भारतीय कानून में ‘एनकाउंटर’ शब्द का ज़िक्र नहीं, पुलिस को कब है किसी अपराधी को मारने का अधिकार?

केवल दो ही हालात में इस तरह की मौत को अपराध नहीं माना जा सकता. पहला- अगर आत्मरक्षा (Self-defense) की कोशिश में दूसरे व्यक्ति की मौत हो जाए. दूसरा- CrPC की धारा 46 पुलिस को बल प्रयोग करने का अधिकार (Right to use Force) देती है.
encounter in indian law, भारतीय कानून में ‘एनकाउंटर’ शब्द का ज़िक्र नहीं, पुलिस को कब है किसी अपराधी को मारने का अधिकार?

भारतीय संविधान के में ‘एनकाउंटर’ शब्द का कहीं भी ज़िक्र नहीं है. पुलिस कि भाषा में इसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब सुरक्षाबल/पुलिस और चरमपंथी/अपराधियों के बीच हुई मुठभेड़ में चरमपंथियों या अपराधियों की मौत हो जाती है. भारतीय कानून में वैसे कहीं भी एनकाउंटर को वैध नहीं ठहराया गया है, लेकिन कुछ ऐसे नियम-कानून ज़रूर हैं जो पुलिस को यह ताकत देते हैं कि वह अपराधियों पर हमला कर सकती है और उस दौरान अपराधियों की हुई मौत को सही ठहराया जा सकता है.

क्या कहती है CrPC की धारा 46

आम तौर पर लगभग सभी तरह के एनकाउंटर्स में पुलिस आत्मरक्षा के दौरान हुई कार्रवाई का ही ज़िक्र करती है. आपराधिक संहिता (Criminal Code) यानी CrPC की धारा 46 कहती है कि अगर कोई अपराधी खुद को गिरफ्तार होने से बचाने की कोशिश करता है या पुलिस की गिरफ्त से भागने की कोशिश करता है या पुलिस पर हमला करता है, तो इन हालात में पुलिस उस अपराधी पर जवाबी हमला कर सकती है. सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले पर अपने नियम-कानून बनाए हुए हैं.

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एनकाउंटर पर सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश

एनकाउंटर के दौरान हुई हत्याओं को ‘एकस्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग’ भी कहा जाता है. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में कहा है कि इसके लिए पुलिस तय किए गए नियमों का ही पालन करे.

23 सितंबर 2014 को भारत के तत्कालीन चीफ जस्टिस आर एम लोढ़ा और जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन की बेंच ने एक फैसले के दौरान एनकाउंटर का जिक्र किया. इस बेंच ने अपने फैसले में लिखा था कि पुलिस एनकाउंटर के दौरान हुई मौत की निष्पक्ष, प्रभावी और स्वतंत्र जांच के लिए इन नियमों का पालन किया जाना चाहिए. उस फैसले की मुख्य बातें इस प्रकार हैं-

  • जब कभी भी पुलिस को किसी तरह की आपराधिक गतिविधि (Criminal Activity) की सूचना मिलती है, तो वह या तो लिखित में हो जो विशेष रूप से केस डायरी की शक्ल में या फिर किसी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम के जरिए हो.
  • अगर कोई भी आपराधिक गतिविधि की सूचना मिलती है या फिर पुलिस की तरफ से किसी तरह की गोलीबारी की जानकारी मिलती है और उसमें किसी की मृत्यु की सूचना आए, तो इस पर तुरंत धारा 157 के तहत कोर्ट में FIR दर्ज करनी चाहिए. इसमें किसी भी तरह की देरी नहीं होनी चाहिए.
  • इस पूरे घटनाक्रम की एक स्वतंत्र जांच CID से या दूसरे पुलिस स्टेशन की टीम से करवानी जरूरी है, जिसकी निगरानी एक सीनियर पुलिस ऑफिसर करेंगे. इस सीनियर पुलिस ऑफिसर को उस एनकाउंटर में शामिल सबसे बड़े ऑफिसर से एक रैंक ऊपर होना चाहिए.
  • धारा 176 के तहत पुलिस फायरिंग में हुई हर एक मौत की मजिस्ट्रियल जांच होनी चाहिए. इसकी एक रिपोर्ट न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास भेजना भी जरूरी है.
  • जब तक स्वतंत्र जांच में किसी तरह का शक पैदा नहीं हो जाता, तब तक NHRC को जांच में शामिल करना जरूरी नहीं है. हालांकि घटनाक्रम की पूरी जानकारी बिना देरी किए NHRC या राज्य के मानवाधिकार आयोग के पास भेजना जरूरी है.

