फॉरेन करेंसी सॉवरेन बांड होता क्या है जिस पर मचा है इतना बवाल

विदेशी मुद्रा में बांड जारी करने के कई खतरे भी होते हैं. जैसे अगर किसी कारण से देश की करेंसी रुपए का रेट डॉलर के मुकाबले घट जाए तो सरकार की देनदारी बढ़ जाएगी

वित्त मंत्रालय से सुभाष चंद्र गर्ग (Subhash Chandra Garg)  की विदाई के बाद तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं. वित्त सचिव का पद हाई प्रोफाइल माना जाता है. देश से जुड़े तमाम आर्थिक नीतियों के निर्धारण में इसकी भूमिका होती है. यहां से हटाकर गर्ग को ऊर्जा मंत्रालय का सचिव बनाया गया. उन्होंने अगले ही दिन रिटायरमेंट के लिए आवेदन कर दिया. चर्चा है कि बजट में घोषित फॉरेन करेंसी सोवरेन बांड (Foreign currency sovereign bond ) के प्रस्ताव के पीछे उनका दिमाग था. उस प्रस्ताव की अब आलोचना हो रही है. संघ के संगठन स्वदेशी जागरण मंच ने भी इसका विरोध किया है.

दरअसल भारत ने पिछले 70 वर्षों में कभी भी इस तरह के बांड जारी नहीं किए. बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ( Nirmala Sitharaman ) ने कहा कि सरकार पैसा जुटाने के लिए ये कदम उठा रही है. तर्क ये है कि देसी बांड बाजार से सारा पैसा सरकार ही ले लेती है. निजी क्षेत्र को फायदा नहीं मिलता है. सीतारमण ने तर्क दिया कि बाहरी कर्ज और जीडीपी का अनुपात पांच फीसदी से कम है, इसलिए विदेशी बाजार में विदेशी मुद्रा में सार्वभौम बांड जारी करने में कोई दिक्कत नहीं है.

आखिर फॉरेन करेंसी सोवरेन बांड होता क्या हैं ?

ये किसी और बांड की तरह ही होता है. बांड एक निश्चित अवधि के लिए जारी होते हैं. खरीदार को निवेशित पैसे पर एक निश्चित दर पर ब्याज मिलता है. सॉवरेन बांड की विश्वसनीयता, मूल धन और ब्याज की गारंटी सरकार की होती है. बांड विदेशी मुद्रा यानी डॉलर में भी जारी होते हैं. इसे रुपए यानी होम करेंसी में भी जारी किया जा सकता है.

सरकार क्यों जारी करती है बांड ?

विकास की योजनाओं को पूरा करने और अन्य खर्चे चलाने के लिए सरकार बांड जारी करती है. पैसा जुटाने का एक तरीका टैक्स रेट बढ़ाना भी है लेकिन इससे सरकार की लोकप्रियता पर असर पड़ता है. खबरों के मुताबिक बजट में की गई घोषणा के बाद अक्टूबर में ही सरकार 10 अरब डॉलर जुटाने की योजना बना रही थी.

बांड का यील्ड यानी ब्याज दर कैसे तय होता है ?

ये देश की माली हालत पर निर्भर करता है. जिस देश में घाटा कम है, विश्वसनीयता अच्छी है, रेटिंग एजेंसियों से अच्छी रेटिंग मिली हो वहां का बांड काफी सेक्योर माना जाता है. हालांकि ब्याज दर कम होती है. दूसरी ओर जिस देश में अस्थिरता है. आंतरिक संकट है. किसी कीमत पर पैसे की जरूरत है. वो ज्यादा ब्याज दर का वादा कर बाजार से पैसा उठाते हैं. हालांकि मैच्योरिटी के बाद मूलधन या पूरा ब्याज मिलने में जोखिम भी हो सकता है. कई देश तो डिफॉल्ट भी कर चुके हैं. इसलिए निवेशक सोच समझ कर पैसा लगाता है. ब्याज दर भले कम हो लेकिन रेटिंग ठीक हो , वही अच्छा माना जाता है.

खतरा –

विदेशी मुद्रा में बांड जारी करने के कई खतरे भी होते हैं. जैसे अगर किसी कारण से देश की करेंसी रुपए का रेट डॉलर के मुकाबले घट जाए तो सरकार की देनदारी बढ़ जाएगी. स्वदेशी जागरण मंच ने इसी को आधार बनाकर विदेशी मुद्रा में अंतरराष्ट्रीय बाजार में बांड जारी नहीं करने को कहा है.