पुलवामा के शहीदों की जाति और धर्म बताने का मकसद क्या है?

जवानों की मौत को उनकी जाति से जोड़ना कैसे जायज हो सकता है! एक अंग्रेजी पत्रिका में छपी रिपोर्ट के मुताबिक पुलवामा हमले के बाद सड़कों पर उतरे लोग शहर में रहने वाले ऊंची जाति के हिंदू राष्ट्रवादी हैं. जो ऐशोआराम की जिंदगी बिताते हैं, जिनके बच्चे कभी सेना की नौकरी नहीं करते.

क्या देश के लिए जान देने वालों शहीदों की भी कोई जाति होती है? क्या आतंक के खिलाफ जंग में प्राणों की आहुति देने वाले जवानों का भी कोई धर्म होता है? क्या जवानों की जाति और धर्म के नाम पर भी राजनीति हो सकती है?

आप सोच रहे होंगे ये कैसा सवाल है. जी हां, जिन सवालों को पढ़कर आप परेशान हो रहे हैं वो आज का सबसे शर्मनाक सच बन चुका है. जब पूरा देश पुलवामा हमले के आक्रोश में जल रहा है. 40 जवानों की शहादत पर जब हिंदुस्तान एक सुर में पाकिस्तान से बदले की मांग कर रहा है. भारत में एक तबका ऐसा है जो देश को जाति और धर्म पर बांटने की साजिश कर रहा है.

जवानों की मौत को उनकी जाति से जोड़ना कैसे जायज हो सकता है! एक अंग्रेजी पत्रिका में छपी रिपोर्ट के मुताबिक पुलवामा हमले के बाद सड़कों पर उतरे लोग शहर में रहने वाले ऊंची जाति के हिंदू राष्ट्रवादी हैं. जो ऐशोआराम की जिंदगी बिताते हैं, जिनके बच्चे कभी सेना की नौकरी नहीं करते.

इस रिपोर्ट में लिखा है कि सेना या अर्घसैनिक बलों में ज्यादातर वो लोग भर्ती होते हैं जो अभावग्रस्त हैं, जिनके पास सामाजिक सुरक्षा के कोई साधन नहीं हैं और मजबूरी में वो अपनी जान जोखिम में डालने को तैयार हो जाते हैं.

फौज की नौकरी की तुलना गटर की सफाई से

पुलवामा आतंकी हमले में शहीद जिन जवानों की जाति का पता नहीं चल सका उन शहीदों के परिवार वालों को फोन किया. उनसे उनकी जाति पूछी. बयान तक लिए. पूछा- सीआरपीएफ में भर्ती होने की मजबूरी क्या थी? क्या दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियों के पास कोई और चारा नहीं होता? पंजाब के एक शहीद के भाई के हवाले से फौज की नौकरी की तुलना गटर की सफाई से कर दी. एक दलित कार्यकर्ता के हवाले से लिख दिया कि सीआरपीएफ में मौजूद आरक्षण की वजह से बड़ी तादाद में पिछड़े और दलितों को नौकरी मिल जाती है. लिहाजा शहीदों में भी ज्यादातार वो ही शुमार होते हैं.

एक के बाद एक चौंकाने वाली दलील से रिपोर्टर ने सिर्फ ये साबित करने की कोशिश की कि जवानों की मौत पर पाकिस्तान से बदले की मांग करने वाले सारे लोग हिंदू राष्ट्रवादी हैं. जो सिर्फ और सिर्फ देशभक्ति का हौवा खड़ा करने वाली ऊंची जाति के लोगों की भीड़ होती है. समाजवादी पार्टी के एक प्रवक्ता के हवाले से रिपोर्ट में लिखा गया कि टीवी स्टूडियो में सीना ठोक-ठोक कर दी जाने वाली युद्ध की चुनौतियों के बीच ये सच्चाई छिप जाती है कि देश की सुरक्षा में मरने वाला गरीब और निचले तबके का ही होता है. गुरुनानक यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर के हवाले से बीजेपी पर निशाना साधा. लिखा, बीजेपी की राजनीति दलितों को रास नहीं आती. इसलिए पार्टी हिन्दू राष्ट्रवाद का सहारा लेती है. जानबूझ कर बनाए राष्ट्रवाद का माहौल खड़ा किया जाता है जिससे सभी जाति, वर्ग और धर्म के लोगों को साथ लाने में कामयाबी मिल जाती है.

इस रिपोर्ट ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है. सोशल मीडिया पर इसकी भारी भर्त्सना हो रही है. लोग हैरान हैं. पत्रिका के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग हो रही है. रिटायर्ड मेजर नवदीप सिंह ने मूर्खतापूर्ण रिपोर्ट बताया. उनकी ट्विटर पर छिड़ी बहस में कई लोगों ने इसे देश को बांटने की साजिश बताया.

आपको याद होगा समाजवादी पार्टी  के नेता आजम खान ने भी एक बार करगिल युद्ध में भारतीय सेना की जीत को धर्म से जोड़ने की कोशिश की थी. कहा, भारत को हिंदू नहीं, मुस्लिम सैनिकों ने दिलाई थी. पूरा देश विरोध में उठ खड़ा हुआ. आजम खान के बयान की तीखी आलोचना हुई. लेकिन इस बार एक पत्रिका ने शहीदों को उनकी जाति से जोड़ने की कोशिश की है. हिंदू राष्ट्रवाद को टारगेट करने के लिए शहीदों का इस्तेमाल किया गया. जवानों को पिछड़ी जाति से जोड़ा. पाकिस्तान के खिलाफ बोलने वालों को अगड़ी जाति का बता दिया. ये देश को जाति और धर्म के आधार पर बांटने की नापाक कोशिश नहीं है तो क्या है?

(ये लेखक के निजी विचार हैं. )

 

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