आयुध पूजा क्‍या है? जानिए किस वजह से शस्‍त्रों के सम्‍मान की है परंपरा

आयुध पूजा के दिन पूजा होती है उन चीजों की जिनसे इंसान बुद्धि और समृद्धि हासिल करता है.
आयुध पूजा, आयुध पूजा क्‍या है? जानिए किस वजह से शस्‍त्रों के सम्‍मान की है परंपरा

हिंदुओं के लिए आयुध पूजा (शस्‍त्र पूजा) का विशेष स्‍थान है. विभिन्‍न रूपों में यह पूजा की जाती है. इस पूजा के दौरान मां सरस्‍वती का पूजन होता है. वह बुद्धि की देवी हैं. मां लक्ष्‍मी (धन की देवी) और पार्वती (मातृत्‍व की देवी) का पूजन भी होता है.

आयुध का मतलब होता है हथियार. इस दिन पूजा होती है उन चीजों की जिनसे इंसान बुद्धि और समृद्धि हासिल करता है. हथियार, किताबें, गाड़‍ियां, घरेलू उपकरण आदि की पूजा होती है. आयुध पूजा प्राचीन काल से होती आ रही है. इसका जिक्र दो पौराणिक कहानियों में मिलता है.

महाभारत में आयुध पूजा

महाभारत में पांडवों को हस्तिनापुर छोड़कर जंगल में जाने को मजबूर होना पड़ा था. अज्ञातवास से पहले अर्जुन ने अपने हथियार एक पेड़ के नीचे छिपाए थे. यह कहा जाता है कि वह विजयादशमी के दिन था. 13 साल अज्ञातवास के बाद वे विजयादशमी को ही लौटे और अपने हथियार निकाले.

महाभारत युद्ध से पहले पांडवों ने कौरवों पर विजय हासिल करने के लिए अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र की पूजा की थी. आखिर में वे विजयी हुए इसलिए नए कार्य करने के लिए यह दिन बेहद शुभ माना जाता है.

महिषासुर वध के बाद हुई थी शस्‍त्र पूजा

हिंदू पुराणों के अनुसार, महिषासुर जैसे शक्तिशाली राक्षस को को हराने के लिए देवों को अपनी समूची शक्तियां एक साथ लानी पड़ी. अपनी दस भुजाओं के साथ मां दुर्गा प्रकट हुईं. उनकी हर भुजा में एक हथियार था. महिषासुर और देवी के बीच नौ दिन तक लगातार युद्ध चलता रहा. दसवें दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का वध कर दिया.

सभी शस्‍त्रों के प्रयोग का उद्देश्‍य पूरा हो जाने के बाद उनका सम्‍मान करने का समय था. उन्‍हें देवताओं को वापस लौटना भी था. इसलिए सभी हथियारों की साफ-सफाई के बाद पूजा की गई, फिर उन्‍हें लौटाया गया. इसी की याद में आयुध पूजा की जाती है.

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