राजीव गांधी के रबर स्टांप पेरी शास्त्री और कश्मीर चुनाव, अमित शाह ने किया जिक्र तो मचा हंगामा

एनसी और कांग्रेस के कई बड़े नेता जो काफी वोटों से पीछे चल रहे थे, अचानक विजयी घोषित कर दिए गए. फारूक अब्दुल्ला तब चीफ मिनिस्टर थे और राजीव गांधी उन्हें सपोर्ट कर रहे थे. विपक्षी दलों ने रिटर्निंग ऑफिसर से लेकर अदालत तक का दरवाजा खटखटाया लेकिन...

दो दिन के कश्मीर दौरे के बाद गृह मंत्री अमित शाह जब शुक्रवार को लोकसभा में आए तो फोकस कश्मीर पर ही था. पहले जवाहर लाल नेहरू की कश्मीर नीति पर सवाल उठाने के बाद अमित शाह ने कांग्रेस पर जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र की हत्या का आरोप लगाया. वो 1987 के विधानसभा चुनाव का जिक्र कर रहे थे.

उन्होंने कहा, अब नेहरू का नाम नहीं लूंगा. जम्मू कश्मीर में फर्जी चुनाव कराये गए. जम्मू कश्मीर में लोकतंत्र की ह्त्या की गयी. हमारे समय में चुनाव आयोग के फैसले आयोग ही करता है. कांग्रेस के समय में कांग्रेस करती थी. चुनाव में केंद्र का कोई दखल नहीं है.

जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन बढ़ाने के प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान अमित शाह और कांग्रेसी नेताओं के बीच जम कर नोंक-झोंक हुई.

अब ये जानना जरूरी है कि 1987 के चुनाव में हुआ क्या था. उस समय मुस्लिम यूनाईटेड फ्रंट (MUF) नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस के बीच मुख्य मुकाबला था. एमयूएफ का नेता मोहम्मद यूसुफ शाह था. ये कई धार्मिक संगठनों को मिलाकर बना था.

तब चुनाव आयुक्त थे आरवीएस पेरी शास्त्री. इन्हीं की देख रेख में 23 मार्च, 1987 के दिन जम्मू-कश्मीर में चुनाव कराया गया. घाटी में लगभग 70 फीसदी से ज्यादा लोगों ने मताधिकार का प्रयोग किया. लेकिन काउंटिंग वाले दिन बवाल मच गया. एमयूएफ ने भारी पैमाने पर गड़बड़ी की शिकायत की.

राजीव के रबर स्टांप थे चुनाव आयुक्त 

एनसी और कांग्रेस के कई बड़े नेता जो काफी वोटों से पीछे चल रहे थे, अचानक विजयी घोषित कर दिए गए. फारूक अब्दुल्ला तब चीफ मिनिस्टर थे और राजीव गांधी उन्हें सपोर्ट कर रहे थे. विपक्षी दलों ने रिटर्निंग ऑफिसर से लेकर अदालत तक का दरवाजा खटखटाया लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला.

एनसी ने 40 सीटें जीती. कांग्रेस के खाते में 26 सीटें आई. एमयूएफ को चार सीटों से संतोष करना पड़ा. फारूक अब्दुल्ला फिर सीएम बने लेकिन कश्मीर आतंकवाद की खाई में चला गया. मोहम्मद यूसुफ शाह ही सैयद सलाउद्दीन बन कर पाकिस्तान चला गया जो अब भी भारत के खिलाफ जेहाद चला रहा है. उसका मुख्य पोलिंग अधिकारी यासिन मलिक जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट का नेता बना जिसने 1988 में पहली बार श्रीनगर में बम फेंका.

आरवीएस पेरी शास्त्री पर राजीव गांधी का रबर स्टांप बने रहने के आरोप लगे. वो चुनाव में धांधली और काउंटिंग में गड़बड़ी रोकने में नाकाम रहे.

जब उन्होंने स्वतंत्र फैसले लेने की कोशिश की तो राजीव गांधी ने दो और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की. इनमें से एक थे एसएस धनोआ जो बिहार पब्लिक सर्विस कमीशन के चेयरमैन थे. उन्हें अचानक दिल्ली बुलाया गया. 16 अक्टूबर, 1989 के दिन जब वो ज्वाइन करने आयोग के दफ्तर गए तो पेरी शास्त्री ने कहा कि उन्हें दो और आयुक्तों की नियुक्ति का ऑर्डर ही नहीं मिला.

यही नहीं राजीव गांधी के प्रधान सचिव बीजी देशमुख भी उनके साथ आए. उन्होंने पेरी शास्त्री को कहा कि लोकसभा चुनाव 22 नवंबर से कराए जाएं. जब पेरी शास्त्री ने कहा कि ये काम आय़ोग का है तो उन्हें बताया गया कि राजीव गांधी पहले ही सार्वजनिक कर चुके हैं कि चुनाव 22 नवंबर से होंगे.

इस तथ्य का जिक्र खुद धनोआ ने हिंदुस्तान टाइम्स में छपे एक आर्टिकल में किया है.