कोर्ट का आदेश है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत किसी भी तरह के एनकाउंटर में इन तमाम नियमों का पालन होना जरूरी है. अनुच्छेद 141 भारत के सुप्रीम कोर्ट को कोई नियम या कानून बनाने की ताकत देता है.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देश

मार्च 1997 में तत्कालीन NHRC के अध्यक्ष जस्टिस एमएन वेंकटचलैया (MN Venkatachaliah) ने सभी मुख्यमंत्रियों को एक पत्र लिखा था. उसमें उन्होंने लिखा था कि आयोग को कई जगहों से और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) से लगातार ये शिकायतें मिल रही हैं कि पुलिस के जरिए फर्जी एनकाउंटर लगातार बढ़ रहे हैं. साथ ही पुलिस अभियुक्तों को तय नियमों के आधार पर दोषी साबित करने की जगह उन्हें मारने को महत्व दे रही है.

पुलिस को कब है किसी अपराधी को मारने का अधिकार

जस्टिस वेंकटचलैया साल 1993-94 में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे. उन्होंने लिखा था कि हमारे कानून में पुलिस को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी व्यक्ति को मार दे और जब तक यह साबित नहीं हो जाता कि उन्होंने कानून के तहत किसी को मारा है, तब तक वह हत्या मानी जाएगी.

ऐसे में केवल दो ही हालात में इस तरह की मौत को अपराध नहीं माना जा सकता. पहला- अगर आत्मरक्षा की कोशिश में दूसरे व्यक्ति की मौत हो जाए. दूसरा- CrPC की धारा 46 पुलिस को बल प्रयोग करने का अधिकार (Right to use Force) देती है. इस दौरान किसी ऐसे अपराधी को गिरफ्तार करने की कोशिश, जिसने वह अपराध किया हो जिसके लिए उसे मौत की सजा या आजीवन कारावास की सजा मिल सकती है, इस कोशिश में अपराधी की मौत हो जाए.

पुलिस एनकाउंटर में हुई मौत के लिए तय नियम

NHRC ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह निर्देश दिया है कि वह पुलिस एनकाउंटर में हुई मौत के लिए तय नियमों का पालन करे. वे नियम इस प्रकार हैं-

  • जब किसी पुलिस स्टेशन के इंचार्ज को किसी पुलिस एनकाउंटर की जानकारी मिले तो वह इसे तुरंत रजिस्टर में दर्ज करे.
  • जैसे ही किसी तरह के एनकाउंटर की सूचना मिले और फिर उस पर किसी तरह की आशंका जाहिर की जाए तो उसकी जांच करना जरूरी है. जांच दूसरे पुलिस स्टेशन की टीम या राज्य की CID के जरिए होनी चाहिए.
  • अगर जांच में पुलिस अधिकारी दोषी पाए जाते हैं तो मारे गए लोगों के परिजनों को उचित मुआवजा मिलना चाहिए.

NHRC ने जोड़े कुछ और नियम

12 मई 2010 को भी NHRC के तत्कालीन अध्यक्ष जस्टिस जीपी माथुर (GP Mathur) ने कहा था कि पुलिस को किसी की जान लेने का अधिकार नहीं है. अपने इस नोट में NHRC ने यह भी कहा था कि बहुत से राज्यों में उनके बनाए नियमों का पालन नहीं होता है. इसके बाद NHRC ने इसमें कुछ और दिशा-निर्देश जोड़ दिए थे-

जब कभी पुलिस पर किसी तरह के गैर-इरादतन (बिना इरादे के) हत्या के आरोप लगे, तो उसके खिलाफ IPC के तहत मामला दर्ज होना चाहिए. घटना में मारे गए लोगों की तीन महीने के भीतर मजिस्ट्रेट जांच होनी चाहिए.

राज्य में पुलिस की कार्रवाई के दौरान हुई मौत के सभी मामलों की रिपोर्ट 48 घंटे के भीतर NHRC को सौंपनी चाहिए. इसके तीन महीने बाद पुलिस को आयोग के पास एक रिपोर्ट भेजनी जरूरी है जिसमें घटना की पूरी जानकारी, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, जांच रिपोर्ट और मजिस्ट्रेट जांच की रिपोर्ट शामिल होनी चाहिए.

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