम स्टेट की स्थापना करना चाहते थे. कालांतर में उन्होंने आतंकवादी संगठनों के साथ मिलकर काम शुरू किया और हाफिज सईद के संगठन ने उन्हें ट्रेनिंग दी. वो कभी भी भारत में रिफ्यूजी बनकर नहीं आये. उन्हें रेफ्यूजी बनकर जाना होता तो बांग्लादेश जाते पर वो वहां कम गए करीब 6 लाख आज भी चटगांव में हैं. रोहिंग्या मुसलमानों के मंशा में शंका जताते हुए संघ प्रश्न खड़ा करता है कि आखिरकार 40 हजार की उनकी आबादी पूरे देश को छोड़ते हुए जम्मू में जाकर कैसे बस गए ?

आरएसएस का मानना है कि कैब को एनआरसी से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा. क्योंकि दोनों का कारण और मकसद अलग-अलग हैं। एनआरसी में इतर पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के लोग भी आएंगे. उदाहरण के तौर पर संघ के उच्चपदस्थ सूत्र बताते हैं कि अभी पिछले कुछ सालों में मालदीव के लोग कर्नाटक और केरल में आकर धड़ले से जमीन खरीद रहे हैं, उन्हें डर है कि समंदर के बढ़ते जलस्तर के क्रम में सबसे पहले मालदीव ही डूबेगा. ऐसी ही कुछ सूचनाएं श्रीलंका के लोगों द्वारा दक्षिण भारत में जमीन खरीदने की भी मिल रही है.

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